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शिव जी की अर्धांगिनी राम नाम जप कर बनी पार्वती जी


  *मां पार्वती राम नाम जपने के पश्चात ही शिव जी की अर्धांगिनी बन सकी*
 
पार्वती जी ने त्रिकालज्ञ श्री वामदेव जी से विष्णु मंत्र की दीक्षा ली थी। उस दीक्षा के अनुसार विष्णु सहस्त्रनाम का जप करती थी ।
    
परंतु एक बारद्वादशी के दिन शिव जी भोजन करने बैठे। उन्होंने पार्वती जी को अपने साथ भोजन के लिए आमंत्रित किया।
     
उस समय पार्वती जी विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रही थी, अतः उन्होंने निवेदन किया कि विष्णु सहस्त्रनाम का  पाठ समाप्त होने के पश्चात ही भोजन करने के लिए उपस्थित हो सकेंगी।
    
इस पर भगवान शिव ने कहा -
   *
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।सहस्त्रनाम का ततुल्यम राम नाम वरानने।*
 
अर्थात् मैं राम राम जप करते हुए श्री राम जी में व्यस्त रहता हूं ,रमता हूं।
तुम भी अपने मुंह से राम नाम का जप करो। क्योंकि विष्णु सहस्त्रनाम इस एक राम नाम के बराबर है ।
अतः एक बार राम का नाम उच्चारण करो और मेरे साथ भोजन के लिए आ जाओ।
       
पार्वती जी  "राम नाम" का उच्चारण कर। भगवान शिव जी के साथ भोजन किया ।
     
और  पार्वती जी नित्य श्री शिव जी के साथ "राम नाम" ही जपनी लगी।
      
इसके पश्चात पार्वती जी ने विष्णु सहस्रनाम पाठ छोड़ दिया।
   
पार्वती जी के हृदय के प्रेम को देखकर अभिभूत शिवजी अति प्रसन्न हुए और उन्होंने पार्वती जी को अपना जीवन साथी अर्धांगिनी बना लिया।
   
पार्वती जी ने शिव जी की कहने पर "राम नाम" जप कर इतनी बड़ी सफलता प्राप्त की जिसके लिए वे तपस्या रत वर्षों से थी।

*रामचरितमानस में "राम" शब्द  कितने बार प्रयुक्त हुआ ।*
          
राम शब्द भगवान विष्णु द्वारा भगवान शिव जी को दिया गया ,एवं काशी बनारस में भगवान शिव इस राम नाम से ही जीवो को मुक्ति प्रदान करते हैं ।
   
रामचरितमानस के बालकांड में यह शब्द 352 अयोध्या कांड में 560, अरण्यकांड में 75, किष्किंधा कांड में 42 ,सुंदरकांड में 62 ,लंका कांड में 145 ,और उत्तरकांड में 204 बार प्रयुक्त हुआ।
      
इन सब का योग करें तो जो परब्रह्म का अक्षर 9 है अर्थात 1440 बार "राम" नाम शब्द का प्रयोग ,तुलसीदास जी द्वारा रामचरितमानस में किया गया।

  
राम जी का मंत्र-
   
राम रामाय नमः.

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