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जानकी जयंती ,सीता अष्टमी,फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि,सीता जी -प्राकट्य दिवसश्रीजानकी स्तुतिः श्रीस्कन्दमहापुराणे ,(अखंड सौभाग्य ,संतान सुख),

जानकी जयंती-

 पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि , सीता अष्टमी है। 

पौराणिक संदर्भ:

- सीता राजा जनक की पुत्री थीं, इसलिए उन्हें 'जानकी' भी कहा जाता है। परमात्मा की शक्ति स्वरूपा सीता जी  इच्छा-शक्ति तथा ज्ञान-शक्ति हैं।

 पौराणिक संदर्भ

1. पद्म पुराण में सीता अष्टमी:

पद्म पुराण के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को माता सीता जी का प्राकट्य दिवस माना जाता है। इस दिन राजा जनक ने हल चलाने पर भूमि से माता सीता को प्राप्त किया था, इसलिए इसे "सीता अष्टमी" कहा जाता है।

2. भविष्य पुराण में सीता अष्टमी:

भविष्य पुराण में भी सीता अष्टमी का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि इस दिन माता सीता की पूजा करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह दिन विशेष रूप से महिलाओं के लिए शुभ माना जाता है, और इस दिन व्रत, पूजन, तथा कथा करने से सौभाग्य और संतान सुख की प्राप्ति होती

जानकी जयंती और इसकी पौराणिक जानकारी

जानकी जयंती जिसे सीता अष्टमी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह माता सीता जी के प्राकट्य दिवस के रूप में प्रसिद्ध है।



माता सीता का जन्म

पुराणों के अनुसार, मिथिला के राजा जनक जब एक बार हल चलाकर यज्ञ भूमि तैयार कर रहे थे, तब उन्हें भूमि के अंदर से एक सोने के पात्र में रखी हुई दिव्य कन्या प्राप्त हुई। राजा ने इस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और नाम रखा "सीता"। चूंकि वे जनक की पुत्री थीं, इसलिए उन्हें "जानकी" भी कहा जाता है।

रामायण में माता सीता का महत्व

  1. श्रीराम की अर्धांगिनी: माता सीता ने राजा जनक की पुत्री होते हुए भी सादा जीवन जिया और श्रीराम के साथ वनवास, संघर्ष और धर्म का पालन किया।
  2. अग्नि परीक्षा: लंका विजय के बाद माता सीता ने अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा दी।
  3. त्याग और धैर्य: उन्होंने वाल्मीकि आश्रम में अपने पुत्र लव-कुश का पालन-पोषण किया और अंत में धरती में विलीन हो गईं

जानकी जयंती का महत्व

  1. महिलाओं के लिए विशेष दिन: यह व्रत विवाहित और अविवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
  2. अखंड सौभाग्य का वरदान: जो महिलाएं माता सीता की पूजा करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
  3. संतान सुख की प्राप्ति: नि:संतान दंपति यदि इस दिन श्रद्धा पूर्वक माता सीता का पूजन करते हैं, तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।

पूजा विधि

  1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. माता सीता और भगवान राम की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल और मिठाई अर्पित करें।
  4. सीता अष्टमी व्रत कथा का पाठ करें।

मंत्र

1. माता सीता के नाम स्मरण हेतु:
"
ॐ जानकीवल्लभाय स्वाहा।"

2. संपूर्ण परिवार की सुख-समृद्धि के लिए:
"
श्रीसीतायै नमः।"

3. अखंड सौभाग्य के लिए:
"
ॐ रामायै नमः।"

श्रीजानकी स्तुतिः श्रीस्कन्दमहापुराणे

जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम् । जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ १॥ दारिद्र्यरण संहत्रीं भक्तानाभिष्ट दायिनीम् । विदेह राज तनयां राघवानन्द कारिणीम् ॥ २॥ भूमेर्दुहितरं विद्यां नमामि प्रकृतिं शिवाम् । पौलस्त्यैश्वर्य सन्त्री भक्ता भीष्टां सरस्वतीम् ॥ ३॥ पतिव्रता धुरीणां त्वां नमामि जनकात्मजाम् । अनुग्रह परामृद्धिमनघां हरिवल्लभाम् ॥ ४॥ आत्म विद्यां त्रयीरूपामुमारूपां नमाम्यहम् । प्रसादाभिमुखीं लक्ष्मीं क्षीराब्धितनयां शुभाम् ॥ ५॥ नमामि चन्द्र भगिनीं सीतां सर्वाङ्ग सुन्दरीम् । नमामि धर्म निलयां करुणां वेदमातरम् ॥ ६॥ पद्मालयां पद्महस्तां विष्णुवक्ष स्थलालयाम् । नमामि चन्द्रनिलयां सीतां चन्द्र निभाननाम् ॥ ७॥ आह्लाद रूपिणीं सिद्धि शिवां शिवकरी सतीम् । नमामि विश्व जननीं रामचन्द्रेष्टवल्लभाम् । सीतां सर्वानवद्याङ्गीं भजामि सततं हृदा ॥ ८॥ इति श्रीस्कन्दमहापुराणे सेतुमाहात्म्ये श्रीहनुमत्कृता श्रीजानकीस्तुतिः सम्पूर्णा । भावार्थ - श्रीहनुमान्जी बोले-- जनक नन्दिनी ! आपको नमस्कार करता हूँ ।
 आप पापों का नाश तथा दारिद्र्य का संहार करने वाली हैं । भक्तों को
अभीष्ट वस्तु देने वाली आप ही हैं । श्रीराम को आनन्द
प्रदान करने वाली, जनक की  श्री किशोरीजी को मैं
प्रणाम करता हूँ । 
आप पृथ्वी की कन्या आर विद्या (ज्ञान) -स्वरूपा
हैं, कल्याणमयी प्रकृति भी आप ही हैं । 
रावण के ऐश्वर्य का संहार , अभीष्टका दान वाली सरस्वती रूपा भगवती सीता को
मैं नमस्कार करता हूँ ।
 पतिव्रताओं मे अग्रगण्य आप श्रीजनकदुलारीको मैं प्रणाम करता हूँ । आप अनुग्रह करनेवाली समृद्धि,
पापरहित और विष्णुप्रिया लक्ष्मी हैं 
 आप ही आत्मविद्या, वेदत्रयीतथा पार्वतीस्वरूपा हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।
 आप हीक्षीर सागर की कन्या महालक्ष्मी हैं,  कृपा-प्रसाद
प्रदान के लिये सदा उत्सुक रहती हैं ।
 चन्द्रमा की भगिनी(लक्ष्मीस्वरूपा) सर्वांग सुन्दरी सीताको मैं प्रणाम करता हूँ ।
धर्म- आश्रयभूता, करुणामयी ,वेदमाता, गायत्री,स्वरूपिणी श्रीजानकीको
मैं नमस्कार करता हूँ । 
. हाथ मे कमल धारण करनेवाली ,भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में निवास
करनेवाली लक्ष्मी हैं, चन्द्र मण्डल में भी आपका निवास है. 
  चन्द्रमुखी सीता देवी को मैं नमस्कार करता हूँ । आप श्रीरघुनन्दन
की आह्लादमयी- कल्याणमयी सिद्धि हैं , भगवान् शिव
की अर्द्धांगिनी कल्याणकारिणी सती हैं । 
श्रीरामचन्द्रजी की परम प्रियतमा जगदम्बा जानकी को मैं प्रणाम करता हूँ ।
 सीताजी का मैं अपने हृदयमे निरन्तर चिन्तन करता हूँ ।

-श्रीस्कन्दमहापुराणान्तर्गत सेतुमाहात्म्य में श्रीजानकी स्तुति सम्पूर्ण हुई ।

महत्व: पृथ्वी दान का फल,

जानकी जयंती के दिन माता सीता की पूजा से विशेष फल की प्राप्ति होती है। इस दिन राम सहित सीता का विधि-विधान से पूजन करने से पृथ्वी दान का फल,

- सोलह महान् दान तथा तीर्थ दर्शन का फल मिलता .

- जानकी जयंती का पर्व- माता सीता के आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है। 

विशेष तथ्य-

  • माता सीता को धरती की बेटी माना जाता है, इसलिए कृषि और उर्वरता से जुड़ी देवियों में भी उनकी पूजा होती है
  • त्रेता युग में माता सीता ने धर्म, त्याग, सहनशीलता और नारी शक्ति का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
  • वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, स्कंद पुराण और पद्म पुराण में माता सीता के जीवन का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

मंत्र: सुख, और समृद्धि

 'श्री जानकी स्तुति' का  पाठ करने से जीवन में सुख, और समृद्धि आती है।

  •  श्री जानकी स्तुति -तुलसीदास जी द्वारा रचित जानकी स्तुति (Janki Stuti)
    भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जनहितकारि भयहारी। 
    अतुलित छबि भारी मुनि - मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी।।

    सुन्दर सिंघासन तेहीं पर आसन कोटि हुताशन धुतिकारी। 
    सिर छत्र बिराजै सखि संग भ्राजे निज - निज कारज करधारी।।

    सुर सिद्ध सुजाना हनै निशाना चढ़े बिमान समुदाई। 
    बरषहिं बहुफूला मंगल मूला अनुकूला सिय गन गाई।।

    देखहिं सब ठाढ़े लोचन गाढ़े सुख बाढ़े उर अधिकाई। 
    अस्तुति मुनि करहिं आनंद भरहीं पायन्ह परहीं हरषाई।।

    ऋषि नारद आये नाम सुनाये सुनि सुख पाये नृप ज्ञानी। 
    सीता अस नामा पूरन कामा सब सुखधामा गुण खानी।।

    सिय सन मुनिराई विनय सुनाई सतय सुहाई मृदुबानी। 
    लालन तन लीजै चरित सुकीजै यह सुख दीजै नृपरानी।।

    सुनि मुनिबर बानी सिय मुस्कानी लीला ठानी सुखदाई। 
    सोवत जनु जागीं रोवन लागीं नृप बड़ भागी उर लाई।।

    दम्पति अनुरागे प्रेम सुपागेउ यह सुख लायउ मनलाई। 
    अस्तुति सिय केरी प्रेमलतेरी बरनि सुचेरी सिर नाइ।।

    दोहा 

    निज इच्छा मखभूमि ते प्रगट भई सिय आय। 
    चरित किये पावन परम बरधन मोद निकाय।।

 

सीता अष्टमी का पौराणिक महत्व

  • पद्म पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार, मिथिला के राजा जनक जी ने हल चलाते समय भूमि से देवी सीता को प्राप्त किया था। इस कारण माता सीता को "भूमिजा", "जानकी", "वैदेही" और "मिथिलेश्वरी" कहा जाता है।
  • यह दिन नारी शक्ति, धैर्य, सतीत्व और त्याग का प्रतीक माना जाता है।
  • इस दिन माता सीता के आदर्शों का अनुसरण करने और उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए विशेष पूजा, व्रत, और कथा का आयोजन किया जाता है

निष्कर्ष

जानकी जयंती केवल माता सीता के जन्म उत्सव नहीं है, बल्कि यह नारी शक्ति, धैर्य, त्याग और आदर्श जीवन का संदेश भी देती है। इस दिन उनकी पूजा करके हम अपने जीवन में शांति, सौभाग्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 🙏🌸

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