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श्राद्ध में वर्जित पुष्प एवं वस्तु?

 श्राद्ध में वर्जित पुष्प एवं वस्तु?

श्राद्ध में लाल चंदन, गोरोचन, केवड़ा. कदंब , मौलश्री ,बेलपत्र ,कनेर, लाल तथा काले रंग के सभी फूल, तेज गंध वाले फूल या गंध रहित फूल यह भी वर्जित है|

श्राद्ध में किस प्रकार के व्यक्तियों को आमंत्रित नहीं करना चाहिए?

चोर ,पतित, निष्कर्म ,नास्तिक, धूर्त ,मांस विक्रेता, व्यापारी ,नौकर, काले दांत व मसूड़े वाला ,गुरु विद्रोही, शुद्रा का पति ,अध्यापक, ज्योतिष, काना व्यक्ति, ज्वारी अंधा ,पहलवानी सिखाने वाला, तथा पैसे लेकर पूजा कराने वाले ब्राह्मण को भी आमंत्रित नहीं करना चाहिए|

भांजा ,दामाद ,बहनोई ,साधू सन्यासी उत्तम|

श्राद्ध कार्य के समय पत्नी को किस दिशा में होना चाहिए?

इस कार्य के लिए पत्नी को हमेशा अपने दाहिनी ओर खड़ा किया जाना चाहिए|  वाम भाग मैं पत्नी को रखकर जल अर्पण देना या अतिथियों का स्वागत करना अशुभ माना गया है|

बच्चों, अविवाहित, विवाहित कन्या का श्राद्ध ?

१. दो या उससे कम आयु के बच्चे की वार्षिक तिथि और श्राद्ध नहीं किया जाता है ।

२. यदि मृतक दो सै छह वर्ष आयु का है तो भी उसका श्राद्ध नहीं किया जाता है । उसका केवल मृत्यु के १० दिन के अन्दर सोलह पिण्डो (मलिन षोडशी) का दान किथा जाता है ।

३. छह वर्ष से अधिक आयु में मृत्यु होने पर श्राद्ध की सम्पूर्ण प्रक्रिया की जाती है ।

४. कन्या की दो से दस वर्ष की अवथि में मृत्यु होने की स्थिति में उसका श्राद्ध नहीं करते है । केवल मलिन षोडशी तक की क्रिया की जाती है ।

५. अविवाहित कन्या की दस बर्ष से अधिक आयु में मृत्यु होने पर मलिन षोडशी, एकादशाह, सपिण्डन आदि की क्रियाएं की जाती हैं ।

६. विवाहित कन्या को मृत्यु होने पर माता पिता के घर में श्राद्ध आदि की क्रिया नहीं की जाती है ।

प्रत्येक माह श्राद्ध करने का क्या फल?

अष्टमी चर्तुदशी, अमावस्या/पूर्णिमा, संकांति को सुगंध, जल व तिल पितरों कों दे।

 किस दिन श्राद्ध करने के शुभ फल ?रविवार - आरोग्य, सोमवार-सौभाग्यमंगलवार- विजय बुघ-मनोकामनागुरूवार -ज्ञान शुक्रवार धन शनिवार - आयु   |

माघ में शुक्ल दशमी (९ फरवरी)घी, तिल मिश्रित जल से स्नान ।रविवार को पुष्प, इत्र, पुनवर्सु, नवग्रह औषधियों से मिश्रित जल से स्नान करे ।

 श्राद्ध में क्या नहीं करें /वर्जित ?

१. सामाजिक या व्यापारिक संबंध स्थापित न करें ।

२. श्राद्ध के दिन दही नहीं बिलाएं ,चक्की नहीं चलाएं तथा बाल न कटवाऐ ।

श्राद्ध के दिन क्या नहीं खाएं ?

१--बैंगन, गाजर, मसूर, अरहर, गोल लौकी, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, काला जीरा, सिधाङा, जामुन, पिपली, सुपाड़ी, कुलपी, महुआ, असली पिली सरसों और चना का प्रयोग श्राद्ध में निषिद्ध है ।

२-हींग, लोकी, लहसुन, काला नमक, धनिया, अम्लवेतस, राजगिरा, सौंफ, कचनार, श्वेत चावल, बड़ा नीबू, बैगन, चोई साग, नारियल, जामुन, जीरा, चिरौंजी, लोहे के पात्र में बना

 श्राद्ध के भोज्य पदार्थ ? गेंहूं, जो, उड़द, फल, चावल, शाक, आम, करोंदा, ईख, अंगूर, किशमिश, बिदारिकंद, शहद, लाजा, शक्कर, सत्तू, सिंघाड़ा, केसर, सुपाडी ।

पितर पूजा / कार्य करते समय क्या विशेष सावधानी रखना चाहिए ?

पितरों की पूजा के समय उपनयन या जनेऊ अपशब्द या बाएं से दाहिने करना चाहिए वामावर्त या विपरीत क्रम से गंध जल धूप आगे उनको प्रदान करना चाहिए|

किस ऊँगली का प्रयोग श्राद्ध कर्म के समय ?

पितरों को चंदन little से ही लगाना चाहिए अनामिका उंगली का प्रयोग केवल देवताओं के लिए प्रयोग किया  जाता है|

श्राद्ध के लिए उपयुक्त श्रेष्ठ समय कौन से होते हैं ?

दिन का तृतीय प्रहर, अभिजित मुहूर्त, रोहिनी नक्षत्र उदय काल में अक्षयफल दानकर्त्ता को मिलता है । जल अर्पण के लिए श्राद्ध  के लिए कुतुप   काल दिन में 11: 36 बजे से लेकर 12:24 तक होता है|

अपराहन काल 1:12 से 3: 36 मिनट तक होता है

मध्यान काल दिन में 10:45 से 1:12 तक लगभग होता है

रोहिण काल दिन का नवा मुहूर्त 12:24 से 1:12 तक माना जाता है|

मध्यान काल दिन में 10:45 से 1:12 तक लगभग होता है

रोहिण काल दिन का नवा मुहूर्त 12:24 से 1:12 तक माना जाता है|

“ निमंत्रित ब्राहम्णो से कहे (भोजन उपरांत) अभिलाषा कथन / याचना"हे  ,  पितरगण हमारे दाताओ की अभिवृद्धि है। वेदज्ञान, संतान, श्रद्धा की संख्या बढे। हमसे सब याचना करे हमे याचना न करना पडे।आमंत्रित ब्राहम्ण तथास्तु कहकर आशीर्वाद दे। "श्राद्ध कर्म के पश्चात् - पिंड गाय, बकरी, ब्राहम्ण अग्नि जल पक्षि को दे।

श्राद्ध की सर्व सरल विधि

श्राद्ध की प्रक्रिया जटिल एवं सबके सामर्थ्य की नहीं है, कोई उपाय  ?

विभिन्न ग्रंथो में स्पष्ट उल्लेख है कि ,आर्थिक विपन्नता की स्थिति में गाय को घास खिलाना या कंधे से ऊपर दोनों हाथ कर, निवेंदन करना

हे पूर्वजों, मैं प्रत्येक प्रकार से आपका मनोवांछित श्राद्ध पूर्ण विधि -विधान से नहीं कर सकता हूँ आप मेरे द्वारा दिए गए जलतिल को ग्रहण करिए मुझे एवं मेरे परिवार को आप विघ्न-बाधाओं से रहित,सभी प्रकार के सुखों का आशीर्वाद दीजिये |” जल एवं तिल दक्षिण दिशा की और  मुंह   कर पृथ्वी पर छोड़ दे |

श्राद्ध के लिए उपयुक्त श्रेष्ठ समय कौन से होते हैं ?  

जल अर्पण के लिए यह श्राद्ध करने के लिए कुतुप   काल दिन में 11: 36 बजे से लेकर 12:24 तक होता है|

अपराहन काल 1:12 से 3: 36 मिनट तक होता है

मंत्र पढ़े -

ॐ उशन्त स्तवा नि धीमहयुशन्त:समिधीमही ।

उशन्नुशत आ वह पितृन हविषे अन्तवे ।

अथवा ॐ आगच्छन्तु में पित्तरंइमं गृहणन्तु जलांजालिम् 

ॐ नमो  नारायणाय  - शुभमस्तु

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