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#करवा चौथ”कथाएँ - चौथ माता उत्पत्ति,महत्व, विधि-(माता करकायनी”, “व्रत चौथेश्वरी”, “सौभाग्यवती रक्षिका.सखी-व्रत)9424446706

  


करवा चौथ” - धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व, उत्पत्ति, देवी/देवता, पूजन विधि-9424446706

🌕 करवा चौथ का महत्व (Karva Chauth Mahatva)

1️⃣   आरंभ व उत्पत्ति (महाभारत काल, करवा कथा सहित)
2️⃣    मुख्य देवी-देवता और पूजन विधि
3️⃣     पौराणिक कथा (वीरावती, द्रौपदी, करवा)
4️⃣    शास्त्रीय प्रमाण – वेद, पुराण, स्मृति और श्लोक सहित
5️⃣     फलश्रुति और सांस्कृतिक महत्त्व

आरंभ और उत्पत्ति:
करवा चौथ व्रत का उल्लेख स्कंद पुराण, नारद पुराण, और भविष्य पुराण में मिलता है।
यह व्रत पौराणिक काल से सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु और मंगल के लिए रखा जाता रहा “

करवा चौथ” शब्दार्थ और कृषि-संकेत
– “
करवा” शब्द ‘कलश’ / ‘करक’ से संबंध रखता है, जिसका अर्थ है जल धारण करने वाला पात्र।– कुछ मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत उन क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रचलित था जहाँ गेहूँ (रबी फसल) की बुवाई प्रारंभ होती थी; उस समय स्त्रियाँ यह व्रत करती थीं ताकि फसल अच्छी हो — इस प्रकार घर और कृषि दोनों की समृद्धि हो।

 1.      लोक--कुछ जगहों पर, करवा चौथ को सखी व्रत कहा जाता है — जहाँ महिलाएँ एक दूसरे को “सखी” कहकर संबोधित करती हैं और एक-दूसरे की दुआएँ लेती हैं।

– लोक गाथाओं में, व्रत के दौरान महिलाएँ “फेरियाँ” चलाती हैं — थाली एक हाथ में लेकर वो एक-दूसरे के पास जाती हैं और कथा सुनती हैं।
– छत्तीसगढ़, पंजाब आदि में, करवा चौथ को स्थानीय रूप से मनाने की अलग रीतियाँ हो सकती हैं, जैसे व्रत के दौरान विशेष गीत-भजन, झांकियाँ, सामूहिक पूजा आदि। (ये विशिष्ट स्वरूप, ग्रामीण परंपराओं पर निर्भर करती हैं।)

 पौराणिक प्रमाण (Scriptural References)

🕉️ (क) भविष्य पुराण – करकचतुर्थी महात्म्य

“कार्तिकस्य कृते पक्षे चतुर्थ्यां या समाचरेत्।
करकं धारणं पुण्यं सौभाग्यं लभते ध्रुवम्॥”
अर्थ: जो स्त्री कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को करक (करवा) धारण कर व्रत करती है, वह अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु प्राप्त करती है।


🕉️ (ख) स्कन्द पुराण – स्त्रीव्रतखण्ड

“सौभाग्यार्थं स्त्रिया नित्यं कार्तिके कृत्तिकादितः।
चतुर्थ्यां च व्रतं कार्यं शिवगौरीप्रसादकम्॥”
अर्थ: स्त्रियों को अपने सौभाग्य की रक्षा हेतु कार्तिक मास की चतुर्थी को यह शिव-पार्वती प्रसन्न करने वाला व्रत अवश्य करना चाहिए।

🕉️ (ग) नारद पुराण – सुहागव्रतविधि

“पत्न्या नृणां प्रियं नित्यं सौभाग्यं च तथा श्रियः।
कार्तिके च चतुर्थ्यां तु गौरीपूजा विधीयते॥”
अर्थ: कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को गौरी पूजा करने से पति का आयुष्य और घर का सौभाग्य सदा स्थिर रहता है।

फलश्रुति (व्रत का फल)

स्कन्द पुराण में कहा गया —

“यस्याः करकव्रतं स्त्रीणां पत्युर्मृत्युनिवारणम्।
तस्याः सौभाग्यसम्पत्तिर्दिव्यायुः स्याद्यथोद्धवम्॥”
अर्थ: जो स्त्री यह करकचतुर्थी व्रत श्रद्धापूर्वक करती है, उसके पति का मृत्युयोग टल जाता है और सौभाग्य अखंड होता है।

यह व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
‘
करवा’ का अर्थ है — मिट्टी का कलश (जो स्थायित्व और मंगल का प्रतीक है),
और ‘चौथ’ का अर्थ है — चतुर्थी तिथि।

इस व्रत का आरंभ महाभारत काल से माना जाता है, जब द्रौपदी ने अर्जुन के लिए इसे रखा था।
एक अन्य कथा में कहा गया है कि करवा नामक पतिव्रता स्त्री ने अपने पति को मगरमच्छ से बचाने के लिए यमराज को अपने सत्यनिष्ठा और धर्मबल से बाँध लिया, तभी से इस व्रत का नाम करवा चौथ पड़ा।


🪔 पूजा की देवी/देवता

करवा चौथ व्रत में मुख्य रूप से पूजित होते हैं:

  1. गौरी माता (पार्वती जी) — सौभाग्य और अखंड सुहाग की देवी
  2. शिव जी — कल्याण और दीर्घायु के दाता
  3. गणेश जी — विघ्नहर्ता
  4. चंद्रदेव — सौभाग्य के साक्षी

 📿 पूजन विधि (Puja Vidhi)

🕉️ 1. प्रातःकालीन संकल्प

  • सूर्योदय से पहले स्नान कर लाल या पीले वस्त्र पहनें।
  • संकल्प मंत्र बोलें —
    “
    मम सुहाग दीर्घायुष्यम्, सौभाग्य सिद्ध्यर्थं करकचतुर्थीव्रतं करिष्ये।”
    (
    मैं अपने पति की दीर्घ आयु और अखंड सौभाग्य के लिए करवा चौथ व्रत करती हूँ।)

🕉️ 2. दिन भर उपवास

  • यह निर्जल व्रत होता है (बिना अन्न और जल के)।
  • दिन भर माता गौरी की कथा सुनें।

🕉️ 3. संध्या पूजन (मुख्य पूजन विधि)

सामग्री:

  • मिट्टी का करवा (कलश), दीपक, धूप, चावल, सिंदूर, रोली, लाल चुनरी, अक्षत, मिठाई, जल से भरा लोटा।

विधि:

  1. चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गौरी माता, शिव जी, गणेश जी, और चंद्रमा का चित्र स्थापित करें।
  2. करवे में जल भरकर रखें (यह करवा पति की दीर्घायु का प्रतीक होता है)।
  3. रोली और चावल से तिलक करें।

सुहागिनें एक-दूसरे को सिंदूर और मिठाई का आदान-प्रदान करती हैं (कहते हैं— “सदा सुहागन रहो”)।करवा चौथ व्रत – शास्त्रीय आधार, कथा एवं पूजन-विधान


🪔 १. करवा चौथ व्रत का आरंभ और ऐतिहासिक आधार  

करवा चौथ व्रत भारतीय स्त्री की अखंड सौभाग्य भावना का प्रतीक है। इसका प्रारंभ महाभारत काल से माना गया है। जब अर्जुन तप के लिए नीलगिरी पर्वत गए, तब द्रौपदी अत्यंत व्याकुल हुईं। उन्होंने श्रीकृष्ण से निवेदन किया —

“हे माधव! मेरे पति नीलगिरी पर्वत पर तप करने गए हैं, उनका कल्याण कैसे होगा?”

तब श्रीकृष्ण बोले —

“हे द्रौपदी! यदि तुम कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को ‘करक चतुर्थी’ नामक व्रत विधिपूर्वक करो, तो तुम्हारे पति की दीर्घायु होगी और सब संकट मिट जाएँगे।”

📜 संदर्भ — भविष्य पुराण, करकचतुर्थी महात्म्य

“कार्तिकस्य कृते पक्षे चतुर्थ्यां या समाचरेत्।
करकं धारणं पुण्यं सौभाग्यं लभते ध्रुवम्॥”
अर्थ: जो स्त्री कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को करक (करवा) धारण कर व्रत करती है, उसे अचल सौभाग्य प्राप्त होता है।

द्रौपदी ने इस व्रत को किया और अर्जुन का तप सफल हुआ।
तब से यह व्रत “करक चतुर्थी” अथवा “करवा चौथ” कहलाया।

वेदीय दृष्टि से यह व्रत सौम्य ग्रह चंद्र की उपासना है, जो मन, सौभाग्य और समरसता का अधिपति है।
अथर्ववेद (काण्ड ११, सूक्त ७) में कहा गया है —

“सोमः राजा सोमपाः सोम्यं तेजो ददातु ते।”
अर्थ: चंद्रदेव सौम्यता और दीर्घायु देने वाले हैं।

इस प्रकार, करवा चौथ का आरंभ श्रद्धा, मनोबल और चंद्र-ऊर्जा की साधना के रूप में हुआ।


🌸 २. ‘करवा’ नाम का रहस्य एवं करवा स्त्री की कथा  

‘करवा’ शब्द संस्कृत धातु “कर्ण + वह” से बना है — अर्थात “जल धारण करने वाला पात्र”।
करवा चौथ में यह करक या करवा ही जीवन के सातत्य और सौभाग्य का प्रतीक है।

प्राचीन काल में स्त्रियाँ अपने पतियों की रक्षा हेतु करक में जल भरकर यमराज से प्रार्थना करती थीं।
इस परंपरा का प्रत्यक्ष उदाहरण करवा नामक एक पतिव्रता स्त्री की कथा है, जो स्कन्दपुराण (स्त्रीव्रतखण्ड) और कथासरित्सागर में वर्णित है।


🕉️ करवा सती की कथा

करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री थी, जो अपने पति से अत्यंत प्रेम करती थी।
एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया और एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया।
करवा ने यमराज को पुकारा —

“हे धर्मराज! मेरे पति ने कभी अधर्म नहीं किया, उन्हें अन्याय से मत मारो।”

यमराज बोले —

“हे सति! यह तो उनके कर्मों का फल है, इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता।”

करवा ने दृढ़ स्वर में कहा —

“यदि मेरे पतिव्रत धर्म में तनिक भी दोष है तो मेरा वचन मिथ्या हो, अन्यथा मैं तुम्हें अपने सत्यबल से बाँध दूँगी।”

अपने सत्यव्रत के प्रभाव से उसने यमराज को पाश से बाँध दिया।
सभी लोकों में हलचल मच गई।
देवगणों के निवेदन पर यमराज ने करवा से क्षमा मांगी और उसके पति को पुनर्जीवित किया।

📜 संदर्भ – स्कन्दपुराण, स्त्रीव्रतखण्ड

“पत्युस्त्वायुर्विवृद्ध्यर्थं करकव्रतमीप्सया।
यमं बद्धा सती करवा पतिव्रतबलान्विता॥”
अर्थ: पतिव्रता करवा ने पति की दीर्घायु के लिए करकव्रत करते हुए यमराज को अपने सतीत्व बल से बाँध लिया।

तभी से यह व्रत ‘करवा चौथ’ कहलाया —
जहाँ ‘करवा’ धर्मबल की प्रतीक है और ‘चौथ’ चतुर्थी तिथि का सूचक।


🌺 ३. वीरावती कथा (प्रचलित लोककथा) –

एक नगर में एक राजा की सात पुत्रियाँ और एक पुत्र था। सबसे छोटी पुत्री का नाम वीरावती था।
वह विवाहित होकर प्रथम बार मायके आई थी।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को उसने करवा चौथ व्रत रखा।
सूर्योदय से लेकर रात्रि तक बिना जल और अन्न के रही।

संध्या होने पर उसका शरीर निर्बल हो गया।
भाइयों को उसकी स्थिति देखकर दया आई।
उन्होंने दूर एक पहाड़ी पर दीपक जलाकर छलनी से दिखाया कि “देखो, चाँद निकल आया है।”
वीरावती ने जल चढ़ाकर व्रत तोड़ दिया।

कुछ ही क्षणों में उसके पति का देहान्त हो गया।
वीरावती विलाप करने लगी।
उसी समय माता पार्वती प्रकट हुईं और कहा —

“हे वीरावति! तूने छल से व्रत तोड़ा, इसीलिए यह विपत्ति आई। यदि तू अगली चतुर्थी को श्रद्धापूर्वक पुनः यह व्रत करेगी, तो तेरा पति पुनर्जीवित होगा।”

वीरावती ने पुनः अगले मास यह व्रत विधिपूर्वक किया और उसके पति को पुनर्जीवन प्राप्त हुआ।
तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य और पति-कल्याण के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।


🌼 ४. करवा सती कथा –

5-कथासरित्सागर (लवणकायन कथा) के अनुसार —
करवा सती दक्षिण भारत की एक साध्वी स्त्री थी।
उसके पति का नाम धरणिधर था।
दोनों धर्मनिष्ठ और सच्चरित्र थे।
एक दिन नदी में स्नान के समय पति को मगरमच्छ ने पकड़ लिया।
करवा ने दृढ़ मन से तप किया और कहा —

“मैं धर्म, सत्य और पति-भक्ति की साधिका हूँ। यदि मेरा पतिव्रत निष्कलंक है, तो यह मगरमच्छ तुरंत भस्म हो जाए।”

जैसे ही उसने यह कहा, मगरमच्छ जलकर भस्म हो गया।
उसने पति का हाथ पकड़कर किनारे लाया और यमराज से कहा —

“हे धर्मराज! यदि आप इन्हें मृत्यु देते हैं तो मैं अपने सत्यबल से आपको बाँध दूँगी।”
यमराज ने उसकी पतिव्रता से प्रभावित होकर कहा —
“
हे सति! तव धर्मबलोऽद्भुतः। ते पत्युः दीर्घमायुः स्यात्।”
(
अर्थ — तेरा धर्मबल अद्भुत है, तेरा पति दीर्घायु होगा।)

तब से “करवा चौथ” नामक व्रत सतीत्व और धर्मबल की साक्षी बन गया।

5-“साहूकर की बहन करवा”

बहुत समय पहले एक साहूकार (व्यापारी) था, जिसके सात बेटे और एक बहन थी, जिसका नाम करवा था।

जब वह विवाह के बाद मायके आई हुई थी, तो एक करवा चौथ के दिन उसने निर्जल व्रत रखा।
शाम को भूख-प्यास से व्याकुल हो रही करवा को उसके भाइयों ने दया आई। उन्होंने दूर एक पिपल पेड़ पर दीपक जला कर और एक छलनी (जाली) रखकर दूर से दिखाया कि चाँद निकल आया है।
करवा ने अर्घ्य दे दिया और व्रत तोड़ लिया। उसी समय उसे खबर मिली कि उसके पति की मृत्यु हो गई।
अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल करवा ने ठान लिया कि वह व्रत तोड़ेगी नहीं और अपने पति को जीवित करके ही छोड़ेंगी। उसने कई वर्ष तक कठिन तप किया, सूखे मृत्तिका, सूई, घास आदि से व्रत किया।
अंततः, उसकी भाभियों और देवताओं की मदद से, एक भाभी ने अपनी अंशदायी अंगुली से अमृत देकर उसके पति को पुनर्जीवित कर दिया।

यह कथा यह सिखाती है कि पतिव्रता का दृढ़ निश्चय और तप कितना शक्तिशाली हो सकता है।

6-🪔 चौथ माता की दुर्लभ कथा (राजस्थान – चौथ का बरवाड़ा)

बहुत समय पहले राजस्थान की अरावली पर्वतमाला के पास चौथ का बरवाड़ा नामक एक छोटा गाँव था। वहाँ के राजा भीम सिंह चौहान वीर, धर्मनिष्ठ और भगवती-भक्त थे।

एक दिन उन्हें स्वप्न में एक दिव्य स्त्री का दर्शन हुआ। वह तेजोमयी आभा से दीप्त थी — त्रिनेत्र, चार भुजाएँ, सिंह पर आरूढ़, करों में त्रिशूल और करक (कलश) धारण किए हुए। देवी ने कहा —

“हे राजन! मैं चौथ माता हूँ। पंचाला नगरी से तुम्हारे राज्य में आने की इच्छा रखती हूँ। यदि तू मेरा मंदिर स्थापित करेगा, तो तेरे राज्य में कभी दरिद्रता नहीं रहेगी। स्त्रियाँ यहाँ व्रत करेंगी और अपने पतियों की दीर्घायु प्राप्त करेंगी।”

1.      सुबह राजा ने पंडितों को बुलवाया, पंचांग से मुहूर्त निकाला और देवी का मंदिर उसी पर्वत पर बनवाया जहाँ वे स्वप्न में प्रकट हुई थीं। निर्माण पूर्ण होते ही गाँव की स्त्रियों ने उस दिन अश्विन शुक्ल चतुर्थी को व्रत किया — वही दिन आगे चलकर “करक चतुर्थी” या “करवा चौथ” कहलाया।

🌕 कथा का रहस्य और व्रत की शुरुआत

2.      प्रचलि कथा के अनुसार, उस समय उस प्रदेश में एक भीषण महामारी फैली थी। पुरुष युद्ध में जाते और लौटकर कई रोगों से ग्रस्त हो जाते। स्त्रियाँ अपने पतियों के जीवन के लिए देवी से प्रार्थना करती थीं।

एक दिन एक नवविवाहिता ने माता से कहा —

3.      “हे चौथ माता! यदि मेरे पति सकुशल लौट आएँ, तो मैं हर वर्ष निर्जल व्रत रखूँगी और तेरा दीपक जलाऊँगी।”

4.      उसकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर देवी ने आकाशवाणी की —

5.      “आज से जो स्त्री पति-सौभाग्य की अभिलाषा से करक चतुर्थी को मेरा व्रत करेगी, उसका पति दीर्घायु होगा और परिवार सदा सम्पन्न रहेगा।”

6.      उसी दिन से यह व्रत चौथ माता व्रत के रूप में प्रचलित हुआ — जो बाद में करवा चौथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

7.      

-7-o    🌺 -बरवाड़ा क्षेत्र -स्त्रियों द्वारा गाई जाने वाली कथा)

8.      एक बार एक सैनिक की पत्नी अपने पति के युद्ध में जाने से पहले चौथ माता के दरबार पहुँची। उसने निर्जल व्रत रखकर माता से कहा —
“
जैसे माँ पार्वती ने शिव को प्राप्त किया, वैसे ही मैं अपने पति को जीवन में बार-बार पाऊँ।”
युद्ध में उसका पति गंभीर रूप से घायल हो गया, किंतु उसी रात देवी ने स्वप्न में उसे अमृत दिया और उसके प्राण लौट आए।
सुबह जब पति जीवित लौट आया, तो सभी स्त्रियों ने यह व्रत अपनाया — ‘करवा चौथ’ नाम इसी करक (कलश) और चौथ माता के वरदान से पड़ा।

9.      

🔱 धार्मिक मान्यता और रहस्य banaras

चौथ माता को यहाँ “माता करकायनी”, “व्रत चौथेश्वरी”, और “सौभाग्यवती रक्षिका” भी कहा जाता है।
स्थानीय पुजारी वर्ग बताता है कि मंदिर के गर्भगृह में रखी मूर्ति काष्ठ और शिला दोनों से बनी है — जो देवी पार्वती और पृथ्वी-तत्व के संयोग का प्रतीक है।

कहा जाता है कि —

“जो स्त्री इस दिन निर्जल रहकर चौथ माता के चरणों में दीपक और करवा (जल-कलश) अर्पित करती है, उसके घर की अग्नि और अन्न कभी शिथिल नहीं पड़ते।”

कम-प्रसारित लोककथा — “सखी-व्रत/घरेलू-संकल्प” रूप

कुछ लोकग्रन्थों में करवा चौथ को “सखी-व्रत” कहा गया है जहाँ नवविवाहिता अपनी सखी (गाँव/मण्डली) के साथ मिलकर करवे बाँटती और विशेष गीत-कथा (लोककथा) सुनाती हैं — इन गीतों में कई बार स्थानीय देवी-देवीयों का वर्णन अलग तरह से मिलता है, जैसे नदी-देवी, पिपल-देवी, चउथ-माता इत्यादि। 


🕯️ अर्घ्य-विधि, दीपक, वातिका, तेल, एवं शास्त्रीय प्रमाण सहित विवरण

🌕 (क) अर्घ्य-विधि (चंद्र पूजा)

  1. रात्रि में जब चंद्रमा उदित हो, तब थाली में रेशमी वस्त्र बिछाएँ।
  2. उसमें जल से भरा करवा (कलश) रखें।
  3. उसमें दूर्वा, चावल और पुष्प डालें।
  4. पति के मुख की ओर देखती हुई स्त्री कहे —

“दधि शंख तुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥”

अर्थ: मैं उस चंद्रदेव को नमस्कार करती हूँ जो दधि और शंख के समान शुभ्र हैं, शिव के मुकुट में शोभित हैं।

फिर यह मंत्र बोले —

“ॐ सोमाय नमः। मम पति व्रतायाः सौभाग्यं च दीर्घायुष्यम् देहि।”

और अर्घ्य अर्पित करें।


🪔 (ख) दीपक, वर्तिका (बाती), और तेल का शास्त्रीय प्रमाण

स्कन्दपुराण (व्रतखण्ड, दीपविधि अध्याय) में लिखा है —

“तिलतैलकृतो दीपो हव्यकव्यप्रदः स्मृतः।
घृतदीपः श्रियं दद्यात् सौम्यः सौभाग्यवर्धनः॥”

🔹 अर्थ:

  • तिल तेल का दीप हव्य-कव्य (पितृ-देव) को प्रसन्न करता है।
  • घृत दीप (घी का दीपक) लक्ष्मीप्रद और सौभाग्यवर्धक होता है।

अतः करवा चौथ में शुद्ध गाय के घी का दीपक सर्वोत्तम माना गया है।


🌸 दीपक की संख्या और वातिका (बाती) का विधान

📜 देवीभागवत पुराण (९.३४.१२)

“एकदीपो हरेद्व्याधिं द्वयोः सौभाग्यवर्धनम्।
त्रयोः पापं विनश्येत् चतुर्भिर्मोक्षदं भवेत्॥”

अर्थ:

  • एक दीप रोग नाशक,
  • दो दीप सौभाग्यवर्धक,
  • तीन दीप पाप नाशक,
  • चार दीप मोक्षदायक हैं।

👉 अतः करवा चौथ में चार दीप जलाना शुभ कहा गया है।

वातिका की संख्या:

  • सामान्यतया एक सूती वातिका रखी जाती है।
  • यदि स्त्री अपने पति की दीर्घायु और कुल-सौभाग्य चाहती है तो चार वातिकाएँ (चार बत्तियाँ) रखे —
    एक माता गौरी के नाम,
    दूसरी शिव के नाम,
    तीसरी गणेश के नाम,
    चौथी चंद्रदेव के नाम।

🌼 (ग) अर्घ्य पात्र और तेल का प्रकार

उपयोग

शास्त्रीय अनुशंसा

प्रमाण

अर्घ्य जल पात्र

करवा (मिट्टी/पीतल)

स्कन्दपुराण, स्त्रीव्रतखण्ड

दीपक का तेल

गाय का घी या तिल तेल

स्कन्दपुराण व देवीभागवत पुराण

वातिका

सूती, चार संख्या में

देवीभागवत पुराण 9.34

दिशा

चंद्रमा की दिशा (पूर्वोत्तर) की ओर मुख

भविष्य पुराण

  1.  

🌸 मुख्य पूजा मंत्र

🌼 गौरी माता मंत्र:

“ॐ ह्रीं गौर्यै नमः।”
अर्थ — मैं माता गौरी को नमस्कार करती हूँ, जो अखंड सौभाग्य की दात्री हैं।

🌼 शिव मंत्र:

“ॐ नमः शिवाय।”
अर्थ — शिव ही कल्याण स्वरूप हैं, वे मेरे पति का आयुष्य बढ़ाएँ।

🌼 गणेश मंत्र:

“ॐ गं गणपतये नमः।”
अर्थ — विघ्नहर्ता गणेश जी मेरे व्रत में सिद्धि दें।

🌼 चंद्र अर्घ्य मंत्र (रात में चाँद को अर्घ्य देते समय):

“ॐ सोमाय नमः।”
या
“
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसंभवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥”

चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति का मुख देखकर व्रत का पारण किया जाता है।


करवा चौथ की मूल व्रत-परम्परा के साथ स्थानीय देवी-पूजन, करवा बदलने के गीत और कथा सुनाने की रीति जुड़ी हुई है, लेकिन हर क्षेत्र में देवी के नाम और कथा का रूप एक जैसा नहीं है।

 ब्रज एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश — गौर माता और करवा गीत

उत्तर प्रदेश की कुछ परम्पराओं में मिट्टी या गोबर से गौरी/गौर माता का स्वरूप बनाकर पूजा करने तथा सात बार करवे बदलने का वर्णन मिलता है। किंतु ब्रज की विशिष्ट स्थानीय कथा या गीत का स्वतंत्र प्रमाण अभी नहीं मिला।

🌹 करवा चौथ कथा (संक्षेप में)

वीरावती नाम की एक रानी ने अपने भाइयों के छल से सूर्यास्त से पहले व्रत तोड़ा, जिससे उसके पति की मृत्यु हो गई।
देवी पार्वती ने उसे सच्चे मन से पुनः करवा चौथ का व्रत करने का उपदेश दिया, तब जाकर उसके पति को पुनः जीवन प्राप्त हुआ।
तब से यह व्रत स्त्रियों के लिए “अखंड सौभाग्य” का प्रतीक माना जाता है।


🌕कश्मीर/हिमाचल लोककथा रूप

o    उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों (कश्मीर के कुछ लोकगाँव, हिमाचल के कुछ हिस्से) में करवा चौथ को स्थानीय-रूप में मनाने की कहानियाँ मिलती हैं जहाँ व्रत का संबंध फसल-चक्र और घरेलू जल-भंडारण (karva — अनाज/कलश) से जोड़ा जाता है। इन कथाओं में करवा चौथ का आरम्भ गाँवों के “कुर्मी/किसान” समुदायों-से जुड़ा बताया जाता है — यानी यह केवल पतिव्रता-व्रत नहीं, बल्कि गृह-समृद्धि की दीर्घकालीन कामना का त्योहार भी ।

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2.      आधुनिक परिवर्तित स्वरूप
– वर्तमान समय में यह व्रत सिर्फ शादीशुदा महिलाओं तक सीमित नहीं रहा — कुछ जगहों पर कुँवारी लड़कियाँ भी इसे करवाती हैं, अपने भावी जीवनसाथी की दीर्घायु और मंगल के लिए।
– समय के साथ यह व्रत प्रेम और जुड़ाव का एक सामाजिक प्रतीक भी बन गया है — पति इस दिन अपने व्रत रखने वाली पत्नी का ध्यान रखते हैं और कभी-कभी पति भी व्रत रखते हैं।

12.  बनारस (वाराणसी) और स्थानीय “चौथ माता / चौथ स्थान” कथाएँ

o    बनारस-क्षेत्र में कुछ विशेष चौथ-देवी स्थलों/मंदिरों (Chauth Mata/ चौथ माता) का उल्लेख मिलता है जहाँ स्थानीय रूप से अलग-अलग व्रतविधि और लोक-कथाएँ संरक्षित हैं। बनारस में पारंपरिक नाथ/तांत्रिक संप्रदायों के लोककथात्मक योग भी पाए जाते हैं — यही वजह है कि बनारस-संदर्भित कथाएँ अक्सर तंत्र-लोककथाओं से मिश्रित होती हैं।

***

अवध–पूर्वांचल और ब्रज–पश्चिमी उत्तर प्रदेश की करवा चौथ परम्पराएँ

- गौर माता की मिट्टी से पूजा, सात बार करवे बदलना और करवा बदलते समय मंगलगीत गाना—तीनों का उल्लेख है।

अवध–पूर्वांचल और ब्रज–पश्चिमी उत्तर प्रदेश की करवा चौथ परम्पराएँ

आपके शोध के लिए एक उपयोगी तथ्य मिला है: करवा चौथ के कुछ क्षेत्रीय विवरणों में गौर माता की मिट्टी से पूजा, सात बार करवे बदलना और करवा बदलते समय मंगलगीत गाना—तीनों का उल्लेख मिलता है। हालांकि उपलब्ध विवरण पूरे उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और ब्रज तथा अवध की अलग-अलग लोककथाओं का प्रमाण अभी सीमित है।

१. गौर माता की पूजा — कथारूप में

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का दिन था। गाँव की सुहागिनें प्रातःकाल स्नान करके व्रत की तैयारी करने लगीं। किसी ने मिट्टी लाई, किसी ने जल, रोली और चावल तैयार किए। आँगन में एक पवित्र स्थान बनाया गया।

एक वृद्धा ने मिट्टी को जल से नम करके उस पर रोली लगाई और कहा—

“यह धरती हम सबका पालन करती है। इसी धरती से अन्न उपजता है, इसी पर हमारा घर बसता है और इसी पर परिवार की पीढ़ियाँ बढ़ती हैं। आज हम गौर माता का पूजन करके अपने परिवार के मंगल की कामना करते हैं।”

स्त्रियों ने गौर माता के सम्मुख दीप जलाया और अपने सुहाग की रक्षा की प्रार्थना की। इसके बाद वे गोलाकार बैठीं। प्रत्येक स्त्री अपना करवा लेकर दूसरी स्त्री को देने लगी। करवे बदलते समय मंगलकामनाओं के गीत गाए गए।

यह कथा उपलब्ध क्षेत्रीय पूजा-विवरणों से प्रेरित भावात्मक पुनर्कथन है, किसी प्राचीन ग्रन्थ से उद्धृत मूल कथा नहीं। गौर माता को पृथ्वी-माता का स्वरूप मानने वाली परम्परा का उल्लेख उत्तर प्रदेश की करवा चौथ प्रथाओं के विवरण में मिलता है।

२. करवा बदलते समय गाया जाने वाला लोकगीत

उपलब्ध करवा चौथ विवरण में उत्तर प्रदेश की कुछ परम्पराओं से जुड़ा यह गीतांश मिलता है। इसे देवनागरी में लिप्यन्तरित किया गया है; इसे किसी विशिष्ट ब्रज या अवधी बोली का प्रमाणित मूल गीत नहीं समझना चाहिए।

करवा फेरने का मंगलगीत

सदा सुहागन करवे लो, पति की प्यारी करवे लो।

सात भाइयों की बहन करवे लो, व्रत करने वाली करवे लो। सास की प्यारी करवे लो॥

बींझा बेटी करवा ले, सात भाइयों की बहन करवा ले। 

पीहर पूरी करवा ले, अध बर खानी करवा ले। सदा सुहागिन करवा ले॥

यह गीत सुहाग, पति के प्रेम, भाई-बहन के स्नेह, व्रत-निष्ठा और सास के आशीर्वाद की मंगलकामना  है। करवा एक स्त्री से दूसरी स्त्री को देने की क्रिया के साथ ये पंक्तियाँ सामूहिक मंगलगीत का  हैं।

३. अवध एवं पूर्वांचल की व्रतकथा

अवध और पूर्वांचल में करवा चौथ की कथा के रूप में वीरावती की कहानी का प्रचलित पाठ उपलब्ध है। कथा में सात भाइयों की लाड़ली बहन वीरावती व्रत रखती है। भाइयों द्वारा कृत्रिम चन्द्रदर्शन कराए जाने के बाद वह समय से पहले भोजन कर लेती है और उसके पति पर संकट आता है। पश्चात्ताप, देवी की आराधना और पुनः व्रत करने के बाद उसके पति के जीवन की रक्षा होने का वर्णन मिलता है।

करवा चौथ का सखी-व्रत, चौथ माता, पीपल-देवी एवं नदी-देवी : लोकपरम्पराओं का कथात्मक एवं सांस्कृतिक विवेचन

करवा चौथ केवल पति की दीर्घायु की कामना से किया जाने वाला व्रत ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत की अनेक लोकपरम्पराओं में स्त्रियों के सामूहिक पूजन, सखी-सहयोग, करवा-विनिमय, मंगलगीत और व्रतकथा का उत्सव भी है।
पंजाब, हरियाणा, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में इसकी विधि, कथा और लोकगीतों में भिन्नता मिलती है। स्त्रियों का मंडल बनाकर बैठना, करवे अथवा पूजा की थालियाँ घुमाना और बड़ी-बूढ़ी महिलाओं से कथा सुनना इसके उल्लेखनीय सांस्कृतिक पक्ष हैं।
करवा चौथ को “सखी-व्रत” कहा गया है जहाँ नवविवाहिता अपनी सखी (गाँव/मण्डली) के साथ मिलकर करवे बाँटती और विशेष गीत-कथा (लोककथा) सुनाती हैं — इन गीतों में कई बार स्थानीय देवी-देवीयों का वर्णन अलग तरह से मिलता है, जैसे नदी-देवी, पिपल-देवी, चउथ-माता

 करवा चौथ का सखी-मंगलगीत

चौथ माता, पीपल-देवी एवं नदी-माता की वन्दना

१. सखियों का मंगलगान

आओ सखियो, करवा फेरें, मंगल गीत सुनाएँ।
चौथ माता के चरणों में, दीपक ज्योति जलाएँ॥

करवा ले लो, करवा दे दो, प्रेम-स्नेह बरसाएँ।
सात जनम के मंगल की हम, मिलकर आस लगाएँ॥

२. चौथ माता की वन्दना

जय-जय चौथ भवानी माता, सुन लो अरज हमारी।
सुखी रहे सबका गृह-आँगन, बनी रहे खुशहाली॥

रोली, अक्षत, दीप सजाकर, चरणों में सिर धारे।
पति-पत्नी के प्रेम-स्नेह के, बन्धन रहें उजियारे॥

३. पीपल-देवी की वन्दना

पीपल माता छाया देना, रखना मान हमारा।
हरित रहें आँगन की डाली, सुखमय हो घर-द्वारा॥

जैसे जड़ से वृक्ष सँभलता, वैसे कुल-संस्कार।
प्रेम, धैर्य और सेवा से हो, जीवन का शृंगार॥

४. नदी-माता की वन्दना

नदी-मइया निर्मल धारा, जीवन की रखवाली।
सबके घर में सुख बरसाना, भरना अन्न की थाली॥

जल की महिमा सदा सँभालें, धरती का सम्मान।
प्रकृति-माता की सेवा में, अर्पित हों सब प्राण॥

५. सखी-सहेली का मंगल

सखी हमारी सुख में साथी, दुख में बने सहारा।
मिल-जुलकर हम व्रत को पूजें, प्रेम रहे अति प्यारा॥

सास-ससुर का मान बढ़े और, भाई-बहन सुख पावें।
माता-पिता के आशीषों से, सबके भाग्य जगमगावें॥

६. समापन मंगलगान

करवा माता कृपा बरसाओ, चौथ भवानी मैया।
सुख, शान्ति और प्रेम से भर दो, सबकी जीवन नैया॥

चन्द्रदेव जब दर्शन देंगे, अर्घ्य चढ़ाएँ सखियाँ।
सबके जीवन में मंगल हो, यही हमारी अरजियाँ॥

कथारूप में

एक गाँव में करवा चौथ का दिन आया। प्रातःकाल से ही घरों में उत्सव का वातावरण था। कहीं करवे सजाए जा रहे थे, कहीं पूजन की थालियाँ तैयार हो रही थीं और कहीं वृद्ध महिलाएँ अपनी बहुओं तथा बेटियों को व्रत की कथा सुना रही थीं।

गाँव की नवविवाहिताएँ भी अपनी-अपनी सखियों के साथ एक स्थान पर एकत्र हुईं। किसी के हाथों में मिट्टी का करवा था, किसी की थाली में रोली, अक्षत, दीपक और मिठाई थी। वे एक-दूसरे के करवे बदलतीं, मंगलगीत गातीं और अपने दाम्पत्य जीवन के सुख तथा परिवार की मंगलकामना करतीं।

एक वृद्धा ने कहा—

“बेटियो! करवा केवल मिट्टी का पात्र नहीं है। इसमें भरा जल जीवन का प्रतीक है। जैसे करवा जल को सँभालता है, वैसे ही परिवार प्रेम को सँभालता है। सखी वह है जो सुख में साथ दे और संकट में धैर्य बँधाए।”

तब एक नवविवाहिता ने पूछा, “माताजी! क्या सखियों के साथ मिलकर व्रत करने का भी कोई विशेष महत्त्व है?”

वृद्धा बोलीं, “जहाँ स्त्रियाँ मिलकर मंगलगीत गाती हैं, एक-दूसरे को कथा सुनाती हैं और अपने सुख-दुःख बाँटती हैं, वहाँ व्रत केवल व्यक्तिगत साधना नहीं रहता; वह सामुदायिक सद्भाव का उत्सव बन जाता है।”

इस प्रकार सखी-मंडली की परम्परा को समझा जा सकता है। हालाँकि इसे हर क्षेत्र में ‘सखी-व्रत’ नाम से ही पुकारा जाता है, ऐसा प्रमाणित नहीं है।

सांस्कृतिक अर्थ: सखी-व्रत नाम का प्रयोग यदि किसी स्थानीय परम्परा में होता है, तो उसका मुख्य भाव स्त्री-सहयोग, परस्पर मंगलकामना, लोकगीतों का संरक्षण और नवविवाहिताओं को पारिवारिक परम्पराओं से परिचित कराना हो सकता है।

 2-राजस्थान में चौथ माता की उपासना की एक प्रसिद्ध परम्परा है। सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा स्थित चौथ माता मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है। 

कथा — अटूट निष्ठा, पश्चात्ताप और चौथ माता की कृपा

प्राचीन समय की बात है। एक गाँव में एक साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्री का नाम करवा था। सातों भाई अपनी बहन से अत्यन्त प्रेम करते थे। विवाह के बाद करवा अपने ससुराल में रहने लगी, किन्तु त्योहारों पर मायके आना-जाना लगा रहता था।

एक बार कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी आई। करवा अपने मायके में थी। उसने अपने पति की दीर्घायु और परिवार के मंगल की कामना से करवा चौथ का व्रत रखा। प्रातःकाल से ही उसने अन्न-जल ग्रहण नहीं किया। दिन बीतता गया। सूर्य अस्त होने लगा, परन्तु चन्द्रमा के दर्शन नहीं हुए।

भूख-प्यास से व्याकुल बहन को देखकर उसके भाइयों का हृदय द्रवित हो उठा। वे चाहते थे कि बहन शीघ्र भोजन कर ले। छोटे भाई ने एक उपाय सोचा। उसने दूर पीपल के वृक्ष पर एक दीपक जलाकर रख दिया और उसे चलनी की ओट से ऐसा दिखाया कि मानो आकाश में चन्द्रमा निकल आया हो।

भाइयों ने बहन से कहा, “बहन! देखो, चन्द्रमा निकल आया है। अब तुम अर्घ्य देकर भोजन कर लो।”

करवा ने दूर से प्रकाश देखा और उसे चन्द्रमा समझ लिया। उसने अपने व्रत का पारण कर लिया। किन्तु कथा के अनुसार, व्रत अधूरा रह जाने के कारण उसके जीवन में विपत्ति आ गई। उसके पति की मृत्यु का समाचार मिला।

करवा शोक से विह्वल हो उठी। उसका संसार उजड़ गया था। उसने निश्चय किया कि वह अपने पति का अन्तिम संस्कार नहीं होने देगी। वह पति के शरीर के पास बैठ गई और अपने सुहाग की रक्षा के लिए देवी से प्रार्थना करने लगी।

समय बीतता गया। वह अपने पति के शरीर की देखभाल करती रही। कथा के कुछ रूपों में उसके पति के शरीर पर सूई जैसी घास उगने का वर्णन आता है। करवा उस घास को सँभालकर रखती रही। उसके हृदय में एक ही आशा थी—कभी न कभी उसके पति फिर से जीवित होंगे।

इस बीच चतुर्थी के दिन आते-जाते रहे। करवा चौथ का अगला वार्षिक अवसर भी निकट आया। गाँव की अन्य स्त्रियाँ व्रत की तैयारी करने लगीं। सुहागिनें एकत्र हुईं, पूजा की सामग्री सजाई गई और चौथ माता की कथा सुनाने की तैयारी हुई।

करवा ने निश्चय किया कि वह चौथ माता से अपने पति का जीवन वापस माँगेगी। वह माता के चरणों में गई और विनती करने लगी—

“हे चौथ माता! मुझसे भूल हुई। मैंने चन्द्रमा के दर्शन किए बिना ही प्रकाश को चन्द्रमा समझ लिया और व्रत का पारण कर लिया। मैं अपनी भूल स्वीकार करती हूँ। मुझ पर कृपा कीजिए और मेरे पति को जीवन प्रदान कीजिए।”

कथा के एक रूप में चौथ माता उसे उसके व्रत-भंग की याद दिलाती हैं। करवा अपनी भूल के लिए पश्चात्ताप करती है और प्रार्थना करती रहती है। वह अपने पति के प्रति निष्ठा नहीं छोड़ती और देवी से बार-बार अपने सुहाग की रक्षा की याचना करती है।

अन्ततः कथा में देवी की कृपा से करवा के पति को पुनर्जीवन प्राप्त होता है। उसके दुःख का अन्त होता है और उसके जीवन में फिर से सुख लौट आता है।

इस कथा को सुनने वाली स्त्रियाँ अपने-अपने परिवार के मंगल, पति की दीर्घायु और दाम्पत्य जीवन की स्थिरता की कामना करती हैं। कथा का समापन इस विश्वास के साथ होता है कि श्रद्धा, पश्चात्ताप और धैर्य मनुष्य को विपत्ति में भी आशा प्रदान करते हैं।

एक समय की बात है। एक स्त्री अपने पति के जीवन को लेकर अत्यन्त व्याकुल थी। संकट की घड़ी में उसने माता के सामने दीप जलाया और प्रार्थना की—

“हे माता! मेरे परिवार की रक्षा कीजिए। मेरे सुहाग की रक्षा कीजिए। मेरे घर में फिर से सुख और शान्ति स्थापित हो।”

लोकविश्वास के अनुसार माता ने उसकी करुण पुकार सुनी और उसके जीवन में आशा का संचार किया। इस घटना को आगे चलकर लोगों ने पति की रक्षा तथा अखण्ड सौभाग्य की कामना से जोड़कर सुनाया।

राजस्थान में चौथ माता से संबंधित स्थानीय कथाओं में संकटग्रस्त पति को जीवनदान मिलने जैसी घटनाओं का भी वर्णन मिलता है। इन्हें लोकश्रद्धा की कथाएँ समझना चाहिए, न कि बिना स्वतंत्र प्रमाण के ऐतिहासिक रूप से सत्यापित घटनाएँ।

गूढ़ भावार्थ: चतुर्थी के दिन माता की उपासना का लोकसंदेश है—संकट में धैर्य, परिवार के प्रति निष्ठा, जीवन के प्रति आशा और ईश्वर में विश्वास।

३. पीपल-देवी : वृक्ष में जीवन और देवत्व का दर्शन

एक गाँव के बाहर एक पुराना पीपल का वृक्ष था। गाँव की स्त्रियाँ उसके नीचे बैठकर अपने सुख-दुःख बाँटती थीं। गर्मी में वह छाया देता, पक्षियों को आश्रय देता और राहगीरों को विश्राम प्रदान करता था।

एक दिन एक वृद्धा ने नवविवाहिताओं से कहा—

“बेटियो! इस वृक्ष को देखो। इसकी जड़ें धरती में गहरी हैं, तना दृढ़ है और शाखाएँ सबको आश्रय देती हैं। परिवार भी ऐसा ही होना चाहिए। उसकी जड़ें संस्कार हों, तना विश्वास हो और शाखाएँ प्रेम तथा सहयोग हों।”

स्त्रियों ने वृक्ष के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और संकल्प किया कि वे प्रकृति की रक्षा करेंगी तथा परिवार में प्रेम बनाए रखेंगी।

नदी-देवी : जीवनधारा और सौभाग्य की लोककथा

एक गाँव नदी के किनारे बसा था। वहाँ की स्त्रियाँ नदी से जल लातीं, घर-परिवार के कार्य करतीं और उसके जल से खेतों तथा पशुओं का जीवन चलता था।

एक वर्ष नदी में जल बहुत कम रह गया। गाँव की वृद्ध महिलाओं ने सबको समझाया—

“जल केवल हमारी आवश्यकता नहीं, जीवन का आधार है। यदि हम जल को दूषित करेंगे, वृक्षों को काटेंगे और प्रकृति की उपेक्षा करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ कष्ट पाएँगी।”

करवा चौथ के दिन स्त्रियों ने अपने परिवार की मंगलकामना के साथ यह संकल्प भी लिया कि वे जल का सम्मान करेंगी, नदी को स्वच्छ रखेंगी और दूसरों को भी प्रकृति-संरक्षण के लिए प्रेरित करेंगी।

बुन्देलखण्ड का करवा चौथ लोकगीत — ‘करवा माई’

बुन्देली करवा चौथ गीत

करवा माई तोए बिजना झलूं

दीजो-दीजो पिया जी को

चंदा औ सूरज की लम्बी उम्मर

करवा माई तोए देऊं गुड़ की डली

दीजो-दीजो पिया जी को मोरी उम्मर

गीत का सरल अर्थ

  • ‘करवा माई’ — करवा चौथ से सम्बद्ध पूजनीय माता को स्नेहपूर्वक सम्बोधित करना।

  • ‘तोए बिजना झलूं’ — बुन्देली लोकभाषा में माता को पंखा झलने अथवा सेवा करने की भावना।

  • ‘चंदा औ सूरज की लम्बी उम्मर’ — चन्द्रमा और सूर्य की दीर्घ अवधि का रूपक लेकर पति के दीर्घ जीवन की कामना।

  • ‘गुड़ की डली’ — माता को भेंट देने का लोकभाव।

  • ‘दीजो-दीजो पिया जी को मोरी उम्मर’ — अपनी आयु का अंश भी पति को देने की भावपूर्ण कामना।

कथा का विशेष लोकतात्त्विक अर्थ

  • चौथ माता: संकट के समय आश्रय देने वाली देवी के रूप में लोकविश्वास।

  • करवा: भूल स्वीकार करने और कठिन परिस्थिति में धैर्य बनाए रखने वाली स्त्री।

  • पीपल पर दीपक: भ्रम और वास्तविकता के बीच का अन्तर; कथा में व्रत-भंग का कारण।

  • एक वर्ष की प्रतीक्षा: निष्ठा, शोक और आशा का प्रतीक।

  • पति का पुनर्जीवन: लोकआस्था में देवी-कृपा और सौभाग्य की पुनःप्राप्ति।

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सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

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विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन करिये | चंद्रहासो...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...