सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

स्कंद षष्ठी का महत्व ,श्री कार्तिकेय अष्टकम , इच्छित वर , संतान-3.2.2025

 



  1. 1.      पर्व-स्कंद षष्ठी कार्तिकेय,

    (स्कंद, सुब्रमण्य मुरुगन, षण्मुख, सरवण, कार्तिकेय, गुहा और वेलायुथा है।)

    कुमार कार्तिकेय का जन्म
    • कार्तिकेय के जन्म का वर्णन पुराणों में मिलता है।कार्तिकेय जी भगवान शिव और भगवती पार्वती के पुत्र हैं ।
    •  भगवान कार्तिकेय छ: बालकों के रूप में जन्म. कृतिका (सप्त ऋषि की पत्निया) ने देखभाल की थी, इसीलिए उन्हें कार्तिकेय धातृ भी कहते हैं
    • देवताओं को असुरों द्वारा परेशान किया जा रहा था, और भगवान शिव के पुत्र से ही असुरों का नाश होगा।
  2. भगवान शिव की समाधि और कार्तिकेय का जन्म
    • शिव समाधि में लीन थे, जिससे देवताओं की शक्तियां लुप्त हो गईं।
    • कामदेव ने शिव का ध्यान भंग किया, जिसके बाद शिव ने पार्वती से विवाह किया।
    • भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह से कार्तिकेय का जन्म हुआ।
  3. स्कंद षष्ठी का महत्व
    • इस दिन पूजा करने से संतान सुख प्राप्त होता है और संतान के संकट दूर होते हैं।
    • कार्तिकेय की पूजा से व्यक्ति के काम बन जाते हैं।
    •  1-सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्वया।

      शुभदास्तु सदा देवी स्कंद माता यशस्विनी॥

      2-भगवान सुब्रमण्य महामंत्र -

      ॐ नमो भगवते सुब्रमण्याय शन्मुघाय महात्मने

      सर्व चतुर् संहाराय,महाबल पराक्रमाय वीराय सूर्याय

      भक्तपरि-बलानाय धन-धान्य-प्रभलाय थानेश्वराय मम सर्व भीषदम्

      प्रयाच-चा स्वाहा

      2. ॐ देवी स्कंदमातायै नमः॥

  4. स्कंद षष्ठी के दिन पूजा विधि
    • षष्ठी स्त्रोत का पाठ: इससे अजय संतान प्राप्त होती है।
    • कार्तिकेय के नामों का जाप: संतान की समस्याओं का समाधान होता है।
  5. पौराणिक कथा
    • राक्षस तारकासुर के आतंक से मुक्ति के लिए कार्तिकेय का जन्म हुआ।
    • स्कंद षष्ठी के दिन कार्तिकेय ने ताड़कासुर का वध किया और देवताओं को मुक्ति दिलाई।
  6. स्कंद षष्ठी के उपाय:
    • लाल चंदन चढ़ाना: संतान की कठिन परिस्थितियों से मुक्ति मिलती है।
    • मंत्र उच्चारण: "ॐ ह्रीं षष्ठीदेव्यै स्वाहा" का उच्चारण - कमलगट्टे की माला पर करें, इच्छित वर की प्राप्ति होती है।
    • मयूर पूजा: संतान संकट से मुक्ति मिलती है।
    • कमल पुष्प और सुदर्शन चक्र चढ़ाना: जिद्दी संतान सुधरती है।
    • मोर पंख, बूंदी के लड्डू, केसर और शंख चढ़ाना: गलत संगत -बच्चे के लिए लाभकारी होता है।
    •  सिंहासन पर विराजमान श्री कार्तिकेय की पूजा – संस्कृत और हिंदी में सरल और संक्षिप्त अर्थ:

      1.योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निानन्दः
      स्कन्दः कुमारः योद्धाः स्वामी शंकरसंभवः 1
      योगीश्वरो महा-सेनः कार्तिकेयोग्नि-नन्दनः |
      स्कन्दः कुमारः सेनानिः स्वामी शंकर-सम्भवः

       अर्थ - श्लोक 1:

      हिंदी अर्थ:
      1.1: (श्री कार्तिकेय को नमस्कार) जो योगी हैं और जिन्हें अग्निदेव के पुत्र के रूप में महासेना के नाम से जाना जाता है, और जिन्हें छह कृतिकाओं (माता पार्वती के द्वारा उत्पन्न) के पुत्र के रूप में कार्तिकेय के नाम से पूजा जाता है।
      1.2: जो देवी पार्वती के पुत्र के रूप में स्कंद और देवी गंगा के पुत्र के रूप में कुमार कहलाते हैं, वे देवताओं की सेना के नेता हैं और हमारे स्वामी हैं, जिनका जन्म भगवान शिव से हुआ है।

      2. अर्थ - श्लोक 2:

       गांगेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः |
      तारकारिरुमापुत्रः क्रौंचरिश्च शदानः ||2||

      हिंदी अर्थ:
      2.1: (श्री कार्तिकेय को नमस्कार) जो माँ गंगा के पुत्र हैं और जिनके शरीर का रंग ताम्रचूड़ (तांबे जैसा) है, जो उत्सव मनाने वाले और जिनका प्रतीक मोर है।
      2.2: जो तारकासुर और क्रौंकासुर के शत्रु हैं, जो देवी उमा के पुत्र हैं और जिनके पास छह सिर (मुख) हैं।

      3. अर्थ - श्लोक 3:

      संस्कृत: शब्द ब्रह्म समुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहाः |
      सनत्कुमारो भगवान् भोग मोक्ष फलप्रदः ||3||

      हिंदी अर्थ:
      3.1: (श्री कार्तिकेय को नमस्कार) जो शब्द-ब्रह्म (आध्यात्मिक ज्ञान) के सागर में निपुण हैं, जो शब्द-ब्रह्म के महान आध्यात्मिक रहस्यों को जानने वाले और उसे समझाने में सक्षम हैं, और जिन्हें गुहा के रूप में जाना जाता है (जो भगवान शिव के अवतार हैं)।
      3.2: जो सनत्कुमार (हमेशा युवा और शुद्ध रहने वाले) की तरह भगवान हैं और भोग और मोक्ष का फल देने वाले हैं।


      निष्कर्ष:
      इन श्लोकों में श्री कार्तिकेय के विभिन्न रूपों, उनके गुणों और उनकी महिमा का वर्णन किया गया है। वे माँ गंगा और देवी पार्वती के पुत्र हैं, तारकासुर और क्रौंकासुर के शत्रु हैं, और वे हमेशा युवा और शुद्ध रहते हुए मोक्ष और भोग का फल देने वाले भगवान हैं।

      ==================================================
    •  श्री कार्तिकेय अष्टकम 

      ॐ श्रीगणेशाय नमः

      अगस्त्य उवाच-

      नमोस्तु वृन्दारक वृन्द वन्द्यपादार विन्दाय सुधाकराय ।

      षडाननायामित विक्रमाय गौरी हृदानन्द समुद्भवाय ॥ १ ॥

      नमोस्तु तुभ्यं प्रणतार्ति हन्त्रे कर्त्रे समस्तस्य मनोरथानाम् ।

      दात्रे रथानां परतारकस्य हन्त्रे प्रचण्डासुरतारकस्य ॥ २ ॥

      अमूर्तमूर्ताय सहस्रमूर्तये गुणाय गण्याय परात्पराय ।

      अपारपाराय परापराय नमोऽस्तु तुभ्यं शिखिवाहनाय ॥ ३ ॥

      नमोस्तु ते ब्रह्मविदां वराय दिगम्बरायाम्बर संस्थिताय ।

      हिरण्यवर्णाय हिरण्य बाहवे नमो हिरण्याय हिरण्य रेतसे ॥ ४ ॥

      तपः स्वरूपाय तपोधनाय तपः फलानां प्रतिपादकाय ।

      सदा कुमाराय हि मारमारिणे तृणी कृतैश्वर्य विरागिणे नमः ॥ ५ ॥

      नमोस्तु तुभ्यं शर जन्मने विभो प्रभात सूर्यारुण दन्त पङ्क्तये ।

      बालाय चाबाल पराक्रमाय षाण्मातुरायालमनातुराय ॥ ६ ॥

      मीढुष्टमायोत्तरमीढुषे नमो नमो गणानां पतये गणाय ।

      नमोऽस्तु ते जन्म जरातिगाय नमो विशाखाय सुशक्ति पाणये ॥ ७ ॥

      सर्वस्य नाथस्य कुमारकाय क्रौञ्चारये तारकमारकाय ।

      स्वाहेय गाङ्गेय च कार्तिकेय शैवेय तुभ्यं सततं नमोऽस्तु ॥ ८ ॥

      ॥ इति स्कान्दे काशी खण्डतः श्रीकार्तिकेयाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

संक्षेप में, स्कंद षष्ठी का पर्व संतान सुख, संकटों से मुक्ति और कार्यों में सफलता पाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

टिप्पणियाँ