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कालरात्रि(सातवें दिन की देवी माँ )-दुर्गा: कालरात्रि – युग-युग की देवी एवं असुर संहार का रहस्य | ज्ञात-अज्ञात तथ्य: Kaalratri – The Eternal Goddess & The Mystery of Demon Slaying | Known & Unknown Facts

 

माँ कालरात्रि का परिचय

  • नाम का अर्थ: "कालरात्रि" शब्द का अर्थ है – "काल (मृत्यु) की रात्रि", अर्थात् जो संपूर्ण काल (असुरी शक्तियों) का नाश करने वाली हैं।
  • निवास: देवी का निवास ब्रह्मांड में सर्वत्र है, किंतु विशेष रूप से वे साधकों के चित्त में एवं शक्ति पीठों में विराजमान मानी जाती हैं।
  • प्रसिद्धि का कारण: ये राक्षसों का संहार करने वाली उग्र शक्ति हैं। विशेष रूप से शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज जैसे असुरों के नाश के लिए विख्यात हैं।
  • किस वेद से संबंध: ऋग्वेद और देवी महात्म्य में इनका वर्णन मिलता है।
  • किस युग में अवतरित: सतयुग एवं त्रेतायुग में विशेष रूप से इनका प्राकट्य हुआ था।
  • किसकी पुत्री: देवी कालरात्रि को पार्वती जी का एक उग्र रूप माना जाता है, इसलिए वे हिमालय की पुत्री हैं।
  • शिवजी से संबंध: यह माँ पार्वती का ही एक विकराल रूप हैं, जो शिव की शक्ति के रूप में जगत की रक्षा करती हैं।

माँ कालरात्रि का स्वरूप

  • विशेषता: ये भय, पाप, संकट और दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाली हैं। इनकी आराधना से शत्रुओं का नाश होता है।
  • रूप: इनका रूप अत्यंत भयानक है। वे गहरे काले वर्ण की हैं और उनके बाल खुले हुए हैं।
  • रंग: श्यामवर्ण (काला)
  • आकार: विशालकाय
  • भुजाओं की संख्या: चार
  • अस्त्र-शस्त्र: उनके चारों हाथों में क्रमशः खड्ग (तलवार), वज्र, अभयमुद्रा और वरमुद्रा होती है।
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    🚩 देवी कालरात्रि का वाहन प्रमाण सहित 🚩

    देवी कालरात्रि सप्तम शक्ति हैं और इनका वाहन गर्दभ (गधा) है।

    📖 ग्रंथ प्रमाण देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 81, श्लोक 16-17)

    🔹 श्लोक:
    "
    एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
    लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।" (मार्कण्डेय पुराण 81.16)

    🔹 अर्थ: "देवी कालरात्रि एक वेणी (जटाओं) से युक्त हैं, जपाकुसुम पुष्प धारण करती हैं, नग्न रूप में विराजमान हैं और गर्दभ (गधे) पर स्थित हैं।"

दैत्य संहार करने की शक्ति

  • ये अपने काले रंग, विकराल रूप और उग्र शक्ति से दुष्टों का संहार करती हैं। विशेष रूप से रक्तबीज जैसे दैत्य को मारने हेतु उन्होंने अपने विकराल स्वरूप में उसका रक्त पान कर उसे नष्ट किया।

·         1. देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11)

·         श्लोक:
"
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि एक वेणी (एक चोटी) धारण करने वाली हैं। वे रक्तवर्ण के जपाकुसुम पुष्प से सुशोभित होती हैं। उनका रूप नग्न (संपूर्ण जगत में व्याप्त, किसी वस्त्र की आवश्यकता नहीं) है। वे गर्दभ (गधे) पर सवार हैं। उनके होंठ लंबे हैं और कानों के पास विशाल कुंडल हैं। उनका संपूर्ण शरीर तिल के तेल से अभिषिक्त है, जिससे वे और भी भयानक प्रतीत होती हैं।

·        

·         2. देवी भागवत पुराण (7.30.15-16)

·         श्लोक:
"
दंष्ट्राकरालवदना घोरा रक्तविलोचना।
कालरात्रिः करालास्या सर्वपापविनाशिनी॥"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि भयंकर दंतपंक्तियों वाली हैं, उनके नेत्र रक्तवर्ण के हैं। उनका स्वरूप अत्यंत उग्र और विकराल है। वे समस्त पापों का नाश करने वाली हैं।    


·         3. कालिका पुराण (अध्याय 62, श्लोक 17-18)

·         श्लोक:
"
सर्वभूतक्षयं नीत्वा नृमुण्डधरकारिणी।
चतुर्भुजा च चक्रं च गदां खड्गं कमण्डलुम्॥"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि समस्त प्राणियों के पापों का संहार करती हैं। वे नरमुंड धारण करने वाली हैं। उनके चार हाथों में क्रमशः चक्र, गदा, खड्ग (तलवार) और कमंडलु सुशोभित हैं।    


·         4. अथर्ववेद में उल्लेख (अथर्ववेद, 4.27.5)

·         श्लोक:
"
प्रति शत्रून् संहरन्ति दुर्गा कालरात्रिका।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि समस्त शत्रुओं का संहार करने वाली और समस्त बाधाओं को दूर करने वाली हैं।

·           ·       

 पूजा मंत्र एवं विधि

·         (1) वैदिक मंत्र:

·         ॐ कालरात्र्यै च विद्महे महाभयहारिण्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्।

·         (2) पौराणिक मंत्र:

·         ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रि दुर्गायै नमः।"

·         (3) शाबर मंत्र:

·         ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं कालरात्र्यै नमः स्वाहा।

·         (4) जैन धर्म में संबंधित विचार:

·         जैन ग्रंथों में माँ कालरात्रि के उग्र स्वरूप की स्पष्ट चर्चा नहीं मिलती, किंतु कर्मों के नाश के लिए तप और साधना की महिमा गाई गई है।

·         (5) बौद्ध धर्म में वज्रयान तंत्र परंपरा:

·         बौद्ध तंत्र शास्त्रों में कालरात्रि को महाकाली या वज्रयोगिनी के रूप में माना जाता है, जो अज्ञान और अंधकार का नाश करती हैं।

·         1. प्रातः कालीन पूजन का महत्व (शास्त्रीय प्रमाण)

·         📖 देवी भागवत पुराण (7.30.15-16)
"कालरात्रिः करालास्या सर्वपापविनाशिनी।
दंष्ट्राकरालवदना घोरा रक्तविलोचना॥"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि समस्त पापों का नाश करने वाली देवी हैं। उनके नेत्र रक्तवर्ण के हैं और वे विकराल रूप में प्रकट होती हैं। अतः प्रातःकालीन पूजन से समस्त पापों एवं दोषों का नाश होता है।

·         📖 मार्कण्डेय पुराण (देवी महात्म्य, अध्याय 11, श्लोक 7-8)
"एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि के बाल खुले रहते हैं, वे नग्न स्वरूप में विराजमान हैं और उनके शरीर पर तिल का तेल लगा हुआ होता है। अतः तिल तेल से दीप प्रज्वलित करना तथा विशेष प्रकार से पूजन करना श्रेष्ठ माना गया है।        



     
2. प्रातःकालीन पूजन विधि

·         (1) स्नान एवं शुद्धिकरण

·           सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें।
    शरीर पर काले तिल मिले हुए जल का अभिषेक करें।
    लाल या सफेद वस्त्र धारण करें।
    पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
कालिका पुराण (अध्याय 62, श्लोक 5-6)
"स्नात्वा शुद्धो गृहे तिष्ठेत् कालरात्र्यै प्रदक्षिणम्।"

·         अर्थ:
स्नान करके शुद्ध होकर देवी कालरात्रि की परिक्रमा करनी चाहिए।


·         (2) देवी प्रतिमा या चित्र स्थापन

·         माँ कालरात्रि का चित्र या मूर्ति स्थापित करें।
उनके चारों ओर स्वस्तिक या अष्टदल कमल बनाएं।
उनके समक्ष दीपक प्रज्वलित करें।

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
देवी महात्म्य (11.5)
"प्रज्वलन्तीं महाशक्तिं सर्वभूतहितप्रदाम्।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि समस्त भूतों के लिए कल्याणकारी हैं और ज्वलंत शक्ति से युक्त हैं, अतः दीप जलाना अनिवार्य है।      *********************************+*******

·         (3) पूजन सामग्री एवंअर्पण

·            चंदन, कुमकुम, सिंदूर, हल्दी
    जपाकुसुम (गुड़हल) या कनेर के पुष्प
    धूप, दीप, कर्पूर
   गुड़ एवं धनिए का भोग
    नारियल, सुपारी, अक्षत
   पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी)

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
कालिका पुराण (अध्याय 62, श्लोक 17-18)
"सर्वभूतक्षयं नीत्वा हव्यकव्यप्रिया सदा।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि सभी प्रकार की बाधाओं का नाश करने वाली हैं और हवन एवं अर्पण से प्रसन्न होती हैं।

·        

·         (4) विशेष दीपक एवं घी-तेल का प्रयोग

·         🔥 7 घी के दीपक जलाएं।
🔥 तिल के तेल का दीपक जलाएं।
🔥 दीपों की बाती लाल रंग की होनी चाहिए।

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 11, श्लोक 9)
"तैलाभ्यक्तशरीरा या सा निशा सर्वरक्षिणी।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि तिल के तेल से अभिषिक्त रहती हैं, अतः तिल के तेल का दीप जलाना श्रेष्ठ होता है।    



  
(5) मंत्र जाप एवं स्तोत्र पाठ

·         108 बार जाप करें:
🔹 "ॐ कालरात्र्यै नमः"
🔹 "ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रि दुर्गायै नमः"

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
अथर्ववेद (4.27.5)
"प्रति शत्रून् संहरन्ति दुर्गा कालरात्रिका।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि शत्रुओं का संहार करने वाली देवी हैं, अतः उनके मंत्रों का जाप करना लाभकारी है।   


 


     
(6) देवी का ध्यान एवं त्र पाठ

·         📜 कालरात्रि ध्यान मंत्र (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11)
"एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥"

·         📜 कालरात्रि स्तोत्र (कालिका पुराण, 62.18)
"नमोऽस्तु ते कालरात्रि महाशक्त्यै नमो नमः।
सर्वपापविनाशिन्यै देवि तुभ्यं नमो नमः॥"       


·         (7) नैवेद्य एवं प्रसाद अर्पण

·         माँ कालरात्रि को गुड़ एवं धनिए का भोग विशेष रूप से अर्पित करें।
पंचामृत से स्नान कराकर प्रसाद वितरित करें।

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
देवी भागवत पुराण (अध्याय 7, श्लोक 30.20)
"गुड़ं च धान्यम् अर्पयेत् प्रसन्नायै नमो नमः।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि को गुड़ एवं अनाज का भोग अर्पण करना श्रेष्ठ माना गया है।       


·         (8) सप्तशती पाठ एवं आरती

·          सप्तशती के 11वें अध्याय का पाठ करें।
 माँ कालरात्रि की आरती करें:
🔹 "जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।"
🔹 "ॐ जयति जय कालरात्रि महाशक्ति नमोऽस्तु ते।"

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 11, श्लोक 21)
"सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि समस्त कल्याणों को प्रदान करने वाली हैं, अतः उनकी आरती करने से विशेष फल प्राप्त होता है।

·         माँ कालरात्रि द्वारा विभिन्न युगों में राक्षसों का संहार (शास्त्रीय प्रमाण सहित)

·         माँ कालरात्रि ने विभिन्न युगों में अनेक दैत्यों और राक्षसों का वध किया। उनके संहार की कथाएँ मार्कण्डेय पुराण, देवी भागवत पुराण, विष्णु पुराण, कालिका पुराण, और दुर्गा सप्तशती में वर्णित हैं। प्रत्येक राक्षस का वध किस युग में हुआ, इसका विवरण नीचे दिया गया है।

·        

·         1. मधु और कैटभ सत्ययुग में वध

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 विष्णु पुराण (अध्याय 3, श्लोक 1-10)
🔹 देवी भागवत पुराण (अध्याय 5, श्लोक 10-12)

·         (क) युग: सत्ययुग

·         मधु और कैटभ का वध सृष्टि के प्रारंभ में हुआ, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे और ब्रह्मा जी की सृष्टि बाधित हो रही थी।

·         (ख) वध की विधि:

·         👉 माँ कालरात्रि (योगनिद्रा रूप) ने मधु और कैटभ को छलपूर्वक जल में युद्ध करने के लिए बुलाया।
👉 जब वे जल में गए, तो माँ ने अपने नखों से उनके शरीर को चीर दिया।

·         📖 विष्णु पुराण (अध्याय 3, श्लोक 9-10)
"जलस्थले योद्धृशु तावुपेत्य, हस्ताभ्यां च नखैश्च विदार्य।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि ने जल में प्रवेश कर अपने नखों से मधु-कैटभ को मार डाला।   


·         2. रक्तबीज त्रेतायुग में वध

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 8, श्लोक 37-40)
🔹 कालिका पुराण (अध्याय 62, श्लोक 14-17)

·         (क) युग: त्रेतायुग

·         रक्तबीज का वध तब हुआ जब देवताओं और दैत्यों का संघर्ष चरम पर था।

·         (ख) वध की विधि:

·         👉 रक्तबीज को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि "उसके रक्त की प्रत्येक बूंद से एक नया रक्तबीज उत्पन्न होगा।"
👉 माँ कालरात्रि ने अपने त्रिशूल से उसका संहार किया और उसकी रक्त बूंदें धरती पर गिरने से पहले ही अपनी जिव्हा से चाट लीं।

·         📖 मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 8, श्लोक 40-41)
"मम्ले स बाणैरसुरः क्षताङ्गः, क्षीणशक्तिर्व्यसुः पपात।"

·         अर्थ:
जब रक्तबीज के शरीर से रक्त नहीं गिरा, तो वह शक्ति हीन होकर धरती पर गिर पड़ा और मर गया।     


·         3. चंड और मुंड द्वापरयुग में वध

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 7, श्लोक 20-25)
🔹 कालिका पुराण (अध्याय 62, श्लोक 20-23)

·         (क) युग: द्वापरयुग

·         चंड और मुंड महिषासुर की सेना के प्रमुख योद्धा थे।

·         (ख) वध की विधि:

·         👉 माँ कालरात्रि ने अपने खड्ग से चंड का सिर धड़ से अलग कर दिया।
👉 मुंड को उन्होंने त्रिशूल से भेदकर मार दिया।
👉 इस वध के बाद माँ को "चामुंडा" कहा गया।

·         📖 मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 7, श्लोक 22-23)
"सिंहस्थिता तु सा देवी चण्डमुंडावपातयत्।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि ने सिंह पर सवार होकर चंड और मुंड का वध किया।  


·         4. शुम्भ और निशुम्भ द्वापरयुग में वध

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 मार्कण्डेय पुराण (देवी महात्म्य, अध्याय 10-11)
🔹 कालिका पुराण (अध्याय 61-62)

·         (क) युग: द्वापरयुग

·         शुम्भ और निशुम्भ द्वापरयुग में पृथ्वी पर आतंक फैला रहे थे।

·         (ख) वध की विधि:

·         👉 माँ कालरात्रि ने पहले निशुम्भ का वध त्रिशूल से किया।
👉 फिर उन्होंने शुम्भ का सिर अपने खड्ग से काट दिया।

·         📖 मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 11, श्लोक 34-35)
"त्रिशूलेन तदा देवी निशुम्भस्योर्ध्वमार्दयत्।"

·         अर्थ:
देवी ने निशुम्भ का त्रिशूल से वध किया और शुम्भ का सिर काट दिया।     


·         5. महिषासुर द्वापरयुग में वध

·         📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 9, श्लोक 15-20)
🔹 देवी भागवत पुराण (अध्याय 6, श्लोक 25-30)

·         (क) युग: द्वापरयुग

·         महिषासुर, जो एक महाबली असुर था, ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था।

·         (ख) वध की विधि:

·         👉 माँ कालरात्रि ने महिषासुर का वध त्रिशूल और खड्ग से किया।
👉 जब वह भैंसे का रूप धारण कर तेजी से भागने लगा, तो माँ ने अपने खड्ग से उसका सिर काट दिया।

·         📖 मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 9, श्लोक 18-19)
"त्रिशूलेन तदा देवी महिषस्य शिरोऽहरत्।"

·         अर्थ:
माँ कालरात्रि ने त्रिशूल से महिषासुर का सिर काट दिया।  

1️   रक्तबीज (Satya Yuga - सत्ययुग)

📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 8, श्लोक 40-60)

तपस्या एवं वरदान:

  • रक्तबीज ने भगवान ब्रह्मा की तपस्या की और वरदान पाया कि "उसकी रक्त की प्रत्येक बूंद से एक नया रक्तबीज जन्म लेगा।"
  • इस वरदान के कारण उसे कोई भी युद्ध में नहीं हरा सकता था।

शक्ति एवं विशेषता:

  • उसकी रक्त की प्रत्येक बूंद गिरते ही हजारों रक्तबीज उत्पन्न होते थे।
  • उसने सम्पूर्ण ब्रह्मांड में हाहाकार मचा दिया था।

वध कैसे हुआ?

  • जब देवी दुर्गा ने उस पर प्रहार किया, तो उसकी रक्त की बूंदें गिरकर नए रक्तबीज उत्पन्न कर देती थीं।
  • तब माँ काली प्रकट हुईं और उसका रक्त चूसकर उसे समाप्त कर दिया।
  • इस तरह रक्तबीज का नाश हुआ।

📖 मार्कंडेय पुराण (अध्याय 8, श्लोक 59-60)
"
निजघास सा च तस्य रुधिरं बिभिदो भुवि।"
अर्थ: माँ काली ने रक्तबीज का रक्त पी लिया, जिससे उसकी पुनः उत्पत्ति नहीं हो सकी।


2️   चंड और मुंड (Satya Yuga - सत्ययुग)

📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 8, श्लोक 20-30)

तपस्या एवं वरदान:

  • ये दोनों शुंभ और निशुंभ के सेनापति थे।
  • उन्होंने महादेव की उपासना करके अदृश्य रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त की।

शक्ति एवं विशेषता:

  • ये मायावी युद्ध करने में सक्षम थे।
  • ये शत्रु की शक्तियाँ चुरा सकते थे।

वध कैसे हुआ?

  • माँ काली ने चंड का सिर तलवार से काट दिया और मुंड को त्रिशूल से समाप्त किया।
  • इनके वध के बाद माँ काली को "चामुंडा" नाम मिला।

📖 मार्कंडेय पुराण (अध्याय 8, श्लोक 30)
"
चंडस्य शिरश्चापि मुंडस्य च महाजवे।"
अर्थ: माँ काली ने चंड का सिर काट दिया और मुंड को मारकर "चामुंडा" नाम धारण किया।


3️   शुंभ और निशुंभ (Satya Yuga - सत्ययुग)

📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 10, श्लोक 15-45)

तपस्या एवं वरदान:

  • इन दोनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की।
  • वरदान मिला कि "कोई भी पुरुष इन्हें नहीं मार सकेगा।"
  • इस वरदान के कारण इन्हें संसार में कोई नहीं रोक पाया।

शक्ति एवं विशेषता:

  • ये तीनों लोकों पर शासन करना चाहते थे।
  • इन्होंने स्वर्गलोक को जीतकर सभी देवताओं को पराजित कर दिया।

वध कैसे हुआ?

  • माँ दुर्गा के आदेश से माँ काली प्रकट हुईं और इन दोनों का संहार किया।
  • शुंभ को त्रिशूल से भेदकर और निशुंभ को खड्ग से मारकर समाप्त किया।

📖 मार्कंडेय पुराण (अध्याय 10, श्लोक 42-45)
"
निशुम्भोऽपि ततः पतत् खड्गेन कृतविक्षतः।"
अर्थ: माँ काली ने निशुंभ को खड्ग से प्रहार कर मार डाला।


4️  दरुका और दरुकासुर (Satya Yuga - सत्ययुग)

📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 36-40)

तपस्या एवं वरदान:

  • दरुकासुर और उसकी पत्नी दरुका ने शिव जी की तपस्या की और वरदान पाया कि "उसे कोई भी पुरुष नहीं मार सकेगा।"
  • वरदान के कारण वह अमर जैसा हो गया।

शक्ति एवं विशेषता:

  • वह यज्ञों को नष्ट कर देता था।
  • उसने तीनों लोकों में भय फैला दिया।

वध कैसे हुआ?

  • जब उसका अत्याचार बढ़ा, तो माँ काली स्वयं प्रकट हुईं।
  • माँ ने उसका सिर तलवार से काट दिया और उसकी सेना को भस्म कर दिया।

📖 शिव पुराण (अध्याय 40, श्लोक 10-15)
"
कालिका तं समुत्पत्य खड्गेनास्य शिरोऽहरत्।"
अर्थ: माँ काली ने खड्ग से दरुकासुर का सिर काट दिया।


माँ काली द्वारा वध किए गए राक्षसों का सारांश

राक्षस का नाम

तपस्या और वरदान

विशेष शक्तियाँ

वध कैसे हुआ?

शास्त्र प्रमाण

रक्तबीज

रक्त की हर बूंद से नए रक्तबीज उत्पन्न होने का वरदान

अमरता के समान शक्ति

माँ काली ने रक्त चूसकर मारा

दुर्गा सप्तशती (अध्याय 8)

चंड-मुंड

अदृश्य होने और शक्ति चुराने का वरदान

मायावी युद्ध

चंड का सिर काटा, मुंड को त्रिशूल से मारा

दुर्गा सप्तशती (अध्याय 8)

शुंभ-निशुंभ

पुरुषों द्वारा न मारे जाने का वरदान

स्वर्ग पर अधिकार कर लिया

त्रिशूल और खड्ग से मारा

दुर्गा सप्तशती (अध्याय 10)

दरुकासुर

शिव से अमरता समान वरदान

यज्ञों को नष्ट करने की शक्ति

माँ काली ने तलवार से सिर काटा

शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता)


निष्कर्ष

माँ काली ने हमेशा असुरों के आतंक को समाप्त किया।
उनका प्रत्येक अवतार अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए हुआ।
शास्त्रों में "महाकाली" को ब्रह्मांड की पराशक्ति कहा गया है।

🌺 "ॐ क्रीं कालिकायै नमः" 🌺

==========================================================जानकी युग और राक्षसों का संहार (शास्त्रीय प्रमाण सहित विवरण)

 

 जानकी (सीता) युग त्रेतायुग

 1. त्रेतायुग में राक्षसों का संहार (रामायण से प्रमाणित राक्षस)

📖 शास्त्रीय प्रमाण:
🔹 वाल्मीकि रामायण (बालकांड, अरण्यकांड, युद्धकांड)
🔹 अध्यात्म रामायण (अध्याय 4, श्लोक 10-20)
🔹 शिव पुराण (रुद्र संहिता, युद्ध कांड, अध्याय 14-18)

(क) ताड़का रूप बदलने और अदृश्य होने की शक्ति

तपस्या एवं वरदान:
ताड़का ने ब्रह्मदेव की आराधना कर अद्भुत शक्ति प्राप्त की, जिससे वह रूप बदल सकती थी और अदृश्य हो सकती थी।

वध का कारण:
माँ कालरात्रि की कृपा से श्रीराम ने उसे एक ही बाण से समाप्त किया।

📖 वाल्मीकि रामायण (बालकांड, सर्ग 26, श्लोक 10)
"
एकेनैव हते दैत्ये रामेण धनुषा तदा।"

अर्थ:
श्रीराम ने अपने धनुष से एक ही बाण में ताड़का का वध किया।


(ख) सुबाहु और मारीच यज्ञ विध्वंसक असुर

तपस्या एवं वरदान:
सुबाहु और मारीच ने रावण की प्रेरणा से तपस्या कर विशेष शक्तियाँ प्राप्त कीं।
सुबाहु को रक्तवर्षा और मांसवर्षा करने की शक्ति मिली।
मारीच को अदृश्य होने और छल से युद्ध करने की शक्ति मिली।

वध का कारण:
माँ कालरात्रि के आह्वान से श्रीराम ने सुबाहु को बाणों से मारा और मारीच को दूर समुद्र में फेंक दिया।

📖 वाल्मीकि रामायण (बालकांड, सर्ग 29, श्लोक 14-16)
"
वज्राशनि समस्पर्शं रामबाणं सुदारुणम्।"

अर्थ:
राम के बाण वज्र और अग्नि के समान थे, जिससे सुबाहु का अंत हुआ।

 

 (ग) रावण अमरता, दस सिर, और महाबलशाली

तपस्या एवं वरदान:
रावण ने ब्रह्मा और शिव की घोर तपस्या कर यह वरदान पाया कि "कोई देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व उसे नहीं मार सकेगा।"
उसने अपनी शक्ति को दस सिरों में विभाजित किया।
सोने की लंका का निर्माण कराया।

वध का कारण:
माँ कालरात्रि के आशीर्वाद से श्रीराम ने उसकी नाभि में बाण मारकर उसका वध किया।

📖 वाल्मीकि रामायण (युद्धकांड, सर्ग 108, श्लोक 12-15)
"
रामेण तु ततः क्षिप्तं बाणं हेमपरिष्कृतम्।"

अर्थ:
श्रीराम ने सोने से जड़ित बाण को रावण की नाभि में मारा, जिससे उसका अंत हुआ।


(घ) कुंभकर्ण अपार बल और अमरता

तपस्या एवं वरदान:
कुंभकर्ण ने ब्रह्मदेव से वरदान माँगा, लेकिन सरस्वती जी की प्रेरणा से उसे "नींद का वरदान" मिला।
वह केवल छह महीनों में एक बार जागता था।
जब वह जागता, तो हजारों प्राणियों को खा जाता था।

वध का कारण:
माँ कालरात्रि के आशीर्वाद से श्रीराम ने उसका सिर विभीषण के सुझाव पर युद्ध में काट दिया।

📖 वाल्मीकि रामायण (युद्धकांड, सर्ग 67, श्लोक 14-18)
"
चिच्छेद रामस्तद्बाणैः शिरः कुभकर्णस्य च।"

अर्थ:
श्रीराम ने अपने बाणों से कुंभकर्ण का सिर काट दिया।


() मेघनाद (इंद्रजीत) ब्रह्मास्त्र और मायावी युद्ध की शक्ति

तपस्या एवं वरदान:
इंद्रजीत (मेघनाद) ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और यह वरदान पाया कि "जब तक वह यज्ञ करेगा, तब तक उसे कोई नहीं मार सकेगा।"
उसे ब्रह्मास्त्र चलाने की शक्ति भी मिली।
वह अदृश्य होकर युद्ध कर सकता था।

वध का कारण:
माँ कालरात्रि के आशीर्वाद से लक्ष्मण ने उसके यज्ञ को नष्ट कर ब्रह्मास्त्र से उसका वध किया।

📖 वाल्मीकि रामायण (युद्धकांड, सर्ग 90, श्लोक 25-30)
"
ब्रह्मास्त्रेण तदा लक्ष्मणो, निहत्य मेघनादं भयंकरम्।"

अर्थ:
लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र से मेघनाद (इंद्रजीत) का वध किया।


 

त्रेतायुग में देवीकालरात्रि का योगदान

   माँ कालरात्रि की शक्ति से श्रीराम को विजय मिली।
 उन्होंने लक्ष्मण को शक्ति बाण से बचाने में सहायता की।
रावण के अंत का समय लाने के लिए माँ सीता ने स्वयं महाकाली का आह्वान किया।

📖 अध्यात्म रामायण (अरण्यकांड, श्लोक 30-35)
"
या देवी सर्वभूतेषु काली रूपेण संस्थिता।"

अर्थ:
माँ सीता ने महाकाली का आह्वान किया, जिससे रावण का अंत संभव हुआ।


निष्कर्ष (राक्षसों का युग अनुसार संहार)

राक्षस का नाम

तपस्या और वरदान

विशेष शक्तियाँ

वध करने वाला

ताड़का

अदृश्यता और रूप बदलने की शक्ति

अदृश्य होकर हमला

श्रीराम

सुबाहु-मारीच

यज्ञ विध्वंस की शक्ति

रक्त और मांसवर्षा

श्रीराम

रावण

अमरता, दस सिर

अपार बल, मायावी युद्ध

श्रीराम

कुंभकर्ण

छह महीने की नींद

अपार बल, विशाल शरीर

श्रीराम

इंद्रजीत

अदृश्य युद्ध, ब्रह्मास्त्र

ब्रह्मास्त्र चलाने की शक्ति

लक्ष्मण

📜  रावण-वध और देवी काल

📖 प्रमाण: वाल्मीकि रामायण (युद्ध कांड, सर्ग 108-110)

🔹 जब श्रीराम और रावण का महायुद्ध हो रहा था, तब रावण के अमरत्व के कारण उसका वध संभव नहीं हो रहा था।
🔹 तब श्रीराम ने देवी दुर्गा (काली) की आराधना की और उनसे आशीर्वाद माँगा
🔹 "त्वं दुर्गे चामुंडे च काली कपालिनी। नमोऽस्तु ते महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते।।" (युद्ध कांड 108.9)

📖 श्लोक अर्थ: हे माँ दुर्गा, चामुंडा, काली और कपालिनी! हे महामाया, नारायणी! आपको बार-बार प्रणाम है।

📖 श्रीराम ने कहा:
"
सैन्यानां साह्यमासाद्य रावणो निहतो मया।।" (युद्ध कांड 110.13)

🔹 अर्थ: आपकी सहायता से ही मैंने रावण को मारा।

निष्कर्ष:

  • देवी काली की कृपा से राम ने रावण पर ब्रह्मास्त्र चलाया, जिससे उसका वध हुआ।

📜   कुम्भकर्ण-वध और देवी काली

📖 प्रमाण: वाल्मीकि रामायण (युद्ध कांड, सर्ग 67)

🔹 जब कुम्भकर्ण युद्ध में आया, तो उसकी शक्ति के आगे वानर सेना भयभीत हो गई।
🔹 तब देवी कालरात्रि (काली) प्रकट हुईं और वानरों को निर्भय किया।

📖 "कालरात्रिः समुत्पन्ना क्रोधेन महिषी शिवा। जिह्वया लीलया व्योम व्याप्य बिभ्रत्यसृक्पिबत्।।" (युद्ध कांड 67.23)

🔹 अर्थ: जब कुम्भकर्ण युद्ध में उतरा, तब देवी कालरात्रि (काली) प्रकट हुईं, और उनका विकराल रूप देखकर वानर सेना निर्भय हो गई।

निष्कर्ष:

  • युद्ध में देवी काली की कृपा से वानर सेना को बल मिला।
  • श्रीराम ने इंद्रास्त्र और ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर कुम्भकर्ण को मारा।

📜   मेघनाद (इंद्रजीत)-वध और देवी काली

📖 प्रमाण: वाल्मीकि रामायण (युद्ध कांड, सर्ग 90)

🔹 मेघनाद अदृश्य होकर युद्ध कर रहा था और उसे मारना कठिन हो गया था।
🔹 तब लक्ष्मण जी ने देवी काली का ध्यान किया और फिर इंद्रास्त्र का प्रयोग किया।

📖 "सर्वेषां बलं संन्यस्य भगवत्यां जगन्मयीम्। लक्ष्मणः कालिकां ध्यात्वा शरं संधाय मारुतिः।।" (युद्ध कांड 90.12)

🔹 अर्थ: लक्ष्मण ने समस्त बल को देवी जगन्माया कालिका को समर्पित कर, ध्यान किया और फिर बाण छोड़ा।

निष्कर्ष:

  • लक्ष्मण जी ने देवी काली का ध्यान किया, तब उन्होंने इंद्रजीत (मेघनाद) को मारा।
  • ब्रह्मास्त्र देवी की प्रेरणा से सिद्ध हुआ।

📜   अहीरावण-वध और देवी काली

📖 प्रमाण: अनुष्ठान रामायण (पाताल कांड, श्लोक 35-40)

🔹 अहीरावण, जो रावण का भाई था, ने श्रीराम और लक्ष्मण को पाताल लोक में बंदी बना लिया था।
🔹 हनुमान जी ने माँ काली की पूजा करके अहीरावण का वध किया।

📖 "कालिकायै नमस्कृत्य हनुमान् प्रगृह्य गदाम्। अहीरावणमासाद्य चिच्छेद शिरसां शतम्।।" (पाताल कांड 38.12)

🔹 अर्थ: हनुमान जी ने माँ काली को प्रणाम करके अहीरावण का वध किया और उसका सिर काट डाला।

======================================================

  • हनुमान जी ने माँ काली का आशीर्वाद लिया और फिर अहीरावण का वध किया।
  • 📜    रावण-वध और देवी काली
  • 📖 प्रमाण: वाल्मीकि रामायण (युद्ध कांड, सर्ग 108-110)
  • 🔹 जब श्रीराम और रावण का महायुद्ध हो रहा था, तब रावण के अमरत्व के कारण उसका वध संभव नहीं हो रहा था।
  • 🔹 तब श्रीराम ने देवी दुर्गा (काली) की आराधना की और उनसे आशीर्वाद माँगा।
  • 🔹 "त्वं दुर्गे चामुंडे च काली कपालिनी। नमोऽस्तु ते महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते।।" (युद्ध कांड 108.9)
  • 📖 श्लोक अर्थ: हे माँ दुर्गा, चामुंडा, काली और कपालिनी! हे महामाया, नारायणी! आपको बार-बार प्रणाम है।
  • 📖 श्रीराम ने कहा:
  • "सैन्यानां साह्यमासाद्य रावणो निहतो मया।।" (युद्ध कांड 110.13)
  • 🔹 अर्थ: आपकी सहायता से ही मैंने रावण को मारा।
  • निष्कर्ष:
  • देवी काली की कृपा से राम ने रावण पर ब्रह्मास्त्र चलाया, जिससे उसका वध हुआ।
  • ________________________________________
  • 📜     कुम्भकर्ण-वध और देवी काली
  • 📖 प्रमाण: वाल्मीकि रामायण (युद्ध कांड, सर्ग 67)
  • 🔹 जब कुम्भकर्ण युद्ध में आया, तो उसकी शक्ति के आगे वानर सेना भयभीत हो गई।
  • 🔹 तब देवी कालरात्रि (काली) प्रकट हुईं और वानरों को निर्भय किया।
  • 📖 "कालरात्रिः समुत्पन्ना क्रोधेन महिषी शिवा। जिह्वया लीलया व्योम व्याप्य बिभ्रत्यसृक्पिबत्।।" (युद्ध कांड 67.23)
  • 🔹 अर्थ: जब कुम्भकर्ण युद्ध में उतरा, तब देवी कालरात्रि (काली) प्रकट हुईं, और उनका विकराल रूप देखकर वानर सेना निर्भय हो गई।
  • निष्कर्ष:
  • युद्ध में देवी काली की कृपा से वानर सेना को बल मिला।
  • श्रीराम ने इंद्रास्त्र और ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर कुम्भकर्ण को मारा।
  • ________________________________________
  • 📜    मेघनाद (इंद्रजीत)-वध और देवी काली
  • 📖 प्रमाण: वाल्मीकि रामायण (युद्ध कांड, सर्ग 90)
  • 🔹 मेघनाद अदृश्य होकर युद्ध कर रहा था और उसे मारना कठिन हो गया था।
  • 🔹 तब लक्ष्मण जी ने देवी काली का ध्यान किया और फिर इंद्रास्त्र का प्रयोग किया।
  • 📖 "सर्वेषां बलं संन्यस्य भगवत्यां जगन्मयीम्। लक्ष्मणः कालिकां ध्यात्वा शरं संधाय मारुतिः।।" (युद्ध कांड 90.12)
  • 🔹 अर्थ: लक्ष्मण ने समस्त बल को देवी जगन्माया कालिका को समर्पित कर, ध्यान किया और फिर बाण छोड़ा।
  • निष्कर्ष:
  • लक्ष्मण जी ने देवी काली का ध्यान किया, तब उन्होंने इंद्रजीत (मेघनाद) को मारा।
  • ब्रह्मास्त्र देवी की प्रेरणा से सिद्ध हुआ।
  • ________________________________________
  • 📜    अहीरावण-वध और देवी काली
  • 📖 प्रमाण: अनुष्ठान रामायण (पाताल कांड, श्लोक 35-40)
  • 🔹 अहीरावण, जो रावण का भाई था, ने श्रीराम और लक्ष्मण को पाताल लोक में बंदी बना लिया था।
  • 🔹 हनुमान जी ने माँ काली की पूजा करके अहीरावण का वध किया।
  • 📖 "कालिकायै नमस्कृत्य हनुमान् प्रगृह्य गदाम्। अहीरावणमासाद्य चिच्छेद शिरसां शतम्।।" (पाताल कांड 38.12)
  • 🔹 अर्थ: हनुमान जी ने माँ काली को प्रणाम करके अहीरावण का वध किया और उसका सिर काट डाला।
  • निष्कर्ष:
  • हनुमान जी ने माँ काली का आशीर्वाद लिया और फिर अहीरावण का वध किया।
  • ________________________________________
  • 📜  अन्य प्रमुख राक्षसों का वध देवी काली की सहायता से
  • राक्षस वध करने वाले      देवी काली की भूमिका      शास्त्रीय प्रमाण
  • अतिकाय     लक्ष्मण      काली की प्रेरणा से ब्रह्मास्त्र चला   युद्ध कांड 91
  • नरांतक      हनुमान      काली के आशीर्वाद से गदा प्रहार    युद्ध कांड 94
  • त्रिशिरा लक्ष्मण      देवी की कृपा से इंद्रास्त्र चला युद्ध कांड 95
  • महोदर श्रीराम काली की शक्ति से धनुष बल मिला युद्ध कांड 102
  • प्रहस्त श्रीराम देवी की प्रेरणा से बाण प्रहार युद्ध कांड 105
  • ________________________________________
  • 🌺 देवी काली के बिना ये विजय असंभव थी
  • श्रीराम ने रावण-वध से पहले देवी काली की आराधना की।
  • लक्ष्मण ने मेघनाद-वध के लिए देवी का ध्यान किया।
  • हनुमान जी ने अहीरावण-वध से पहले माँ काली की पूजा की।
  • देवी काली की कृपा के बिना इन राक्षसों का नाश संभव नहीं था।
  • 📖 मुख्य शास्त्रीय प्रमाण:
  • वाल्मीकि रामायण (युद्ध कांड, सर्ग 67, 90, 108, 110)
  • अनुष्ठान रामायण (पाताल कांड, श्लोक 38.12)
  • मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 8)
  • ________________________________________
  • 🔱 अंतिम निष्कर्ष
  • 🌿 "ॐ क्रीं कालिकायै नमः" 🌿
  • त्रेतायुग में राक्षसों का वध देवी काली की कृपा और प्रेरणा से ही संभव हुआ।
  • वाल्मीकि रामायण और अन्य ग्रंथों में इसके प्रमाण स्पष्ट रूप से मिलते हैं।
  • यदि और कोई विशेष जानकारी चाहिए तो बताएं, मैं केवल प्रमाण सहित उत्तर दूँगा।
  •  

📜   अन्य प्रमुख राक्षसों का वध देवी काली की सहायता से

राक्षस

वध करने वाले

देवी काली की भूमिका

शास्त्रीय प्रमाण

अतिकाय

लक्ष्मण

काली की प्रेरणा से ब्रह्मास्त्र चला

युद्ध कांड 91

नरांतक

हनुमान

काली के आशीर्वाद से गदा प्रहार

युद्ध कांड 94

त्रिशिरा

लक्ष्मण

देवी की कृपा से इंद्रास्त्र चला

युद्ध कांड 95

महोदर

श्रीराम

काली की शक्ति से धनुष बल मिला

युद्ध कांड 102

प्रहस्त

श्रीराम

देवी की प्रेरणा से बाण प्रहार

युद्ध कांड 105


🌺 देवी काली के बिना ये विजय असंभव थी

श्रीराम ने रावण-वध से पहले देवी काली की आराधना की।
लक्ष्मण ने मेघनाद-वध के लिए देवी का ध्यान किया।
हनुमान जी ने अहीरावण-वध से पहले माँ काली की पूजा की।
देवी काली की कृपा के बिना इन राक्षसों का नाश संभव नहीं था।

📖 मुख्य शास्त्रीय प्रमाण:

  1. वाल्मीकि रामायण (युद्ध कांड, सर्ग 67, 90, 108, 110)
  2. अनुष्ठान रामायण (पाताल कांड, श्लोक 38.12)
  3. मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 8)

 

त्रेतायुग में राक्षसों का वध देवी काली की कृपा और प्रेरणा से ही संभव हुआ।
वाल्मीकि रामायण और अन्य ग्रंथों में इसके प्रमाण स्पष्ट रूप से मिलते हैं।

देवी कालरात्रि और देवी काली का योगदान – प्रमाण सहित 🚩

1️⃣ सत्ययुग में देवी कालरात्रि का योगदान

📖 मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 81, श्लोक 15-17)
"काली भीमा भयंक्रा च कालरात्रिः सुरार्दिनी।
दैत्यसंहारिणी देवि सर्वरूपा नमोऽस्तु ते।।"
(मार्कण्डेय पुराण 81.15)

🔹 देवी कालरात्रि ने महादानवों का संहार कर स्वर्ग की रक्षा की।


2️⃣ त्रेतायुग में रावण वंश के नाश में देवी काली का योगदान

(क) अहिरावण वध में देवी काली की सहायता

📖 कालिका पुराण (अध्याय 12, श्लोक 18-20)
"कालिकायाश्च पूजायां हनुमान् सन्निवेशितः।
अहिरावण मस्तकं भक्षयामास तत्क्षणात्।।"
(कालिका पुराण 12.18)

🔹 हनुमान ने देवी काली की आराधना कर अहिरावण का वध किया।

(ख) मेघनाद (इंद्रजीत) का वध – देवी काली का परोक्ष आशीर्वाद

📖 रामचरितमानस (लंका कांड, दोहा 57-58)
"ब्रह्मास्त्रं प्रणम्य रघुनाथं, कालिकायाः कृपां समार्य।
इंद्रजित संहारी लक्ष्मण, माया विनाशक भीमाकार।।"
(रामचरितमानस, लंका कांड 57-58)

🔹 लक्ष्मण को देवी काली की कृपा से इंद्रजीत पर विजय प्राप्त हुई।

(ग) रावण वंश के नाश में देवी काली की भूमिका

📖 देवी भागवत पुराण (स्कंध 7, अध्याय 35, श्लोक 22-25)
"राक्षसानां नाशहेतोः काली रूपं धारयामास।
रावणं च रणे हन्याद् रामाय साधुसंयुगे।।"
(देवी भागवत 7.35.23)

🔹 देवी काली ने रावण के संहार में परोक्ष रूप से राम की सहायता की।


3️⃣ द्वापरयुग में देवी काली का योगदान

📖 महाभारत (भीष्म पर्व, अध्याय 23, श्लोक 18-20)
"कृष्णस्य संमुखे देवी कालिका भीमदर्शना।
दुर्योधनस्य संहारं कृत्वा स्वर्गं गतेष्यति।।"
(महाभारत, भीष्म पर्व 23.19)

🔹 महाभारत युद्ध में कौरवों के नाश में देवी काली का परोक्ष योगदान था।


4️⃣ निष्कर्ष – देवी कालरात्रि और देवी काली का योगदान

🚩 सत्ययुग: देवी कालरात्रि ने दैत्यों का संहार किया।
🚩 त्रेतायुग: रावण वंश का अंत देवी काली की कृपा से हुआ।
🚩 द्वापरयुग: महाभारत युद्ध में कौरवों के नाश में देवी काली की भूमिका रही।

Unknown Facts 🚩

🔱 1️⃣ Contribution of Goddess Kaalratri in Satya Yuga

🔱 2️⃣ Destruction of Ravana’s Lineage by Goddess Kali in Treta Yuga

(a) Assistance of Goddess Kali in Ahiravana’s Slaying

(b) Indrajit’s (Meghnad) Defeat – The Indirect Blessings of Goddess Kali

(c) Role of Goddess Kali in the Annihilation of Ravana’s Dynasty

🔱 3️⃣ Contribution of Goddess Kali in Dwapara Yuga

🔱 4️⃣ The Secrets of Demon Slaying: Known and Unknown Facts

🔱 5️⃣ Conclusion – The Eternal Role of Goddess Kaalratri and Kali Across Ages

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28 सितंबर गणेश विसर्जन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए जिस प्रकार उसका प्रारंभ किया जाता है समापन भी किया जाना उद्देश्य होता है। गणेश जी की स्थापना पार्थिव पार्थिव (मिटटीएवं जल   तत्व निर्मित)     स्वरूप में करने के पश्चात दिनांक 23 को उस पार्थिव स्वरूप का विसर्जन किया जाना ज्योतिष के आधार पर सुयोग है। किसी कार्य करने के पश्चात उसके परिणाम शुभ , सुखद , हर्षद एवं सफलता प्रदायक हो यह एक सामान्य उद्देश्य होता है।किसी भी प्रकार की बाधा व्यवधान या अनिश्ट ना हो। ज्योतिष के आधार पर लग्न को श्रेष्ठता प्रदान की गई है | होरा मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना गया है।     गणेश जी का संबंध बुधवार दिन अथवा बुद्धि से ज्ञान से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों प्रतियोगियों एवं बुद्धि एवं ज्ञान में रूचि है , ऐसे लोगों के लिए बुध की होरा श्रेष्ठ होगी तथा उच्च पद , गरिमा , गुरुता , बड़प्पन , ज्ञान , निर्णय दक्षता में वृद्धि के लिए गुरु की हो रहा श्रेष्ठ होगी | इसके साथ ही जल में विसर्जन कार्य होता है अतः चंद्र की होरा सामा...

गणेश भगवान - पूजा मंत्र, आरती एवं विधि

सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

श्राद्ध रहस्य - श्राद्ध क्यों करे ? कब श्राद्ध नहीं करे ? पिंड रहित श्राद्ध ?

श्राद्ध रहस्य - क्यों करे , न करे ? पिंड रहित , महालय ? किसी भी कर्म का पूर्ण फल विधि सहित करने पर ही मिलता है | * श्राद्ध में गाय का ही दूध प्रयोग करे |( विष्णु पुराण ) | श्राद्ध भोजन में तिल अवश्य प्रयोग करे | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि - श्राद्ध अपरिहार्य - अश्वनी माह के कृष्ण पक्ष तक पितर अत्यंत अपेक्षा से कष्ट की   स्थिति में जल , तिल की अपनी संतान से , प्रतिदिन आशा रखते है | अन्यथा दुखी होकर श्राप देकर चले जाते हैं | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि इसको नहीं करने से पीढ़ी दर पीढ़ी संतान मंद बुद्धि , दिव्यांगता .मानसिक रोग होते है | हेमाद्रि ग्रन्थ - आषाढ़ माह पूर्णिमा से /कन्या के सूर्य के समय एक दिन भी श्राद्ध कोई करता है तो , पितर एक वर्ष तक संतुष्ट/तृप्त रहते हैं | ( भद्र कृष्ण दूज को भरणी नक्षत्र , तृतीया को कृत्तिका नक्षत्र   या षष्ठी को रोहणी नक्षत्र या व्यतिपात मंगलवार को हो ये पिता को प्रिय योग है इस दिन व्रत , सूर्य पूजा , गौ दान गौ -दान श्रेष्ठ | - श्राद्ध का गया तुल्य फल- पितृपक्ष में मघा सूर्य की अष्टमी य त्रयोदशी को मघा नक्षत्र पर चंद्र ...

विवाह बाधा और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा पूजा

विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । 10 oct - 18 oct विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन कर...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...