दशहरा क्या है?
पूजा समय-
विजय दशमी / दशहरा शमी तथा नीलकंठ पूजन विधि -
विजय काल - दोपहर 14:07 से
14:50 तक
पूजन समय - 13:39 से 16:30 तक
अवधि - 02 घंटे 23 मिनट्स
बंगाल विजयादशमीnext day
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- यह पर्व विजय या शक्ति का पर्व है ,दशहरा नाम से बहु प्रचलित है।
सस्कृत शब्द दश $ अहा - दस दिन दस सूर्य + हरा विजय हरण।
जिस प्रकार अहा दिन निश रात और बना अहर्निश अर्थात दिन रात उस प्रकार ही दश और अहा दशहरा निर्मित होना संभव है।
1 दश अर्थात दस हरा अर्थात दश ग्रीव रावण को पराजित किया।
इस दिन रावण पराजित हुआ दशग्रीव दश कंधर दशानन विजय से अभिप्राय दस दोषो दस दुर्गणो पर विजय या दश दुर्गणो पर नियंत्रण या अधिकार स्थापित करने का पर्व है।
- दश दुर्गणो पर नियंत्रण या अधिकार स्थापित करने का पर्व है।
- दश दुर्गुण व्यक्त्वि दश दोष - अहंकार अन्याय अमानवीयता काम ्रक्रोध मोह मद मत्सर स्वार्थ लोभ या लालच।
- इस दिन भगवान विष्णु के सातवे अवतार श्रीराम द्वारा पत्नी सीता के अपहरण के कारण दशग्रीव रावण का वध किया था।
- उत्तर भारत के रघुवंशी राज परिवार के राम द्वारा रावण का वध एव विजय के अवसर पर सहज स्वाभाविक उल्लास हर्ष उत्सव काअ वसर स्मरणीय दिन हुआ दशहरा।
- मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश बिहार महाराष्ट आदि में रावण दहन कर इस दिन को उत्सव में मनाया जाता है।
-इसके 10 दिन बाद राम लक्ष्मण सीता अयोध्या पहुंचे। उनके स्वागत के लिये पूरा नगर दीप ज्योतिमय दीप जलाकर बनाया गया दीपावली का दिन।
यह पर्व विजयादशमी अर्थात विजय का पर्व शक्ति शौर्य का पर्व है।
2 शक्तिदेवी दुर्गा तारा चामुण्डा की पूजा का अंतिम दिन उनके पार्थिव स्वरुप विसर्जन का पर्व है।
’ दूसरी ओर एक राजा की दूसरे राजा पर विजय का पर्व दशहरा है।
’तीसरा विभिन्न शक्तियो अपराजिता देवी सरस्वती लक्ष्मी की आराधना का पर्व है। ’चैथा आयुध वाहन पुस्तक पूजा का पर्व है।
’पांचवा शमी वृक्ष पूजा सोनपत्ती आपति एवं ज्वारो के द्वारा चिंता शमन भाग्य वृद्धि समृद्धि की शुभकामना का पर्व है। अनेक विविधतााओ भरा पर्व है विजयदशमी या दशहरा।
दशहरा या विजयादशमी. दशमी पूजा कौन अवश्य करे
,वृष कन्या एवं मीन राशि वालो दशमी को पूजा सदैव करना चाहिये। विजयादशमी को पूजा करने से वर्ष भर दशमी के हानि कष्ट पीडा दायी फल नही मिलेगे।
यदि राशि ज्ञात न हो तो इ उ ऐ ओ व प ठ दू दो च ची अक्षर से जिनके नाम प्रारंभ हो उन्हे अवश्य पूजा करना चाहिये।
’’’’’’’’’’’’’’’ भारत में सर्वत्र दशमी को पर्व मनाया जाता है।
दशहरा पर्व की व्यापकता भारत
भारत के विभिन्न राज्यों /प्रदेशो में पर्व की व्यापकता भारत के समीपवर्ती देशो में दशहरा / विजयादशमी पर्व मनाया जाता है। दशहरा या विजयदशमी परम्पराएँ कुल्लू में दशहरा की धूमधाम अधिक रहती है।
-हिमाचल प्रदेश के इस नगर में 17वी सदी में तात्कालीन राजा भगतसिंह द्वारा भगवानराम स्वरुप रघुनथ जी को यहा का राजा घोषित कर दिया था तब से अब तक दश्हारा रघुनाथ जो को समर्पित है।
-आंध्रप्रदेश मेे शस्त्र यश आयुधो की पूजा का पर्व है। इस दिन विधा की देवी सरस्वती की पूजा सरस्वती मंत्र पुस्तक अंध में उपलब्ध है की जाती है।
- कर्नाटक में भी आयुध पूजा का पर्व है।
- तेलगाना राज्य में शमी वृक्ष की पूजा का महत्व है। परिवार के छोटे सदस्यो द्वारा अग्रजो या बडो का सम्मान सहित शमी वृक्ष की Leaf यश चिंता मुक्ति हेतु भेट करते है।
बडो द्वारा छोटो को शुभकामना परक आशीष दिये आने की परंपरा है।
उत्तराखंड बिहार और उत्तरप्रदेश में आश्वनि शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को जौ पूजा स्थल पर बौने की परंपरा है।
जिनक पौधे जवारे कहलाते है।
दशहरा के दिन मित्रो परचितों रिश्तेदारे को टोपी या उनके कान पर जवारे सम्मान प्रकट करने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है इससे भाग्यवृद्धि प्राप्त करने वाले ही होती है गले मिलते है। आत्मीयता एकता सामाजिकए क सूत्रबंधन का एकात्मता का पर्व हो जाता है।
-मैसूर में कुल देवी अधिष्ठात्री चामुंडेश्वरी की पूजा की परंपरा है .
मैसूर में दश्हारा पर्व अत्यंत हर्षउल्लासय का पर्व है। शभी वृक्ष की पतियो को भेट करने की परंपरा है। वर्ष चिंता मुक्त कुशलता एवं समद्धि का रहे इसी मनोकामना प्रदानकर्ता की होती है ।
-उडीसा में देवी के नवरुपो में एकम तारा देवी की पूजा का बडा पर्व है शक्ति पूजा का पर्व होता है। शरोपिया पूजा दुर्गा जी की होती है 10 से 16 दिन तक षोडसउपचार पूजा का विधान है।
-केरल में अष्टमी नवमी दशमी तीन दिन इस अवसर पर पूजा की जाती है विधा प्रारंभ के लिये श्रेष्ठ दिन माना जाता है सरस्वती की पूजा का महत्व है पुस्तको की पूजा की जाती है एक प्लेट में चावल बिखेर देते है दो तीन वर्ष के शिशु से तर्जनी अंगूठे के पास वाली उगली से हरि श्री गणपतये नमः लिखवाने का प्रयास किया जाता है।
-बंगाल मे देवी पूजा का सर्वाधिक महत्व है।
पंचमी से दशमी तक पांच दिन दुर्गा का विराट पूजा होती हैं बंगाल समूचा दुर्गामय देवीमय शकितमय हो जाता है। दशमी को पार्थिव दुर्गा देवी का तालाब में विसर्जन किया जाता है। नेपाल मं यह दशै विजय दशमी कहलाता है नेपाल में इस पर्व पर भारी धूमधाम होती है। गांव 2 तक इसका महत्व है बच्चेा के माथे पर बडो द्वारा हरा पीला मिथित रंग का टीका लंबे आकार में लगाया जाता है। यह टीका सुरक्षा विजय का संकेतक एवं आवश्यक जैसा है। 8वे दिन बकरी भैस चिकन की बलि देकर प्रसाद बांटा जाता है।
बागलादेश में रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित मंदिर है।
- ढाका में ढाकेश्वरी देवी का मंदिर है। हल्दी से दुर्गा जी की पूजा की जाती है। दशमी को पार्थिव दुर्गा का विसर्जन किया जाता है। इस प्रकार भारत में सर्वत्र दशमी को पर्व मनाया जाता है।
उत्तरभारत मे भगवान राम की रावण के विजय के उपलक्ष्य में तो शेष के पूर्वी एवं दक्षिणी भारत में देवी की शक्तिरुप में दशमी या वि जयादशमी पर्व मनाया जाता है। राम स्वतन सरस्वती तारा दुर्गा आदि विभिन्न देवियो की पजा का पर्व रावण दहन पर्थिव दुर्गा विसज्रन का पर्व है।
शुभकामना देने समृद्धि की कामना आयुध वाहन पूजा का भी पर्व ह
भारत का कई हिंदु त्यौहार का दिन इतना सर्व व्यापाक प्रचारित प्रसारित नही है और न ही उतनी विभिन्नता वाला है जितना आश्वनि माह शुक्ल पक्ष दश्मी एवं श्रवण नक्षत्र का संयोग वाला दिन है।
सम्पूर्ण भारत वर्ष में विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। उत्तर भारत में दशहरा नाम अधिक प्रचलित है शेष भारत में विजयादशमी नाम प्रसिद्ध है।
अपराजिता देवी पूजा कब करे? दशहरा या विजयादशमी
दशहरा या विजयादशमी के अवसर पर अपराजिता देवी की पूजा करने के विधान है। अपराजिता देवी की पूजा जो करते है अपराजिता देवी की पूजा के दिन नवमी तिथि ये युक्त दशमी होना चाहिये। जयवर्धनी अपराजिता की पूजा ईशान दिशा में की जाती है। एक पौधा भी अपराजिता नामका होता है उसकी पूजा भी की जाती है उडीसा में अपराजिता की पूजा की जाती है ।
तारा देवी शक्ति पीठ में षोडश उपचार 10 से 16 दिन पूजा होती है । चावल को जल एवं दही में पकाते है। पीठा, मीठा बनाकर मछली तलकर देवी को अर्पित करते है।दशहरा पर्व एवं विजय दशमी को वाचन श्रवण सदैव विजय कारी,दुर्गा जी स्वरूप अपराजिता देवी -
-
अपराजित मंत्र
(1).. ओम ऐं ऐं अपराजितायै क्लीं क्लीं फट् |
(2.) ओम बलायै महाबलायै असिद्धसाधिनी अपराजितायै नमः |
(3.)ओम बलायै विदमहे महाबलायै धीमहि तन्नोअपराजिता प्रचोदयात् |
(4.).ॐ आकर्षिणी आवेशिनी ज्वालामालिनी रमणि रामणि
धरणि धारणि तपनि तापिनि मनोन्मादिनि,
शोषिणि सम्मोहिनि नीलपताके महानीले महाप्रिये महाग्रेयि
महाचण्डे महारौद्रि महावज्रिणि आदित्य रश्मि जाह्नवि यमघण्टे!
किलि किलि चिन्तामणि सुरभि सुरोत्पन्ने सरस्वति सर्वकामदुधे!
मम मनीषितं कार्यं तन्मे सिध्यतु स्वाहा|
विष्णुकांता या अपराजिता वृक्ष की पूजा- एवं मन्त्र -
अपराजिता पूजन मंत्र :-
हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला ।अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम ।।
यात्रा समय माता अपराजिता की स्तुति से यात्रा में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता-
शृणुध्वं मुनय: सर्वे सर्वकामार्थ सिद्धिदाम्।
असिद्ध साधिनीं देवीं वैष्णवीम अपराजिताम्।।
नीलोत्पल दल श्यामां भुजङ्गाभरणोज्ज्वलाम्।
बालेन्दुमौलिसदृशीं नयनत्रितयान्विताम्।।
पीनोत्तुङ्गस्तनीं साध्वीं बद्धपद्मासनां
शिवाम्। अजितां चिन्तयेद्देवीं वैष्णवीमपराजिताम्।।
शमी पत्ता एवं फूल का महत्व शिव कृपा -
-शनि दोष ,साढ़ेसती,लग्न,पंचम द्ष्टवादश,चतुर्थ गोचर शनि दोष के लिए शनिवार को अवश्य शमी वृक्ष पूजा करे | अनादी देव शिव पर शमी पत्र अर्पण का सर्वाधिक महत्व-
- आक के फूल को चढाने से बहुत मिलता है , हज़ार आक के फूलों कि अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों के की अपेक्षा एक बिल्व-पत्र ,हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल ; हजार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल,
हजार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता, हजार शमी के पत्तो के बराकर एक नीलकमल, हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।
दशमी को नीलकंठ या खंजन पक्षी दर्शन विशेष शुभ अनुकूल भविष्य संकेत-'
मंत्र-
वासुदेव स्वरूपेण सर्व काम फल प्रद।
पृथिव्याम अवतीर्ण असि खंजरीट नमोस्तुते।
खंजनाय नमस्तुभ्यं सर्व अभीष्ट प्रदाय च।।
नीलकंठाय भद्राय भद्र रुपाय ते नमः ।
भद्रं त्वम देही मे भद्रम आशाम पूरय पूरय।
स्वस्तिकोअसि कुरु खंजरीट नमोस्तुते ।।
नारायण स्वरूपाय संवत्सर सुखाप्रद ।
नीलकंठ महादेव खंजरीट नमोस्तुते ।।
देव दानव यक्षणाम नाराणम पुष्टिवर्धनम ।दर्शन तव भद्रस्य विष्णु रूप नमोस्तुते।।
शमी पूजा मन्त्र-
“शमी शमयते पापं शमी लोहित कण्टका। बाण रामस्य प्रिय वादिनी ।
करिष्यमाण यात्रायां यथा काल सुखं मया।
तत्र निर्विघ् नकत्र्री त्वं भव श्रीराम पूजिते।।”
मंत्र अर्थ- शमी पापों का शमन करती है।यात्रा के पूर्व स्मरण से सफलता देती है।
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दशहरा अथवा विजयादशमी केवल रावण-वध का पर्व नहीं है। इस तिथि के साथ श्रीराम की विजय, देवी दुर्गा की असुर पर विजय, शस्त्र-पूजन, शमी-पूजन तथा नीलकण्ठ-दर्शन जैसी अनेक धार्मिक एवं क्षेत्रीय परम्पराएँ जुड़ी हुई हैं। इनकी उत्पत्ति और शास्त्रीय प्रमाण विभिन्न पुराणों, रामायण, महाभारत तथा लोकपरम्पराओं में मिलते हैं।
दशहरा अथवा विजयादशमी केवल रावण-वध का पर्व नहीं है। इस तिथि के साथ श्रीराम की विजय, देवी दुर्गा की असुर पर विजय, शस्त्र-पूजन, शमी-पूजन तथा नीलकण्ठ-दर्शन जैसी अनेक धार्मिक एवं क्षेत्रीय परम्पराएँ जुड़ी हुई हैं। इनकी उत्पत्ति और शास्त्रीय प्रमाण विभिन्न पुराणों, रामायण, महाभारत तथा लोकपरम्पराओं में मिलते हैं।
१. दशहरा और विजयादशमी में क्या अन्तर है?
विजयादशमी — आश्विन शुक्ल दशमी का धार्मिक नाम है। यह विजय, धर्म-संस्थापन और शुभारम्भ का प्रतीक है।
दशहरा — इसी पर्व का प्रचलित नाम है। इसे सामान्यतः दस प्रकार के पापों अथवा दस सिर वाले रावण पर विजय से भी जोड़ा जाता है। यह लोकप्रिय धार्मिक व्याख्या है, कोई एकमात्र सर्वमान्य व्युत्पत्ति नहीं।
विजया दशमी — बंगाल सहित पूर्वी भारत में दुर्गापूजा के समापन से जुड़ा नाम है।
प्रमुख शास्त्रीय आधार:
- वाल्मीकि रामायण —
श्रीराम और रावण के युद्ध का वर्णन।
- मार्कण्डेय पुराण के
अन्तर्गत देवीमाहात्म्य — देवी की महिषासुर पर विजय का वर्णन।
२. विजयादशमी पर किसकी पूजा होती है और क्यों?
१. श्रीराम की पूजा
कारण — रावण पर विजय, धर्म की रक्षा, मर्यादा और सदाचार की स्थापना के प्रतीक रूप में। उत्तर भारत में रामलीला तथा रावण-दहन इसी परम्परा के प्रमुख अंग हैं।
२. माँ दुर्गा अथवा महिषासुरमर्दिनी की पूजा
कारण — महिषासुर पर देवी की विजय के उपलक्ष्य में। बंगाल, असम और अन्य पूर्वी क्षेत्रों में दुर्गापूजा तथा विजयादशमी का विशेष महत्त्व है।
३. शमी-वृक्ष की पूजा
कारण — पाण्डवों के अज्ञातवास में शस्त्र छिपाने और बाद में उन्हें पुनः प्राप्त करने की महाभारत-परम्परा से शमी-पूजन को जोड़ा जाता है। यह विजय, साहस और कार्यारम्भ का प्रतीक माना जाता है।
४. अस्त्र-शस्त्र, औजार एवं वाहन की पूजा
कारण — अपने कर्म-साधनों के प्रति सम्मान, सुरक्षा और कार्य में सफलता की कामना के लिए। दक्षिण भारत में इसे आयुध-पूजा अथवा शस्त्र-पूजा की परम्परा से भी जोड़ा जाता है।
३. शमी-पूजन : मन्त्र और शास्त्रीय सन्दर्भ
शमी-पूजन में प्रचलित मन्त्र है—
**शमी शमयते पापं शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥**
भावार्थ: शमी पापों का शमन करने वाली तथा शत्रुओं के विनाश की प्रतीक मानी गई है। इसका सम्बन्ध अर्जुन की शस्त्र-प्राप्ति की कथा और श्रीराम की विजय-परम्परा से जोड़ा जाता है।
प्रमाण के विषय में सावधानी: यह श्लोक विजयादशमी की शमी-पूजा की प्रचलित परम्परा में मिलता है। मूल ग्रन्थ, अध्याय और श्लोक संख्या की पुष्टि के बिना इसे सीधे वेद-मन्त्र अथवा महाभारत का मूल श्लोक घोषित नहीं करना चाहिए।
महाभारत का सम्बन्ध: विराट पर्व में पाण्डवों के अज्ञातवास और अर्जुन द्वारा शस्त्र पुनः प्राप्त करने का प्रसंग इस परम्परा की प्रमुख कथात्मक पृष्ठभूमि है।
४. नीलकण्ठ-दर्शन : शिव से सम्बन्ध और ग्रन्थ-प्रमाण
नीलकण्ठ पक्षी को सामान्यतः भारतीय नीलकण्ठ कहा जाता है। विजयादशमी पर इसका दर्शन शुभ मानने की लोकपरम्परा उत्तर भारत के अनेक भागों में प्रचलित है।
भगवान शिव का एक प्रसिद्ध नाम भी नीलकण्ठ है। समुद्र-मन्थन के समय विष धारण करने की पौराणिक कथा के कारण शिव के इस नाम का विशेष महत्त्व है।
दुर्लभ शोध-बिन्दु: शिव के नीलकण्ठ नाम का पौराणिक आधार और दशहरे पर नीलकण्ठ पक्षी देखने की परम्परा दो अलग बातें हैं। नीलकण्ठ पक्षी के दशहरे-दर्शन को अनिवार्य वैदिक विधान या निश्चित फल देने वाला शास्त्रीय नियम सिद्ध करने वाला कोई स्पष्ट मूल श्लोक यहाँ प्रमाणित नहीं है। इसे मुख्यतः लोक-शकुन एवं क्षेत्रीय धार्मिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है।
- पक्षी स्वाभाविक रूप
से दिखाई दे तो श्रद्धापूर्वक दर्शन करें।
- शुभ दर्शन कराने के
नाम पर पक्षी को पकड़ना, पिंजरे में रखना या उसे परेशान करना उचित नहीं है।
५. भारत में कहाँ दशहरा अलग तरह से मनाया जाता है?
भारत में किन-किन स्थानों पर रावण-दहन नहीं होता और क्यों?
भारत में कुछ ऐसे गाँव, नगर और समुदाय हैं जहाँ विजयादशमी पर रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा, स्मरण अथवा मृत्यु पर शोक करने की परम्परा मिलती है। लेकिन किसी स्थान पर रावण-दहन की परम्परा न होना, पूरे प्रदेश में उसका निषेध होना नहीं है। ये प्रायः स्थानीय धार्मिक मान्यताएँ और सांस्कृतिक परम्पराएँ हैं।
१. प्रमुख स्थान और उनकी स्थानीय मान्यताएँ
१. बिसरख — उत्तर प्रदेश
स्थान — ग्रेटर नोएडा, गौतम बुद्ध नगर।
परम्परा — रावण का पुतला नहीं जलाने तथा पूजा और प्रार्थना करने की स्थानीय परम्परा प्रचलित है।
कारण — स्थानीय मान्यता के अनुसार बिसरख रावण की जन्मभूमि है। यहाँ रावण को ऋषि विश्रवा का पुत्र, विद्वान ब्राह्मण और शिवभक्त मानकर सम्मान दिया जाता है।
२. मंदसौर — मध्य प्रदेश
स्थान — विशेषतः खानपुरा क्षेत्र।
परम्परा — कुछ स्थानीय समुदाय रावण-दहन के स्थान पर उसकी पूजा करते हैं।
कारण — स्थानीय मान्यता में मंदोदरी का मायका मंदसौर माना जाता है। इस कारण रावण को दामाद मानकर सम्मान दिया जाता है। यह धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यता है, सर्वमान्य ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं।
३. बैजनाथ — हिमाचल प्रदेश
स्थान — कांगड़ा जिला।
परम्परा — यहाँ रावण-दहन से परहेज करने की स्थानीय मान्यता प्रचलित है।
कारण — लोककथा के अनुसार रावण ने इस क्षेत्र में भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। इसलिए उसे महान शिवभक्त मानकर सम्मान दिया जाता है।
४. मण्डोर — राजस्थान
स्थान — जोधपुर।
परम्परा — कुछ समुदाय रावण की पूजा करते हैं तथा उसके दहन में भाग नहीं लेते।
कारण — स्थानीय परम्परा में मंदोदरी को मण्डोर से सम्बद्ध माना जाता है। कुछ दवे ब्राह्मण समुदाय स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं और उसके लिए श्राद्ध अथवा पिण्डदान जैसी परम्पराएँ निभाते हैं।
५. रावणग्राम — मध्य प्रदेश
स्थान — विदिशा जिला।
परम्परा — यहाँ रावण से सम्बन्धित मंदिर और पूजा की स्थानीय परम्परा मिलती है।
कारण — रावण को पूजनीय मानने वाली क्षेत्रीय धार्मिक मान्यता। हालांकि यहाँ पूरे क्षेत्र में रावण-दहन बिल्कुल नहीं होता, ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
६. कोलार — कर्नाटक
परम्परा — कुछ स्थानीय धार्मिक परम्पराओं में रावण की पूजा की जाती है।
कारण — रावण को भगवान शिव का परम भक्त और विद्वान मानने की परम्परा। यह कोलार जिले की सभी बस्तियों पर लागू नहीं होती।
७. मालवल्ली — कर्नाटक
स्थान — मण्ड्या जिला।
परम्परा — रावण के मंदिर में उसकी पूजा की जाती है।
कारण — शिवभक्ति और रावण के प्रति स्थानीय धार्मिक सम्मान। मंदिर में पूजा होना इस बात का स्वतः प्रमाण नहीं कि पूरे नगर में रावण-दहन निषिद्ध है।
८. गढ़चिरौली — महाराष्ट्र
परम्परा — कुछ गोंड आदिवासी समुदाय रावण तथा उसके पुत्र को अपना पूर्वज अथवा पूजनीय पात्र मानते हैं।
कारण — समुदाय की अपनी सांस्कृतिक पहचान, पूर्वज-परम्परा और रावण के प्रति अलग धार्मिक दृष्टिकोण। इसे पूरे गढ़चिरौली जिले में दशहरे पर रावण-दहन न होने का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
*9-. बस्तर — छत्तीसगढ़
स्थान — जगदलपुर और आसपास का क्षेत्र।
परम्परा — यहाँ का प्रसिद्ध दशहरा सामान्य उत्तर भारतीय रावण-दहन के बजाय स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना पर केन्द्रित है।
कारण — माँ दन्तेश्वरी की पूजा, आदिवासी परम्पराएँ और विशिष्ट ऐतिहासिक उत्सव। इसे रावण की पूजा करने की परम्परा से अलग समझना चाहिए।
२. कुछ अतिरिक्त स्थान — रावण-पूजा, शिवभक्ति और विद्वत्ता के कारण
*.10 कानपुर — उत्तर प्रदेश
यहाँ दशानन मन्दिर प्रसिद्ध है, जो विजयादशमी के दिन विशेष रूप से खुलता है। रावण को विद्वान और शिवभक्त मानकर पूजा करने की परम्परा मिलती है। किन्तु कानपुर नगर में सर्वत्र रावण-दहन वर्जित नहीं है।
*11 काकीनाडा — आन्ध्र प्रदेश
यहाँ रावण से सम्बद्ध शिव-मन्दिर और पूजा-परम्परा का उल्लेख मिलता है। स्थानीय कथाओं में रावण की शिवभक्ति को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इसे पूरे काकीनाडा में रावण-दहन निषिद्ध होने का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
* 12उज्जैन — मध्य प्रदेश
कुछ स्थानीय धार्मिक आयोजनों में रावण को शिवभक्त के रूप में स्मरण किया जाता है। महाकाल की नगरी होने के कारण शिवभक्ति का सन्दर्भ महत्त्वपूर्ण है; लेकिन उज्जैन में रावण-दहन पर सार्वत्रिक प्रतिबन्ध होने का ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
*13बिहुनी कलाँ — उत्तर प्रदेश
हमीरपुर जिले के इस गाँव में रावण की विशिष्ट प्रतिमा की पूजा तथा दशहरे पर पुतला न जलाने की परम्परा की हाल में रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। ग्रामीणों के अनुसार रावण विद्वान और शक्तिशाली राजा था तथा लक्ष्मण ने भी उससे ज्ञान प्राप्त किया था। यह स्थानीय परम्परा का उल्लेखनीय उदाहरण है।
*14. डेरापुर — उत्तर प्रदेश
यहाँ की रामलीला में रावण के पुतले से जुड़ी परम्परा दशहरे के बजाय एकादशी से सम्बन्धित रही है। स्थानीय आयोजकों के अनुसार रावण-वध की तिथि को लेकर धार्मिक व्याख्या इस परम्परा के पीछे है। इसलिए इसे पूर्ण निषेध के बजाय तिथि और आयोजन की विशिष्ट परम्परा कहना अधिक उचित है।
३. रावण के तन्त्र, ज्योतिष और शिवभक्ति का शास्त्रीय महत्त्व
आपका संकेत महत्त्वपूर्ण है। रावण को केवल रामायण के प्रतिनायक के रूप में देखना उसके परम्परागत विद्वत्ता-पक्ष को अधूरा छोड़ देता है।
१. शिवभक्ति — शिवताण्डवस्तोत्र
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले...
यह शिवताण्डवस्तोत्र का आरम्भिक अंश है। इसकी रचना परम्परागत रूप से रावण को समर्पित मानी जाती है। हालाँकि इसकी रचनाकारिता और मूल ग्रन्थ में स्थिति को लेकर पाठालोचनात्मक प्रश्न भी हैं।
२. ज्योतिष — रावणसंहिता
रावणसंहिता नाम से ज्योतिष एवं फलित-ज्योतिष की पुस्तकें प्रचलित हैं। प
३. तन्त्रविद्या और साधना
लोकप्रिय धार्मिक साहित्य में रावण को तन्त्र, मन्त्र, औषधि तथा विभिन्न विद्याओं का ज्ञाता बताया जाता है। ४. शिवभक्ति का स्थानीय प्रभाव
बिसरख, बैजनाथ, मंदसौर, मण्डोर और कुछ अन्य स्थानों पर रावण के प्रति सम्मान की परम्पराएँ अलग-अलग कारणों से विकसित हुई हैं। कहीं जन्मभूमि की मान्यता, कहीं पारिवारिक सम्बन्ध, तो कहीं शिवभक्ति और विद्वत्ता को महत्त्व दिया जाता है।
निष्कर्ष
रावण के प्रति सम्मान रखने वाले समुदायों की दृष्टि में उसकी शिवभक्ति, विद्वत्ता और ज्योतिष-तन्त्र से जुड़ी परम्पराएँ महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं। फिर भी रावण की विद्वत्ता का सम्मान करना और रावण-दहन को धार्मिक रूप से निषिद्ध मानना दो अलग बातें हैं
२. क्या इन स्थानों पर रावण-दहन शास्त्रों से वर्जित है?
नहीं, ऐसा कोई सार्वदेशिक शास्त्रीय निषेध प्रमाणित नहीं है।
इन स्थानीय परम्पराओं के पीछे मुख्यतः चार कारण दिखाई देते हैं।
1. जन्मभूमि की मान्यता — बिसरख में रावण को स्थानीय पूर्वज मानना।
2. पारिवारिक सम्बन्ध की मान्यता — मंदसौर और मण्डोर में रावण को दामाद मानकर सम्मान देना।
3. शिवभक्ति का सम्मान — बैजनाथ, कोलार तथा अन्य स्थानों में रावण को शिवभक्त के रूप में देखना।
4. स्थानीय देवी-देवताओं की परम्परा — बस्तर जैसे क्षेत्रों में दशहरे का मुख्य धार्मिक केन्द्र अलग होना।
ये कारण स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़े हैं। इन्हें पूरे राज्य का नियम या वेदों द्वारा निर्धारित निषेध नहीं कहा जा सकता।
३. सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष
- रावण-दहन से स्पष्ट परहेज की
चर्चित परम्पराएँ: बिसरख, मंदसौर के कुछ क्षेत्र, बैजनाथ और मण्डोर के कुछ
समुदाय।
- रावण-पूजा की क्षेत्रीय
परम्पराएँ: विदिशा का रावणग्राम, कर्नाटक के कुछ क्षेत्र तथा गढ़चिरौली के
कुछ गोंड समुदाय।
- रावण-दहन के बजाय अलग दशहरा
परम्परा: बस्तर और मैसूर जैसे स्थान, जहाँ उत्सव का मुख्य केन्द्र स्थानीय
देवी की विजय तथा राजकीय या सामुदायिक आयोजन है।
छत्तीसगढ़ — बस्तर
यहाँ दशहरा लगभग पचहत्तर दिनों तक चलने वाले विशिष्ट आदिवासी एवं स्थानीय देवपरम्परा के उत्सव के रूप में प्रसिद्ध है। इसका केन्द्र माँ दन्तेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की परम्परा है। यहाँ सामान्य उत्तर भारतीय रीति की तरह रावण-दहन नहीं होता।
उत्तर प्रदेश — बिसरख
स्थानीय मान्यता में बिसरख को रावण का जन्मस्थान माना जाता है। यहाँ रावण के प्रति श्रद्धा रखने वाली परम्परा के कारण सामान्य रावण-दहन से अलग दृष्टिकोण मिलता है। यह स्थानीय परम्परा है, निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य नहीं।
राजस्थान — जोधपुर एवं मण्डोर के कुछ समुदाय
कुछ स्थानीय समुदाय रावण को अपना सम्बन्धी अथवा विद्वान ब्राह्मण मानकर उसका सम्मान करते हैं और रावण-दहन से दूर रहते हैं। इसे पूरे राजस्थान की प्रथा नहीं कहना चाहिए।
किस प्रदेश में विजयादशमी सबसे अधिक प्रचलित है?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि सबसे अधिक से आपका आशय क्या है।
- रावण-दहन और रामलीला:
उत्तर प्रदेश, दिल्ली तथा उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में विशेष रूप से
प्रसिद्ध।
- भव्य दुर्गापूजा और
विजयादशमी: पश्चिम बंगाल में विशेष महत्त्व।
- शाही दशहरा एवं
शोभायात्रा: कर्नाटक के मैसूर में प्रसिद्ध।
- स्थानीय देवी-देवताओं
का विशिष्ट दशहरा: हिमाचल प्रदेश के कुल्लू तथा छत्तीसगढ़ के बस्तर में
प्रसिद्ध।
उपलब्ध प्रमाणों से किसी एक राज्य को सम्पूर्ण भारत में विजयादशमी मनाने वाला सबसे बड़ा राज्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। अलग-अलग परम्पराओं के आधार पर तुलना करना अधिक तथ्यपरक है।
६. कहाँ दशहरा मनाना या रावण-दहन करना वर्जित है?
मुख्य अन्तर समझें — किसी क्षेत्र में रावण-दहन न होना और वहाँ विजयादशमी मनाना निषिद्ध होना एक ही बात नहीं है।
क्षेत्र अथवा परम्परा
वास्तविक स्थिति
बस्तर, छत्तीसगढ़
स्थानीय देवी-देवताओं पर केन्द्रित दशहरा; सामान्य रावण-दहन नहीं।
बिसरख, उत्तर प्रदेश
कुछ स्थानीय मान्यताओं में रावण-पूजन; रावण-दहन से परहेज की परम्परा।
जोधपुर–मण्डोर के कुछ समुदाय
रावण के प्रति पारिवारिक या सांस्कृतिक सम्मान के कारण दहन से परहेज।
इन उदाहरणों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि किसी पूरे राज्य में विजयादशमी मनाना शास्त्रतः वर्जित है। सम्पूर्ण प्रदेश के लिए निषेध का दावा करने हेतु स्पष्ट धार्मिक आदेश या प्रमाणित ऐतिहासिक दस्तावेज चाहिए।
७. विजयादशमी का दुर्लभ धार्मिक निष्कर्ष
विजयादशमी की परम्पराओं में तीन प्रमुख धाराएँ दिखाई देती हैं।
१. वैष्णव परम्परा: श्रीराम की विजय, धर्मपालन और मर्यादा।
२. शाक्त परम्परा: माँ दुर्गा की विजय, शक्ति और अधर्म का दमन।
३. शस्त्र एवं लोकपरम्परा: शमी-पूजन, आयुध-पूजन, नीलकण्ठ-दर्शन और विजय के लिए शुभारम्भ।
इनमें रामायण तथा देवीमाहात्म्य से सम्बन्धित विजय-कथाएँ, महाभारत से सम्बद्ध शमी की कथा और नीलकण्ठ-दर्शन की लोकमान्यता — तीनों को अलग-अलग प्रमाण-श्रेणियों में रखना चाहिए। यही इस विषय का सबसे महत्त्वपूर्ण शोधपरक पक्ष है।
मैसूर में रावण-दहन क्यों नहीं होता? — प्रमाण सहित विशेष विवेचन
मुख्य कारण: मैसूर का दशहरा मुख्यतः माँ चामुण्डेश्वरी द्वारा महिषासुर-वध और देवी की विजय का उत्सव है। उत्तर भारत के अनेक स्थानों की तरह यहाँ दशहरे का मुख्य धार्मिक केन्द्र श्रीराम द्वारा रावण-वध का नाटकीय प्रदर्शन नहीं, बल्कि देवी की विजय, राजकीय परम्परा और भव्य शोभायात्रा है।
१. मैसूर दशहरे के प्रमुख ऐतिहासिक प्रमाण
प्रमाण १ — कर्नाटक सरकार का मैसूर दशहरा पोर्टल
सरकारी विवरण के अनुसार, मैसूर दशहरा कर्नाटक का राज्योत्सव है। इसकी परम्परा सन् १६१० में राजा वाडियार प्रथम के समय श्रीरंगपट्टण में प्रारम्भ हुई। बाद में यह राजकीय उत्सव मैसूर में विशेष रूप से विकसित हुआ।
प्रमाण २ — देवी चामुण्डेश्वरी की विजय
मैसूर दशहरे का प्रमुख धार्मिक आधार माँ चामुण्डेश्वरी की महिषासुर पर विजय है। मैसूर का नाम भी स्थानीय धार्मिक परम्परा में महिषासुर की कथा से जुड़ा है। विजयादशमी पर देवी की स्वर्ण-अम्बारी सहित जम्बू सवारी इस उत्सव का मुख्य आकर्षण है।
प्रमाण ३ — भारत सरकार का पर्यटन पोर्टल
भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर दशहरे की विभिन्न क्षेत्रीय परम्पराओं में मैसूर का विशेष उल्लेख है। यहाँ देवी चामुण्डेश्वरी की विजय, राजमहल की रोशनी, सुसज्जित हाथियों और भव्य शोभायात्रा को प्रमुखता दी गई है।
२. क्या मैसूर में रावण-दहन करना वर्जित है?
नहीं। उपलब्ध आधिकारिक स्रोत यह प्रमाणित नहीं करते कि मैसूर में रावण-दहन पर कोई धार्मिक, राजकीय या कानूनी प्रतिबन्ध है।
सही निष्कर्ष यह है कि मैसूर के प्रसिद्ध राजकीय दशहरा समारोह की मुख्य पहचान रावण-दहन नहीं, बल्कि देवी चामुण्डेश्वरी की विजय और जम्बू सवारी है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि पूरे मैसूर में कहीं भी रावण-दहन नहीं होता।
३. मैसूर और उत्तर भारत के दशहरे में अन्तर
विषय
मैसूर, कर्नाटक
उत्तर भारत के अनेक क्षेत्र
मुख्य धार्मिक केन्द्र
माँ चामुण्डेश्वरी
श्रीराम और रावण-वध की कथा
प्रमुख आयोजन
जम्बू सवारी, देवी की स्वर्ण-अम्बारी, राजकीय समारोह
रामलीला और रावण-दहन
ऐतिहासिक परम्परा
वाडियार राजवंश से जुड़ा राजकीय उत्सव
रामलीला तथा क्षेत्रीय धार्मिक आयोजन
मुख्य सन्देश
महिषासुर पर देवी की विजय
रावण पर श्रीराम की विजय
ये दोनों परम्पराएँ विजयादशमी के अलग-अलग धार्मिक पक्षों को प्रमुखता देती हैं।
जमुनिया — छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश
गोंड समुदाय के कुछ परिवार नवरात्र में रावेन पेन की पूजा करते हैं। स्थानीय आदिवासी परम्परा में रावेन पेन को ग्राम-रक्षक देवता भी माना जाता है। उसे सीधे रामायण के रावण के समान मान लेना निर्विवाद निष्कर्ष नहीं है।
२. नेपाल में रावण से सम्बन्धित परम्पराएँ
नेपाल में रावण से जुड़ी धार्मिक लोककथाएँ मिलती हैं, लेकिन भारत के बिसरख या मंदसौर जैसी व्यापक रूप से प्रलेखित रावण-पूजा की परम्परा वाला कोई प्रमुख नगर उपलब्ध प्रमाणों से निश्चित नहीं होता।
टीका भैरव क्षेत्र — काठमांडू घाटी, नेपाल
इस क्षेत्र से जुड़ी एक स्थानीय कथा में रावण के हिमालय से लौटते समय वहाँ रुकने और भगवान शिव से प्राप्त जलपात्र की कथा सुनाई जाती है। बाद में उस स्थान का सम्बन्ध भैरव-पूजा से जोड़ा जाता है।
यह रावण से जुड़ी स्थानीय कथा है, रावण की नियमित पूजा अथवा दशहरे पर रावण-दहन निषिद्ध होने का प्रमाण नहीं।
नेपाल की दशैं परम्परा
नेपाल में दशैं के अवसर पर देवी दुर्गा की पूजा प्रमुख है। रामायण-परम्परा में रावण पर श्रीराम की विजय का भी धार्मिक महत्त्व है।
३. रावण की विद्वत्ता, ज्योतिष, तन्त्र और शिवभक्ति
रावण के प्रति सम्मान का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसका परम्परागत विद्वत्ता-पक्ष है।
१. शिवभक्ति: शिवताण्डवस्तोत्र की रचना परम्परागत रूप से रावण से सम्बद्ध मानी जाती है।
२. ज्योतिष: रावणसंहिता नाम से ज्योतिष-सम्बन्धी ग्रन्थ प्रचलित हैं। किन्तु उनकी ऐतिहासिक रचनाकारिता को स्वतंत्र पाण्डुलिपि-प्रमाण के आधार पर परखना चाहिए।
३. तन्त्र और मन्त्र: रावण को तन्त्र-मन्त्र तथा विभिन्न विद्याओं का ज्ञाता मानने वाली परम्पराएँ लोकप्रिय धार्मिक साहित्य में मिलती हैं।
४. पूर्वज-परम्परा: कुछ गोंड समुदाय रावण अथवा रावेन पेन को अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक परम्परा से जोड़
२. इससे भी अधिक रोचक शोध-बिंदु
१. रावण की पूजा और रावण-दहन न करना — दोनों एक ही बात नहीं हैं।
किसी स्थान पर रावण की पूजा होने से यह सिद्ध नहीं होता कि वहाँ रावण-दहन पूर्णतः प्रतिबंधित है। मंदसौर की परंपरा पर प्रकाशित रिपोर्टों में पूजा और दहन की प्रथाओं के बारे में अलग-अलग विवरण मिले हैं। इसलिए किसी गाँव या नगर के विषय में निष्कर्ष निकालते समय वहाँ के समुदाय, स्थान और विशिष्ट रीति का उल्लेख करना चाहिए।
२. रावण को पूर्वज मानने वाली जनजातीय परंपराएँ।
मध्य भारत के कुछ गोंड समुदायों से संबंधित विवरणों में रावण, मंदोदरी और मेघनाद के प्रति श्रद्धा तथा रावण को पूर्वज या प्राचीन शासक मानने की परंपरा का उल्लेख है। इसे सभी गोंड समुदायों की एकसमान मान्यता नहीं समझना चाहिए। इस विषय पर शोध करते समय समुदाय की अपनी मौखिक परंपरा और बाहरी लेखकों के वर्णन को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
३. रावण और शिवभक्ति का संबंध।
रावण को शिवभक्त मानने की परंपरा उसके व्यक्तित्व की एक प्रमुख धार्मिक छवि है। शिवताण्डवस्तोत्र की रचना भी परंपरागत रूप से रावण से जोड़ी जाती है। किंतु किसी ग्रंथ की परंपरागत रचनाकार-मान्यता और उसका ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित लेखक होना दो अलग प्रश्न हैं। प्राचीन पांडुलिपियों, पाठ-परंपरा और ग्रंथ-साक्ष्य के बिना निश्चित ऐतिहासिक दावा करना उचित नहीं होगा।
४. रावण-संहिता और ज्योतिष।
रावण-संहिता नाम से ज्योतिष एवं तांत्रिक विषयों से संबंधित ग्रंथ प्रचलित हैं। परंतु केवल रावण के नाम से ग्रंथ का प्रचलित होना यह प्रमाणित नहीं करता कि वर्तमान में उपलब्ध प्रत्येक पाठ स्वयं रावण द्वारा रचा गया था। किसी गंभीर शोध में ग्रंथ का संस्करण, संपादक, पांडुलिपि-साक्ष्य और प्रकाशन-इतिहास अवश्य दर्ज होना चाहिए।
३. शास्त्रीय निष्कर्ष में सबसे महत्त्वपूर्ण भेद
- रामायण का कथानक: रावण का
सीता-हरण, राम से युद्ध और वध।
- भक्तिपरक परंपरा: रावण का
शिवभक्त एवं विद्वान रूप।
- लोकपरंपरा: किसी स्थान पर
रावण को पुत्र, दामाद या पूर्वज मानना।
- ऐतिहासिक प्रमाण: अभिलेख,
पुरातात्त्विक साक्ष्य, पांडुलिपियाँ और दिनांकित दस्तावेज।
४. शास्त्रीय दृष्टि से निष्कर्ष
· देवीमाहात्म्य, मार्कण्डेय पुराण: महिषासुर-वध और देवी की विजय का प्रमुख धार्मिक आधार।
· वाल्मीकि रामायण: श्रीराम और रावण के युद्ध का प्रमुख ग्रन्थीय आधार।
· मैसूर की ऐतिहासिक परम्परा: देवी चामुण्डेश्वरी की आराधना और वाडियार राजवंश द्वारा विकसित दशहरा समारोह।
इन ग्रन्थों में विजय की अलग-अलग कथाएँ हैं। मैसूर में रावण-दहन न होने का कोई सार्वदेशिक शास्त्रीय निषेध इनसे स्वतः सिद्ध नहीं होता।
अन्तिम निष्कर्ष: मैसूर में रावण-दहन की अनुपस्थिति को रावण के प्रति विशेष श्रद्धा या रावण-वध के निषेध का प्रमाण मानना उचित नहीं। इसका सबसे ठोस स्पष्टीकरण मैसूर की विशिष्ट देवी-केन्द्रित दशहरा परम्परा है।
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- वाल्मीकि रामायण —
श्रीराम और रावण के युद्ध का वर्णन।
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-Gem suggestion -3pages Extensive.
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