सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नाग और मंत्र / मासवार Month-wise Naga /sarp & Mantras:shukl panchmi -vediokt mantr /shabar adhik prabhavi -9424446706 v.k.Tiwari

 

सर्पदंश-भय, सर्पभय, गृह-सुरक्षा, परिवार-सुख और नागदोष-शान्ति

सर्प मंत्र (सर्प सूक्तम)

ऋग्वेद (ऋग्वेद खिलेषु/खिल भाग) और यजुर्वेद (जैसे तैत्तिरीय संहिता) से संबंधित है।

(श्री" नमो अस्तु सर्पेभ्यो ये के पृथिवीमनु।
ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः " [1]

·         पृथ्वी, अंतरिक्ष और आकाश में, तथा सूर्य की किरणों और जल में निवास करने वाले सभी सर्पों को हमारा बारंबार प्रणाम हो

·         **************************************************

·         . वैदिक सर्पसूक्त — “नमोऽस्तु सर्पेभ्यो…”

·         मूल वैदिक स्रोत: कृष्ण यजुर्वेद

·         तैत्तिरीय संहिता, काण्ड 4, प्रपाठक 2, अनुवाक 8 (4.2.8)

·          

·         नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के पृथिवीमनु
येऽन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः

·          

·         येऽदो रोचने दिवो ये वा सूर्यस्य रश्मिषु
येषामप्सु सदः कृतं तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः

·          

·         या इषवो यातुधानानां ये वा वनस्पतीꣳरनु
ये वा वटेषु शेरते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः

·          

·         देवता: सर्पाः / सर्पदेवताःपृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, सूर्यरश्मि, जल, वनस्पति और वट आदि में स्थित सर्प-शक्तियों को नमस्कार।

·         ऋग्वेद-खिलानि 2.14 — सर्प-रक्षा एवं सुख हेतु मंत्र

·          

·         अजगर, कालिय, कर्कोटक आदि सर्पों से संबंधित ऋग्वेद-खिलानि 2.14 के मंत्र सर्पभय तथा सर्पजनित बाधाओं से रक्षा, शान्ति और कल्याण की प्रार्थना के लिए प्रयुक्त परंपरा में आते हैं।

·         . सर्प-रक्षा मंत्र

·          नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के पृथिवीमनु
येऽन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः

·          

·         अर्थ: पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक में स्थित सभी सर्पों को नमस्कार है। वे हमारे प्रति शान्त एवं अनुकूल रहें और हमें सर्पभय से रक्षा प्राप्त हो।

·          

·         ग्रंथ: कृष्ण यजुर्वेदतैत्तिरीय संहिता 4.2.8
यह मंत्र ऋग्वेद-खिलानि 2.14 का मूल मंत्र कहकर लिखें; दोनों पाठ-परंपराओं को अलग रखना चाहिए।

·          

·         . सर्प-शान्ति एवं सुख हेतु

·         येऽदो रोचने दिवो ये वा सूर्यस्य रश्मिषु
येषामप्सु सदः कृतं तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः

·          

·         अर्थ: जो सर्प द्युलोक के प्रकाशमय प्रदेशों में, सूर्य की किरणों में अथवा जल में निवास करते हैं, उन सभी को नमस्कार। वे शान्त रहें और जीवन में भय-बाधा उत्पन्न करें।

·         ग्रंथ: तैत्तिरीय संहिता 4.2.8

·          

·         . वन एवं निवास-स्थान की रक्षा हेतु

·          

·         या इषवो यातुधानानां ये वा वनस्पतीꣳरनु
ये वा वटेषु शेरते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः

·          

·         अर्थ: जो सर्प वनस्पतियों तथा वटवृक्षों में निवास करते हैं, उन सभी सर्पों को नमस्कार। उनसे रक्षा, शान्ति और निर्भयता प्राप्त हो।

·         ग्रंथ: तैत्तिरीय संहिता 4.2.8

  ऋग्वेद-खिलानि 2.14 — सर्प-संबंधी खिल-मंत्र; इसमें कालिय, अजगर, कर्कोटक आदि सर्पों का वर्णन तथा सर्प-नमस्कार मंत्रों है।

शाबर सर्प-रक्षा:

हुं क्षूं ठः ठः।लोक-प्रचलित सर्पभय-नाशक शाबर मंत्र

गरुड़-आज्ञा शाबर मंत्र:
ओइम् ह्रीं ह्रीं गरुड़ाज्ञा ठः ठः।लोक-प्रचलित सर्पभय-नाशक प्रयोग।

 🌿 नाग पंचमी – Naag Panchami Puja (सांप देवता आराधना)

1️⃣ प्रस्तावना – Introduction

हिंदी:
नाग पंचमी को विशेष रूप से नागदेवताओं की पूजा की जाती है। इस दिन नागों की उपासना से धन, संतान सुख, रोग निवारण, सुरक्षा, आयु और सफलता की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि यह दिन विशेष रूप से सर्प दोष, राहु/केतु, या जन्मकुंडली में शनि/सर्प संबंधी दोष वाले व्यक्तियों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

English:
Naag Panchami is dedicated to worshipping the serpent deities. Observing rituals on this day brings wealth, progeny, disease cure, protection, longevity, and success. Scriptures emphasize that it is especially beneficial for individuals with Sarpa Dosh, Rahu/Ketu afflictions, or Shani/serpent-related doshas in their horoscope.


2️⃣ नाग पूजा हेतु आवश्यक राशियाँ – Rashi for Special Benefit

Rashi / ZodiacलाभBenefit
Vrishabha / Taurusधन, संपत्ति की वृद्धिWealth enhancement
Mithun / Geminiसंतान सुखProgeny and family harmony
Vrishchik / Scorpioरोग निवारण, शारीरिक सुरक्षाHealth & protection from diseases
Dhanu / Sagittariusसुरक्षा, लंबी आयुSafety and longevity
Kumbh / Aquariusसफलता, कार्य सिद्धिCareer success & achievements

ध्यान दें: ये राशियाँ शास्त्रीय दृष्टि से विशेष रूप से लाभप्रद मानी गई हैं।


3️⃣ शास्त्रीय श्लोक और अर्थ – Classical Shloka & Meaning

श्लोक (Bold Font, बड़े अक्षरों में):

“ऊँ नागानां महामन्त्रः सर्वसिद्धिफलं ददाति।
नमो नागाय भस्मभूषिताय वासुकयै नमः॥”

अर्थ (Meaning):
इस मंत्र का जप करने से सभी प्रकार की समस्याएँ, विशेष रूप से सर्पदंश, धन-संपत्ति, संतान सुख, रोग, सुरक्षा, और जीवन में सफलता में वृद्धि होती है।


4️⃣ पूजन विधि – Ritual Method

  1. स्थान: घर के पूजा कक्ष या शुद्ध मंदिर में।

  2. सामग्री: नाग तस्वीर/सांप का प्रतिमा, दूध, फूल, चावल, हल्दी, सेंधा नमक, दीपक (सफ़ेद या हरा)।

  3. समय:

    • अशुभ समय से बचें: राहु काल (07:40–09:11 AM), यमघंट (10:42 AM–12:13 PM)

  4. पूजन विधि:

    • दीप प्रज्वलित करें।

    • नाग प्रतिमा के समक्ष दूध, जल, पुष्प और हल्दी अर्पित करें।

    • ऊँ नमो नागाय मंत्र का 108 बार जप करें।

    • अगर संतान सुख चाहते हैं → सिंहासन या चन्द्रमा प्रतिमा के साथ पूजा करें।

    • आराधना के बाद प्रसाद व जल नदी/सिंचाई स्थल में विसर्जित करें।


5️⃣ विशेष लाभ – Specific Benefits

उद्देश्य / Purposeलाभ / Benefit
धन-संपत्तिव्यापार और नौकरी में वृद्धि
संतान सुखसंतान सुख व गृहस्थ जीवन में सुख
रोग निवारणशारीरिक रोग और मानसिक तनाव से मुक्ति
सुरक्षाशत्रु, दुर्घटना और दुर्घटनाओं से सुरक्षा
आयुदीर्घायु और जीवन में स्थिरता
सफलताकार्य, शिक्षा और व्यवसाय में सफलता

2️⃣ मासवार नाग और मंत्र / Month-wise Naga & Mantras:

  • चैत्र / Chaitra: वासुकी नाग / Vasuki Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Vasukaye Namah

    • लाभ / Benefits: घर में संपत्ति, संतान सुख / Wealth and progeny

  • वैशाख / Vaishakh: तक्शक नाग / Takshaka Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Takshakaya Namah

    • लाभ / Benefits: विष, रोग और शत्रु से सुरक्षा / Protection from poison, diseases, enemies

  • ज्येष्ठ / Jyeshtha: पद्म नाग / Padma Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Padmaya Namah

    • लाभ / Benefits: धन और समृद्धि / Wealth and prosperity

  • आषाढ़ / Ashadha: धृतनाग / Dhritanaga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Dhritanagaya Namah

    • लाभ / Benefits: घर की सुरक्षा और शांति / Home protection and peace

  • श्रावण / Shravan: अनंत नाग / Ananta Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Anantaya Namah

    • लाभ / Benefits: दीर्घायु और संतान सुख / Longevity and progeny

  • भाद्रपद / Bhadrapad: कुलिक नाग / Kulik Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Kulikaya Namah

    • लाभ / Benefits: रोग निवारण और संपत्ति / Disease protection and wealth

  • आश्विन / Ashwin: महापद्म / Manasa नाग / Mahapadma & Manasa Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Mahapadmaya Namah / Om Manasaya Namah

    • लाभ / Benefits: संतान सुख और समृद्धि / Progeny and prosperity

  • कार्तिक / Kartik: कर्कोटक नाग / Karkotaka Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Karkotakaya Namah

    • लाभ / Benefits: घर की सुरक्षा और धन / Home protection and wealth

  • मार्गशीर्ष / Margashirsha: शंखपाल नाग / Shankhapala Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Shankhapalaya Namah

    • लाभ / Benefits: शत्रु नाश और समृद्धि / Destroy enemies and prosperity

  • पौष / Paush: धृतनाग / Dhritanaga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Dhritanagaya Namah

    • लाभ / Benefits: रोग निवारण और सुरक्षा / Disease protection and safety

  • माघ / Magha: अनंत नाग / Ananta Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Anantaya Namah

    • लाभ / Benefits: संतान सुख और शांति / Progeny and peace

  • फाल्गुन / Phalguna: शंखपाल नाग / Shankhapala Naga

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Shankhapalaya Namah

    • लाभ / Benefits: धन और समृद्धि / Wealth and prosperity


1️⃣ मासवार पूजन विवरण – नाग और देवता

माहनाग / देवतामंत्र (Mantra)विशेषता / फल
चैत्रवासुकी नाग🕉️ Om Vasukaye Namahघर में संपत्ति और संतान सुख
वैशाखतक्शक नाग🕉️ Om Takshakaya Namahरोग, विष और शत्रु से रक्षा
ज्येष्ठपद्म नाग🕉️ Om Padmaya Namahधन और समृद्धि
आषाढ़धृतनाग🕉️ Om Dhritanagaya Namahघर की सुरक्षा और शांति
श्रावणअनंत नाग🕉️ Om Anantaya Namahदीर्घायु और संतान सुख
भाद्रपदकुलिक नाग🕉️ Om Kulikaya Namahरोग निवारण और संपत्ति
आश्विनमहापद्म नाग / मनसा नाग🕉️ Om Mahapadmaya Namah / Om Manasaya Namahसंतान सुख, समृद्धि
कार्तिककर्कोटक नाग🕉️ Om Karkotakaya Namahघर की सुरक्षा और धन
मार्गशीर्षशंखपाल नाग🕉️ Om Shankhapalaya Namahशत्रु नाश और समृद्धि
पौषधृतनाग🕉️ Om Dhritanagaya Namahरोग निवारण और सुरक्षा
माघअनंत नाग🕉️ Om Anantaya Namahसंतान सुख और शांति
फाल्गुनशंखपाल नाग🕉️ Om Shankhapalaya Namahधन और समृद्धि

3️⃣ विशेष देवता पूजन / Special Deity Worship:

  • सरस्वती देवी / Goddess Saraswati:

    • मास / Month: चैत्र और आश्विन / Chaitra & Ashwin

    • मंत्र / Mantra: 🕉️ Om Saraswatyai Namah

    • लाभ / Benefits: विद्या, बुद्धि, शिक्षा में सफलता / Success in knowledge, intellect, education


    • मनसा देवी द्वादशनामनागभय निवारण-

      ( ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति-खण्ड, अध्याय 46, श्लोक 130)

      नमो मनसायै।

      जरत्कारु जगद्गौरी मनसा सिद्ध योगिनी।
      वैष्णवी नाग भगिनी शैवी नागेश्वरी तथा

      जरत्कारु प्रियाऽऽस्तीक माता विष हरीति च।
      महाज्ञान युता चैव सा देवी विश्व पूजिता

      अर्थ: मनसा देवी के जरत्कारु, जगद्गौरी, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विषहरी और महाज्ञानयुता आदि नामों का स्मरण किया गया है। इनके पाठ से नागभय से रक्षा का फल बताया गया है।

       

      श्री नाग स्तोत्रमूल पाठ एवं सरल हिन्दी अर्थ

      अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव
      सुमन्तु र्जैमिनिश्चैव पञ्चैते वज्रवारकाः

      अर्थ: अगस्त्य, पुलस्त्य, वैशम्पायन, सुमन्तु और जैमिनिये पाँच महर्षि वज्र से होने वाली बाधाओं के निवारक माने गए हैं। इनका स्मरण रक्षा प्रदान करने वाला माना जाता है।

      मुनेः कल्याण मित्रस्य जैमिनेश्चापि कीर्तनात्
      विद्युदग्नि भयं नास्ति लिखितं गृह मण्डले

      अर्थ: कल्याणमित्र मुनि और जैमिनि ऋषि के नाम का स्मरण करने तथा इस स्तोत्र को घर के मंडल/पूजा-स्थान में लिखने से बिजली और अग्नि के भय से रक्षा होने की मान्यता कही गई है।

      अनन्तो वासुकिः पद्मो महापद्मश्च तक्षकः
      कुलीरः कर्कटः शङ्खश्चाष्टौ नागाः प्रकीर्तिताः

      अर्थ: अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट और शंखये आठ प्रमुख नाग बताए गए हैं। इनका स्मरण नागदेवताओं की स्तुति एवं संरक्षण के लिए किया जाता है।

      यत्राहिशायी भगवान् यत्रास्ते हरिरीश्वरः
      भङ्गो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा

      अर्थ: जहाँ भगवान् श्रीहरि शेषनाग पर शयन करते हैं, जहाँ स्वयं हरि भगवान् विराजमान हैं, वहाँ इन्द्र के वज्र की शक्ति भी निष्फल हो जाती है; फिर साधारण शूल अथवा अन्य बाधा की वहाँ क्या सामर्थ्य है।

      पाठ का मुख्य फलार्थ

      इस स्तोत्र में ऋषियों तथा अष्टनागों का स्मरण करके नागभय, अग्निभय, विद्युत्भय तथा विभिन्न आकस्मिक बाधाओं से रक्षा की प्रार्थना की गई है। अंतिम श्लोक में श्रीहरि और शेषनाग की दिव्य सत्ता को सर्वोच्च संरक्षण का आधार माना गया है।

      ***************************************

      सूक्त

      ब्रह्म लोकेषु ये सर्पाः शेषनागपुरोगमाः नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा

       इन्द्र लोकेषु ये सर्पाः वासुकि प्रमुखाद्याः नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा

      कद्रवेयश्च ये सर्पाः मातृ भक्ति परायणाः नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा

      सत्य लोकेषु ये सर्पाः वासुकिना रक्षिताः नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा

      मलये चैव ये सर्पाः कर्कोटक प्रमुखाद्याः नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा

      पृथिव्यां चैव ये सर्पाः ये साकेत वासिताः नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा

       ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पाः प्रचरन्ति नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा

      समुद्र तीरे ये सर्पाः ये सर्पा जल वासिनः नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा

       रसातलेषु ये सर्पाः अनन्तादि महाबलाः नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा


    • नाग को दूध अर्पण करने का शास्त्रीय आधार

      नागपञ्चमी पर वास्तविक सर्प को दूध पिलाना और नागदेवता की प्रतिमा/चित्र को दूध अर्पित करना—इन दोनों को अलग रखना चाहिए। शास्त्रीय पूजा-विधि में मुख्यतः नाग-प्रतिमा, नाग-चित्र अथवा नागदेवता को दूध, दधि, अक्षत, पुष्प आदि अर्पित करने का विधान मिलता है। वास्तविक सर्प को जबरन दूध पिलाना धार्मिक आवश्यकता नहीं है और सर्प के लिए हानिकारक भी हो सकता है।

      गरुड़ पुराण के नागपञ्चमी-विधान में घर के दोनों ओर नाग की आकृति बनाकर अनन्त आदि महानागों का पूजन करने का उल्लेख मिलता है।

      नारद पुराण में नाग-व्रत का संबंध सर्पभय एवं सर्पदंश से रक्षा से बताया गया है। परंपरागत विवरण में नाग को दूध अर्पण करने का विधान भी मिलता है।

      दूध अर्पण का फल परंपरा में सर्पभय-शमन, नागदेवता की प्रसन्नता, परिवार की रक्षा और नागदोष/सर्पदोष की शान्ति से जोड़ा जाता है। लेकिन “दूध पिलाने से निश्चित रूप से कालसर्प दोष समाप्त होता है” ऐसा फल प्रत्येक मूल ग्रंथ में उसी शब्दों में लिखा है, ऐसा दावा नहीं करना चाहिए।

      नाग-मंत्र

      “Om Sarpaya Namah”
      “Om Anantaya Namah”
      “Om Vasukaye Namah”
      “Om Nagaya Namah”
      “Om Prithvidharaya Namah”

      नागपूजा में इन नाम-मंत्रों का प्रयोग प्रचलित है।

      नाग सूक्त का प्रमुख मंत्र

      “Brahmalokeshu ye sarpa Sheshanaga purogamah,
      Namostu tebhyaḥ sarpebhyaḥ supreeto mama sarvada.”

      यह सर्प-सूक्त/नाग-स्तुति परंपरा में प्रचलित मंत्र है और नागदेवता की प्रसन्नता तथा सर्पभय-शान्ति के लिए पाठ किया जाता है।

      मुख्य द्वार पर सर्प-चित्र का महत्व

      गरुड़ पुराण से संबंधित नागपञ्चमी-विधान में गृह-द्वार के दोनों ओर नाग की आकृति बनाकर अनन्त आदि नागों की पूजा का उल्लेख मिलता है।

      इसलिए मुख्य द्वार के दोनों पार्श्वों पर नाग-चित्र लगाने की परंपरा का मूल उद्देश्य नागदेवता का आवाहन, पूजन और सर्पभय से रक्षा की धार्मिक भावना है। आधुनिक वास्तु-व्याख्याओं में इसे घर की रक्षा एवं मंगल से जोड़ा जाता है, लेकिन इसे स्वतंत्र प्राचीन वास्तु-सूत्र के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

      किस रंग का नाग-चित्र रखें?

      पीला/हल्दी रंग — नागपञ्चमी के लिए सबसे उपयुक्त पारंपरिक विकल्प।
      लाल/गेरुआ — पूजा एवं शक्ति-भावना के लिए।
      चन्दन का हल्का पीला/सफेद — सात्त्विक एवं शांतिपूर्ण विकल्प।
      हरा — नाग-प्रकृति से प्रतीकात्मक रूप से जुड़ा रंग, परंतु इसे अनिवार्य शास्त्रीय नियम नहीं कहा जा सकता।
      काला नाग-चित्र — भयावह अथवा अत्यधिक उग्र आकृति के रूप में घर के मुख्य द्वार पर लगाने से बचना बेहतर है।

      विशेष रूप से: यदि नागपञ्चमी के दिन द्वार पर चित्र बनाना हो तो हल्दी/चन्दन से पीला नाग, अथवा गेरू से नाग-युगल बनाना पारंपरिक रूप से अधिक उचित है। वास्तविक सर्प को दूध पिलाने के बजाय नाग-प्रतिमा/चित्र को दूध अर्पित करें

    • द्वार पर नाग-चित्र कब बनाना चाहिए — ग्रंथ प्रमाण

      गरुड़ पुराण, व्रत-विधान में नाग-पञ्चमी के संबंध में स्पष्ट निर्देश मिलता है कि शुक्ल पक्ष की पंचमी को घर के द्वार के दोनों ओर नागों के चित्र बनाकर उनका नामपूर्वक आवाहन और पूजन किया जाए। उपलब्ध अनुवाद में यह विधान भाद्रपद शुक्ल पंचमी के संदर्भ में दिया गया है।

      श्लोक/विधान का अर्थ:
      “The pictures of these celestial serpents should be drawn on each side of the door of the house under the auspices of the fifth phase of the moon’s increase…” — अर्थात शुक्ल पंचमी के दिन घर के प्रवेश-द्वार के दोनों ओर नागों की आकृतियाँ बनाकर उनका आवाहन एवं पूजन किया जाए। उसी विधान में नाग-चित्रों को दूध और घी अर्पित करने का उल्लेख है तथा इसे सर्पदंश के भय से रक्षा से जोड़ा गया है।

      किस समय बनाएं?

      ग्रंथ में घड़ी-मिनट का कोई निश्चित समय नहीं दिया गया है। इसलिए “सूर्योदय से पहले ही बनाना चाहिए” अथवा कोई निश्चित घंटे का समय गरुड़ पुराण का श्लोक बताकर नहीं लिखना चाहिए

      शास्त्रीय रूप से सही क्रम है:

      स्नान → शुद्धि → संकल्प → नाग-चित्र निर्माण → आवाहन → पूजन।

      आज 17 अगस्त 2026 की नागपञ्चमी में पंचमी तिथि लगभग 16 अगस्त 2026, 16:55 से 17 अगस्त 2026, 17:00 तक बताई गई है। अतः 17 अगस्त को पंचमी रहते हुए प्रातःकाल पूजा करना उचित है।

      नाग का चित्र किससे बनाएं?

      नागपञ्चमी की प्रचलित पूजाविधि में हल्दी-मिश्रित चन्दन से दीवार अथवा पूजा-पाट पर नाग अथवा नवनागों का चित्र बनाने का स्पष्ट निर्देश मिलता है।

      अतः मुख्य द्वार के दोनों पार्श्वों पर हल्दी-मिश्रित चन्दन से नाग बनाना सबसे उपयुक्त है। गेरू/रक्तचन्दन की परंपरा भी कुछ क्षेत्रों में मिलती है।

      चित्र बनाते समय कौन-सा मंत्र बोलें?

      सबसे सरल और सीधे पूजन में प्रयुक्त मंत्र:

      “Om Anantadim Nagadevataabhyo Namah.”

      अर्थ — अनन्त आदि समस्त नागदेवताओं को नमस्कार।

      नवनागों का अलग-अलग आवाहन करना हो तो:

      “Om Anantaya Namah. Anantam Avahayami.”
      “Om Vasukaye Namah. Vasukim Avahayami.”
      “Om Sheshaya Namah. Shesham Avahayami.”
      “Om Shankhaya Namah. Shankham Avahayami.”
      “Om Padmaya Namah. Padmam Avahayami.”
      “Om Kambalaya Namah. Kambalam Avahayami.”
      “Om Karkotakaya Namah. Karkotakam Avahayami.”
      “Om Ashvataraya Namah. Ashvataram Avahayami.”
      “Om Dhritarashtraya Namah. Dhritarashtram Avahayami.”
      “Om Takshakaya Namah. Takshakam Avahayami.”
      “Om Kaliyaya Namah. Kaliyam Avahayami.”
      “Om Kapilaya Namah. Kapilam Avahayami.”

      यह क्रम नागपञ्चमी की पूजाविधि में दिया गया है।

      चित्र बनाते समय विशेष नियम:
      पहले नाग की आकृति बनाएं, फिर अक्षत लेकर “Om Anantadim Nagadevataabhyo Namah” कहकर आवाहन करें। उसके बाद गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। दूध चित्र/प्रतिमा को अर्पित किया जा सकता है; वास्तविक जीवित सर्प को दूध पिलाना आवश्यक शास्त्रीय कर्म नहीं है। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

श्राद्ध की गूढ़ बाते ,किसकी श्राद्ध कब करे

श्राद्ध क्यों कैसे करे? पितृ दोष ,राहू ,सर्प दोष शांति ?तर्पण? विधि             श्राद्ध नामा - पंडित विजेंद्र कुमार तिवारी श्राद्ध कब नहीं करें :   १. मृत्यु के प्रथम वर्ष श्राद्ध नहीं करे ।   २. पूर्वान्ह में शुक्ल्पक्ष में रात्री में और अपने जन्मदिन में श्राद्ध नहीं करना चाहिए ।   ३. कुर्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति अग्नि विष आदि के द्वारा आत्महत्या करता है उसके निमित्त श्राद्ध नहीं तर्पण का विधान नहीं है । ४. चतुदर्शी तिथि की श्राद्ध नहीं करना चाहिए , इस तिथि को मृत्यु प्राप्त पितरों का श्राद्ध दूसरे दिन अमावस्या को करने का विधान है । ५. जिनके पितृ युद्ध में शस्त्र से मारे गए हों उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करने से वे प्रसन्न होते हैं और परिवारजनों पर आशीर्वाद बनाए रखते हैं ।           श्राद्ध कब , क्या और कैसे करे जानने योग्य बाते           किस तिथि की श्राद्ध नहीं -  १. जिस तिथी को जिसकी मृत्यु हुई है , उस तिथि को ही श्राद्ध किया जाना चा...

रामचरितमानस की चौपाईयाँ-मनोकामना पूरक सरल मंत्रात्मक (ramayan)

*****मनोकामना पूरक सरल मंत्रात्मक रामचरितमानस की चौपाईयाँ-       रामचरितमानस के एक एक शब्द को मंत्रमय आशुतोष भगवान् शिव ने बना दिया |इसलिए किसी भी प्रकार की समस्या के लिए सुन्दरकाण्ड या कार्य उद्देश्य के लिए लिखित चौपाई का सम्पुट लगा कर रामचरितमानस का पाठ करने से मनोकामना पूर्ण होती हैं | -सोमवार,बुधवार,गुरूवार,शुक्रवार शुक्ल पक्ष अथवा शुक्ल पक्ष दशमी से कृष्ण पक्ष पंचमी तक के काल में (चतुर्थी, चतुर्दशी तिथि छोड़कर )प्रारंभ करे -   वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र-शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को स्मरण कर  इनका सम्पुट लगा कर पढ़े या जप १०८ प्रतिदिन करते हैं तो ११वे दिन १०८आहुति दे | अष्टांग हवन सामग्री १॰ चन्दन का बुरादा , २॰ तिल , ३॰ शुद्ध घी , ४॰ चीनी , ५॰ अगर , ६॰ तगर , ७॰ कपूर , ८॰ शुद्ध केसर , ९॰ नागरमोथा , १०॰ पञ्चमेवा , ११॰ जौ और १२॰ चावल। १॰ विपत्ति-नाश - “ राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।। ” २॰ संकट-नाश - “ जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।। जपहिं ना...

दुर्गा जी के अभिषेक पदार्थ विपत्तियों के विनाशक एक रहस्य | दुर्गा जी को अपनी समस्या समाधान केलिए क्या अर्पण करना चाहिए?

दुर्गा जी   के अभिषेक पदार्थ विपत्तियों   के विनाशक एक रहस्य | दुर्गा जी को अपनी समस्या समाधान केलिए क्या अर्पण करना चाहिए ? अभिषेक किस पदार्थ से करने पर हम किस मनोकामना को पूर्ण कर सकते हैं एवं आपत्ति विपत्ति से सुरक्षा कवच निर्माण कर सकते हैं | दुर्गा जी को अर्पित सामग्री का विशेष महत्व होता है | दुर्गा जी का अभिषेक या दुर्गा की मूर्ति पर किस पदार्थ को अर्पण करने के क्या लाभ होते हैं | दुर्गा जी शक्ति की देवी हैं शीघ्र पूजा या पूजा सामग्री अर्पण करने के शुभ अशुभ फल प्रदान करती हैं | 1- दुर्गा जी को सुगंधित द्रव्य अर्थात ऐसे पदार्थ ऐसे पुष्प जिनमें सुगंध हो उनको अर्पित करने से पारिवारिक सुख शांति एवं मनोबल में वृद्धि होती है | 2- दूध से दुर्गा जी का अभिषेक करने पर कार्यों में सफलता एवं मन में प्रसन्नता बढ़ती है | 3- दही से दुर्गा जी की पूजा करने पर विघ्नों का नाश होता है | परेशानियों में कमी होती है | संभावित आपत्तियों का अवरोध होता है | संकट से व्यक्ति बाहर निकल पाता है | 4- घी के द्वारा अभिषेक करने पर सर्वसामान्य सुख एवं दांपत्य सुख में वृद्धि होती...

श्राद्ध:जानने योग्य महत्वपूर्ण बातें |

श्राद्ध क्या है ? “ श्रद्धया यत कृतं तात श्राद्धं | “ अर्थात श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म श्राद्ध है | अपने माता पिता एवं पूर्वजो की प्रसन्नता के लिए एवं उनके ऋण से मुक्ति की विधि है | श्राद्ध क्यों करना चाहिए   ? पितृ ऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध किया जाना अति आवश्यक है | श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम ? यदि मानव योनी में समर्थ होते हुए भी हम अपने जन्मदाता के लिए कुछ नहीं करते हैं या जिन पूर्वज के हम अंश ( रक्त , जींस ) है , यदि उनका स्मरण या उनके निमित्त दान आदि नहीं करते हैं , तो उनकी आत्मा   को कष्ट होता है , वे रुष्ट होकर , अपने अंश्जो वंशजों को श्राप देते हैं | जो पीढ़ी दर पीढ़ी संतान में मंद बुद्धि से लेकर सभी प्रकार की प्रगति अवरुद्ध कर देते हैं | ज्योतिष में इस प्रकार के अनेक शाप योग हैं |   कब , क्यों श्राद्ध किया जाना आवश्यक होता है   ? यदि हम   96  अवसर पर   श्राद्ध   नहीं कर सकते हैं तो कम से कम मित्रों के लिए पिता माता की वार्षिक तिथि पर यह अश्वनी मास जिसे क्वांर का माह    भी कहा ज...

श्राद्ध रहस्य प्रश्न शंका समाधान ,श्राद्ध : जानने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य -कब,क्यों श्राद्ध करे?

संतान को विकलांगता, अल्पायु से बचाइए श्राद्ध - पितरों से वरदान लीजिये पंडित विजेंद्र कुमार तिवारी jyotish9999@gmail.com , 9424446706   श्राद्ध : जानने  योग्य   महत्वपूर्ण तथ्य -कब,क्यों श्राद्ध करे?  श्राद्ध से जुड़े हर सवाल का जवाब | पितृ दोष शांति? राहू, सर्प दोष शांति? श्रद्धा से श्राद्ध करिए  श्राद्ध कब करे? किसको भोजन हेतु बुलाएँ? पितृ दोष, राहू, सर्प दोष शांति? तर्पण? श्राद्ध क्या है? श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम क्या संभावित है? श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम क्या संभावित है? श्राद्ध की प्रक्रिया जटिल एवं सबके सामर्थ्य की नहीं है, कोई उपाय ? श्राद्ध कब से प्रारंभ होता है ? प्रथम श्राद्ध किसका होता है ? श्राद्ध, कृष्ण पक्ष में ही क्यों किया जाता है श्राद्ध किन२ शहरों में  किया जा सकता है ? क्या गया श्राद्ध सर्वोपरि है ? तिथि अमावस्या क्या है ?श्राद्द कार्य ,में इसका महत्व क्यों? कितने प्रकार के   श्राद्ध होते   हैं वर्ष में   कितने अवसर श्राद्ध के होते हैं? कब  श्राद्ध किया जाना...

गणेश विसृजन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि

28 सितंबर गणेश विसर्जन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए जिस प्रकार उसका प्रारंभ किया जाता है समापन भी किया जाना उद्देश्य होता है। गणेश जी की स्थापना पार्थिव पार्थिव (मिटटीएवं जल   तत्व निर्मित)     स्वरूप में करने के पश्चात दिनांक 23 को उस पार्थिव स्वरूप का विसर्जन किया जाना ज्योतिष के आधार पर सुयोग है। किसी कार्य करने के पश्चात उसके परिणाम शुभ , सुखद , हर्षद एवं सफलता प्रदायक हो यह एक सामान्य उद्देश्य होता है।किसी भी प्रकार की बाधा व्यवधान या अनिश्ट ना हो। ज्योतिष के आधार पर लग्न को श्रेष्ठता प्रदान की गई है | होरा मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना गया है।     गणेश जी का संबंध बुधवार दिन अथवा बुद्धि से ज्ञान से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों प्रतियोगियों एवं बुद्धि एवं ज्ञान में रूचि है , ऐसे लोगों के लिए बुध की होरा श्रेष्ठ होगी तथा उच्च पद , गरिमा , गुरुता , बड़प्पन , ज्ञान , निर्णय दक्षता में वृद्धि के लिए गुरु की हो रहा श्रेष्ठ होगी | इसके साथ ही जल में विसर्जन कार्य होता है अतः चंद्र की होरा सामा...

श्राद्ध रहस्य - श्राद्ध क्यों करे ? कब श्राद्ध नहीं करे ? पिंड रहित श्राद्ध ?

श्राद्ध रहस्य - क्यों करे , न करे ? पिंड रहित , महालय ? किसी भी कर्म का पूर्ण फल विधि सहित करने पर ही मिलता है | * श्राद्ध में गाय का ही दूध प्रयोग करे |( विष्णु पुराण ) | श्राद्ध भोजन में तिल अवश्य प्रयोग करे | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि - श्राद्ध अपरिहार्य - अश्वनी माह के कृष्ण पक्ष तक पितर अत्यंत अपेक्षा से कष्ट की   स्थिति में जल , तिल की अपनी संतान से , प्रतिदिन आशा रखते है | अन्यथा दुखी होकर श्राप देकर चले जाते हैं | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि इसको नहीं करने से पीढ़ी दर पीढ़ी संतान मंद बुद्धि , दिव्यांगता .मानसिक रोग होते है | हेमाद्रि ग्रन्थ - आषाढ़ माह पूर्णिमा से /कन्या के सूर्य के समय एक दिन भी श्राद्ध कोई करता है तो , पितर एक वर्ष तक संतुष्ट/तृप्त रहते हैं | ( भद्र कृष्ण दूज को भरणी नक्षत्र , तृतीया को कृत्तिका नक्षत्र   या षष्ठी को रोहणी नक्षत्र या व्यतिपात मंगलवार को हो ये पिता को प्रिय योग है इस दिन व्रत , सूर्य पूजा , गौ दान गौ -दान श्रेष्ठ | - श्राद्ध का गया तुल्य फल- पितृपक्ष में मघा सूर्य की अष्टमी य त्रयोदशी को मघा नक्षत्र पर चंद्र ...

गणेश भगवान - पूजा मंत्र, आरती एवं विधि

सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

विवाह बाधा और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा पूजा

विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । 10 oct - 18 oct विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन कर...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...