🌿 ऋषि पंचमी व्रत-कथा प्राचीन समय में विदर्भ देश में एक सदाचारी ब्राह्मण सुमित्र अपनी पत्नी जयश्री के साथ रहता था। दोनों धर्मपरायण थे। उनके एक पुत्र और एक पुत्री थी। एक दिन ब्राह्मण की पुत्री से रजस्वला-अवस्था में अनजाने में धार्मिक नियमों का उल्लंघन हो गया। कुछ समय बाद उसके शरीर पर कष्टदायक प्रभाव दिखाई देने लगे। माता-पिता चिंतित हुए और विद्वान ऋषियों से इसका कारण पूछा। ऋषियों ने बताया कि रजस्वला-अवस्था में अनजाने हुए आचार-दोष के परिमार्जन के लिए ऋषि पंचमी व्रत करना चाहिए। भाद्रपद शुक्ल पंचमी को स्नान करके शुद्ध भाव से सप्तर्षियों तथा माता अरुंधती का पूजन, तर्पण और व्रत-कथा का श्रवण करना चाहिए। पुत्री ने श्रद्धापूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत किया। सप्तर्षियों का पूजन किया, उन्हें अर्घ्य एवं नैवेद्य अर्पित किया तथा अपने अज्ञानजनित दोषों के लिए क्षमा प्रार्थना की। व्रत के प्रभाव से उसके पूर्वकृत दोषों का परिमार्जन हुआ और उसे शारीरिक तथा मानसिक शांति प्राप्त हुई। इसी कारण ऋषि पंचमी व्रत को ऋषियों के प्रति कृतज्ञता, शुद्ध आचरण और अज्ञानवश हुए दोषों के प्रायश्चित्त का व्रत माना जाता है...
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