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शंख( ध्वनि,जल) लक्ष्मी स्थिर वास्तु प्रभाव

                                                                                                   


Pt V.K.tiwari.Dr.S.Tiwari & Dr.R.dIIXIT-9424446706P;BNAGALORE

शंख( ध्वनि,जल) लक्ष्मी स्थिर वास्तु प्रभाव

🔱 Śaṅkha Dhwani — The Sacred Conch Sound that Pleases Goddess Lakṣmī— विष्णु ,माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने वाली दिव्य ध्वनि

शंख ध्वनिमाँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने वाली दिव्य ध्वनि


🌼 शंख की उत्पत्ति | Origin of the Conch (Śaṅkha)

*
पुराणों के अनुसार शंख की उत्पत्ति दानव शंखचूड़ की अस्थियों (हड्डियों) से हुई मानी जाती है।
पूर्वकाल में गोलोक के सुदामा गोप, श्रीराधा जी के शाप से शंखचूड़ दानव बने।

*
According to Purāṇic tradition, the sacred conch originated from the bones of the demon Śaṅkhacūḍa.
In ancient times, Sudāmā-gopa of Goloka became the demon Śaṅkhacūḍa due to a curse from Śrī Rādhā.

शास्त्र प्रमाण | Scriptural Proof :

अस्थिभिः शङ्खचूडस्य शंखजातिर्बभूव हि।
The race of conches manifested from the bones of Śaṅkhacūḍa.


🌼 शंखभगवान विष्णु का अधिष्ठान | Conch as the Abode of Lord Viṣṇu

*
शंख भगवान श्रीविष्णु का अधिष्ठान माना गया है। जहाँ शंख स्थापित रहता है, वहाँ स्वयं श्रीहरि का निवास होता है।

*
The conch is regarded as the sacred seat of Lord Viṣṇu. Wherever a conch is present, Lord Hari is believed to reside.


🌼 शंखजल का महत्त्व | Sanctity of Conch Water

*
शंख में रखा जल तीर्थजल के समान पवित्र माना गया है और देवताओं को अत्यंत प्रिय है (भगवान शंकर को छोड़कर)

*
Water kept in a conch is considered equal to holy pilgrimage water and highly pleasing to the deities (except Lord Śiva).

शास्त्र प्रमाण | Scriptural Verse :

प्रशस्तं शंखतोयं देवानां प्रीतिदं परम्
तीर्थतोयस्वरूपं पवित्रं शम्भुना विना
शंखशब्दो भवेद्यत्र तत्र लक्ष्मीः सुसंस्थिरा

*
Conch water is supremely auspicious and dear to the gods; it is equal to sacred tīrtha water and pure (except for Śambhu). Wherever the sound of the conch resounds, Goddess Lakṣmī remains firmly established.


🌼 शंख ध्वनि और लक्ष्मी स्थिरता | Conch Sound Invites Lakṣmī

*
जहाँ शंख ध्वनि होती है, वहाँ माँ लक्ष्मी स्थिर रूप से निवास करती हैं तथा अमंगल दूर हो जाता है।

*
Where the sacred sound of the conch is heard, Goddess Lakṣmī stays permanently, and all inauspiciousness departs.

शास्त्र प्रमाण | Scriptural Verse :

शङ्खो हरेरधिष्ठानं यत्र शंखस्ततो हरिः
तत्रैव वसते लक्ष्मीर्दूरीभूतममङ्गलम्

*
The conch is the seat of Hari; where the conch exists, Lord Hari resides. There Lakṣmī also dwells and all misfortune disappears.


🔱 शंखध्वनिश्रीमहालक्ष्मीप्रसादिनी दिव्यनाद


🌼 शंखोत्पत्ति

पुराणोक्त परम्परा के अनुसार शंख की उत्पत्ति दैत्यराज शंखचूड़ की अस्थियों से मानी गई है। पूर्वकाल में गोलोकवासी सुदामा गोप, श्रीराधाजी के शापवश शंखचूड़ दानव रूप में अवतीर्ण हुए।

अस्थिभिः शङ्खचूडस्य शंखजातिर्बभूव हि।

अर्थात्शंखचूड़ की अस्थियों से ही शंखजाति की उत्पत्ति हुई।


🌼 शंखश्रीविष्णोः अधिष्ठानम्

शास्त्रों में शंख को भगवान श्रीविष्णु का अधिष्ठान कहा गया है। जहाँ शंख प्रतिष्ठित रहता है, वहाँ स्वयं श्रीहरि का दिव्य निवास माना जाता है।


🌼 शंखतोय की पवित्रता

शंख में स्थित जल तीर्थजलस्वरूप, परम पवित्र तथा देवताओं को अत्यन्त प्रिय कहा गया है (भगवान शम्भु को छोड़कर)

प्रशस्तं शंख तोयं देवानां प्रीतिदं परम्
तीर्थ तोय स्वरूपं पवित्रं शम्भुना विना
शंख शब्दो भवेद्यत्र तत्र लक्ष्मीः सुसंस्थिरा

*शंखजल देवताओं को परम प्रिय तथा तीर्थजल के समान पवित्र है; और जहाँ शंखध्वनि होती है, वहाँ महालक्ष्मी स्थिररूप से निवास करती हैं।


🌼 शंखध्वनि एवं लक्ष्मीस्थैर्य

जहाँ शंखनाद होता है, वहाँ श्रीहरि एवं भगवती लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है तथा समस्त अमंगल स्वतः नष्ट हो जाता है।

शङ्खो हरेरधिष्ठानं यत्र शंखस्ततो हरिः
तत्रैव वसते लक्ष्मीर्दूरीभूतम मङ्गलम्


🔱 शंखविधान -

(पुराण, तन्त्र, धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु प्रमाण)


🌼. शंख रखने की दिशा एवं स्थितिशास्त्र प्रमाण

निर्णयसिन्धु एवं आगममत :

ईशाने शंख संस्थापनं सर्वमङ्गल कारकम्

* : ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में शंख स्थापित करना सर्वमंगलकारी कहा गया है।

तन्त्रागम विधान :

ऊर्ध्व मुखं स्थितं शंखं पूजायां शुभदं स्मृतम्

*ऊपर की ओर मुख करके रखा हुआ शंख ही पूजा योग्य एवं शुभ फलदायक है।

नियम (प्रमाणानुसार) :

  • ईशान कोण में स्थापना
  • मुख ऊपर या पूर्वाभिमुख
  • उल्टा (अधोमुख) रखना निषिद्ध

🔱 शंखध्वनिउचित-अनुचित समय, दिशा, विधि एवं वास्तु-प्रभाव

(पुराण, तन्त्र, धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु आदि शास्त्र प्रमाण सहित)


🌼 . शंखध्वनि का उचित एवं अनुचित समय (शास्त्र प्रमाण)

धर्मसिन्धुनित्यकर्म प्रकरण :

संध्ययोर्द्वययोर्नित्यं शंखनादः प्रशस्यते

* : प्रातः एवं सायं संध्या में शंखध्वनि अत्यन्त प्रशस्त मानी गई है।

उचित समय :

  • प्रातः संध्या (सूर्योदय पूर्व/पश्चात)
  • सायं संध्या (सूर्यास्त समय)
  • आरती, पूजा, अभिषेक पूर्व

तन्त्रसार :

अकालध्वनितः शंखो दोषदः परिकीर्तितः

अनुचित समय :

  • मध्यरात्रि
  • शोककाल
  • श्राद्ध कर्म के मध्य
  • बिना पूजा कारण बार-बार

🌼 . शंख बजाते समय दिशाशास्त्रीय विधान

आगम एवं वैष्णव तन्त्र मत :

पूर्वाभिमुखो वा उत्तराभिमुखः शंखनादः शुभप्रदः

मुख करके शंख बजाएँ :

  • पूर्व दिशादेवशक्ति जागरण
  • उत्तर दिशालक्ष्मी एवं समृद्धि

दक्षिणाभिमुख शंखनाद सामान्य गृहस्थ हेतु वर्जित माना गया।


🌼 . शंख कितनी बार बजाना चाहिए

निर्णयसिन्धु :

त्रिवारं शंखनादं तु पूजाकाले विधीयते

*पूजा समय तीन बार शंखनाद विधान है।

1, 3 या 5 बारशुभ
अत्यधिक ध्वनिनिषिद्ध


🌼 . शंख बजाने से पूर्व एवं पश्चात मंत्र

पूर्व मंत्र (पाञ्चरात्र आगम):

त्वं पुरा सागरॊत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे
पूजितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते

पश्चात मंत्र :

शंखनादं महाघोरं पापनाशनकारणम्
विष्णुप्रीतिकरं नित्यं सर्वमंगलदायकम्


🌼 . शंख से तन्त्र-प्रयोग / टोना-टोटका (शास्त्रीय संदर्भ)

तन्त्रसार एवं रुद्रयामल :

शंखतोयेन प्रोक्षेण दुष्टदोषविनाशनम्

*शंखजल से छिड़काव करने पर दुष्ट प्रभाव एवं नकारात्मकता दूर होती है।

शंखजल से गृह शुद्धि
नवगृह प्रवेश शुद्धिकरण
दृष्टिदोष शमन


🌼 . शंख को किस वस्त्र में रखना चाहिए

आगम विधान :

पीतवस्त्रे स्थितः शंखः लक्ष्मीप्रद उदीरितः

पीला वस्त्रलक्ष्मीकारक
लाल वस्त्रपूजा उपयोग

काला वस्त्र निषिद्ध


🌼 . शंख पूजा विधिशास्त्रीय विधान

पद्मपुराण :

गन्धपुष्पाक्षतैः शंखं पूजयेद् विष्णुवत् सदा

पूजा क्रम :

1.     स्नान (जल से शुद्धि) चन्दन  ,तिलक, अक्षत अर्पण ,पुष्प अर्पण

2.     दीप-धूप ,मत्र जप शंखनाद


🌼 . वास्तु अनुसार घर में शंख की स्थापना

वास्तुशास्त्र एवं स्कन्दपुराण मत :

ईशाने शंखनिवासः सर्वदोषनिवारणः

स्थान :

  • ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) — सर्वोत्तम
  • पूजा गृह

लाभ :

  • नकारात्मक ऊर्जा शमन
  • मानसिक शान्ति
  • लक्ष्मी स्थिरता

🌼 . व्यावसायिक स्थल (Office / Shop) में शंख

विष्णुधर्मोत्तर पुराण :

शंखयुक्ते स्थले नित्यं धनागमनमिष्यते

उत्तर या उत्तर-पूर्व में रखें
प्रवेश के भीतर दाहिनी ओर

फल :

  • ग्राहकों की वृद्धि
  • आर्थिक प्रवाह सक्रिय
  • विवाद न्यून

🔱 शंखविज्ञानानुसार विवेचन (प्रमाण सहित)


🌼 . शंख की महिमाशास्त्रीय प्रमाण

शंख को वैष्णव धर्म में अत्यन्त पवित्र एवं दिव्य वस्तु माना गया है। यह भगवान श्रीविष्णु का आयुध एवं अधिष्ठान है।

शङ्खो हरेरधिष्ठानं यत्र शंखस्ततो हरिः
तत्रैव वसते लक्ष्मीर्दूरीभूतममङ्गलम्

* : जहाँ शंख रहता है वहाँ श्रीहरि एवं महालक्ष्मी निवास करती हैं तथा अमंगल दूर हो जाता है।


🌼 . शंखजल (Conch Water) का प्रभावशास्त्र प्रमाण

प्रशस्तं शंखतोयं देवानां प्रीतिदं परम्
तीर्थतोयस्वरूपं पवित्रं शम्भुना विना

शास्त्रीय मत :

  • शंख में रखा जल तीर्थजल के समान पवित्र माना गया है
  • देवपूजा, अभिषेक एवं शुद्धिकरण हेतु श्रेष्ठ
  • गृहदोष एवं नकारात्मकता शमनकारी

घर में शंखजल छिड़कने के प्रभाव :

  • वातावरण शुद्धि
  • सूक्ष्म अशुभ स्पन्दनों का नाश
  • मानसिक शान्ति वृद्धि
  • पूजा स्थान की ऊर्जा सक्रिय

🌼 . विज्ञान के अनुसार शंखध्वनि का प्रभाव

आधुनिक ध्वनि-विज्ञान (Acoustics) के अनुसार शंखध्वनि में बहु-आवृत्ति (multi-frequency vibration) उत्पन्न होती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से प्रभाव :

  • ध्वनि तरंगें वायु में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणुओं (bacteria) की वृद्धि को बाधित करती हैं
  • कम्पन (vibration) से वातावरण में resonance उत्पन्न होता है
  • फेफड़ों की क्षमता एवं श्वसन नियंत्रण बढ़ता है (deep exhalation effect)
  • parasympathetic nervous system सक्रिय होकर तनाव घटाता है

🌼. शंख कैसे वास्तुदोष दूर करता हैप्रमाण

तन्त्रागम :

नादस्पन्दनसम्भूतैः शंखध्वनिविभूतिभिः
दोषा भवन्ति नश्यन्ति वास्तुदोषसमुद्भवाः

*शंखध्वनि से उत्पन्न ध्वनि-कम्पन वास्तुदोषजनित अशुभ स्पन्दनों का नाश करते हैं।


🌼 . पुराण-तन्त्र ग्रंथों में शंख के लाभ

स्कन्दपुराण :

शंख ध्वनिं प्रकुर्वीत पाप नाशन कारणम्

*शंखध्वनि पाप एवं अशुभ का नाश करने वाली कही गई है।

पद्मपुराण :

यत्र शंखो गृहे नित्यं तत्र नित्यं हरिर्वसेत्

*जिस घर में शंख रहता है वहाँ भगवान हरि का निवास होता है।

तन्त्रसार :

नादेन शंखजातेन दुष्टशक्तिर्विनश्यति

*शंखनाद से दुष्ट एवं नकारात्मक शक्तियाँ नष्ट होती हैं।


🌼 . शंखध्वनिहानि एवं लाभ (शास्त्रीय विवेचन)

धर्मसिन्धु (नित्यकर्म प्रकरण) :

संध्याकाले विशेषेण शंखनादः प्रशस्यते

*संध्या समय किया गया शंखनाद विशेष शुभ माना गया है।

निषेध (तन्त्रमत) :

अकालध्वनितः शंखो दोषदः परिकीर्तितः

*अनुचित समय में शंख बजाना दोषकारक कहा गया है।


🌼 . मन एवं एकाग्रता पर प्रभावशास्त्रीय प्रमाण

नारदपाञ्चरात्र :

नादब्रह्ममयो शंखः चित्तैकाग्र्यप्रदायकः

*शंख नादब्रह्म स्वरूप होकर मन की एकाग्रता प्रदान करता है।

योगतन्त्र मत :

शंखनादेन मनोवृत्तिः शनैः शान्तिमुपैति।

*शंखध्वनि से मन की चंचल वृत्तियाँ शांत होती हैं।


🌼 . शरीर एवं प्राण पर प्रभावतन्त्र एवं आगम प्रमाण

गौतमीय तन्त्र :

दीर्घनिःश्वास संयुक्तः शंख नादः प्राणवर्धनः

*दीर्घ श्वास से किया गया शंखनाद प्राणशक्ति को बढ़ाने वाला है।

आगम शास्त्र :

नादस्पन्दनयोगेन देहे शक्तिप्रवर्धनम्

*ध्वनि कम्पन से शरीर की आन्तरिक शक्ति जाग्रत होती है।


🌼 . आर्थिक एवं गृहस्थ जीवन पर प्रभावपुराण प्रमाण

लक्ष्मी तन्त्र :

शंखशब्दे स्थितालक्ष्मीर्धनधान्यप्रवर्धिनी

*जहाँ शंख ध्वनि होती है वहाँ लक्ष्मी स्थिर होकर धन-धान्य की वृद्धि करती हैं।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण :

शंखयुक्ते गृहे नित्यं कलहो नोपजायते

*शंख युक्त घर में कलह उत्पन्न नहीं होता।

स्त्रीणां शंखध्वनिभिः शूद्राणां विशेषतः
भीता रूष्टा याति लक्ष्मीस्तत्स्थलादन्यदेशतः

⚠️ शास्त्रीय विशेष उल्लेख

कुछ ग्रंथों में वर्णित है कि स्त्रियों तथा विशेषतः शूद्रों द्वारा की गई शंखध्वनि से लक्ष्मीजी अप्रसन्न होकर उस स्थान का परित्याग कर देती हैं।

Sacred Essence / सार भाव
शंखध्वनि केवल ध्वनि नहीं, बल्कि श्रीहरि और महालक्ष्मी की दिव्य उपस्थिति का आह्वान मानी गई है।
The conch sound is not merely sound; it invokes Shri Hari and Maha Lakshmi, making the space sacred, auspicious, and prosperous.


समस्त बिन्दु केवल शास्त्र प्रमाणाधारितपुराण, तन्त्र, धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु मतानुसार प्रस्तुत।

*******************ENGLISH***************************************

🔱 Shankh Dhvani — Divine Conch Sound /

शंखध्वनिश्रीमहालक्ष्मी प्रसादिनी दिव्यनाद

2️ Shankh Origin / शंखोत्पत्ति

Sanskrit Quote:
अस्थिभिः शङ्खचूडस्य शंखजातिर्बभूव हि।

*
शंखचूड़ की अस्थियों से शंखजाति का निर्माण हुआ। पूर्वकाल में गोलोकवासी सुदामा गोप, श्रीराधाजी के शापवश शंखचूड़ दानव रूप में अवतरित हुए।

*
The conch originated from the bones of demon king Shankhchood. In ancient times, Golok resident Sudama Gop, under Shri Radha’s curse, incarnated as Shankhchood demon.


3️ Shankh — Abode of Vishnu / शंखश्रीविष्णु का अधिष्ठान

Sanskrit:
शङ्खो हरेरधिष्ठानं यत्र शंखस्ततो हरिः
तत्रैव वसते लक्ष्मीर्दूरीभूतममङ्गलम्

*
जहाँ शंख प्रतिष्ठित रहता है, वहाँ स्वयं श्रीहरि एवं महालक्ष्मी का निवास माना जाता है।

*
Where the conch is placed, Shri Hari and Goddess Lakshmi reside, removing all inauspiciousness.


4️ Purity of Conch Water / शंखतोय की पवित्रता

Sanskrit:
प्रशस्तं शंखतोयं देवानां प्रीतिदं परम्
तीर्थतोयस्वरूपं पवित्रं शम्भुना विना

*
शंख में रखा जल तीर्थजल के समान पवित्र एवं देवताओं को प्रिय है।

*
The water in the conch is as sacred as holy waters and highly revered by the gods.

Effects:

  • Home purification
  • Rituals & abhishek
  • Removes negative energy

5️ Proper vs Improper Time / शंखध्वनि का समय

Proper /

  • Morning (Sunrise) & Evening (Sunset)
  • Before puja, aarti, abhishek

Improper /

  • Midnight
  • During mourning
  • During Shraddha rituals
  • Random or excessive blowing

6️ Direction to Blow /

East-facing: Awakens divine energy
North-facing: Attracts Lakshmi & prosperity
South-facing: Prohibited for householders


7️ Number of Blows /

  • 1, 3, 5 times — auspicious
  • Excessive blowing — inauspicious

8️ Mantras Before & After /

Before / पूर्व मंत्र:
त्वं पुरा सागरॊत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे
पूजितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते

After / पश्चात मंत्र:
शंखनादं महाघोरं पापनाशनकारणम्
विष्णुप्रीतिकरं नित्यं सर्वमंगलदायकम्


9️ Tantra Uses /

  • Sprinkle conch water to remove evil influences
  • Purifies home & new house entries
  • Neutralizes Vastu defects

🔹 Shankh Cloth /

  • Yellow — attracts Lakshmi
  • Red — puja use
  • Black — prohibited

🔹 Puja Procedure /

1.     Wash conch

2.     Apply sandalwood tilak

3.     Offer akshat

4.     Offer flowers

5.     Light lamp & incense

6.     Recite mantras

7.     Sound the conch


🔹 Home Vastu / North-East (Ishan corner) best

  • Benefits: Removes negative energy, mental peace, stabilizes Lakshmi

🔹 Business Placement /North or North-East, right side of entrance

  • Increases customers & prosperity, reduces disputes

🔹 Scientific Effects / Multi-frequency vibrations purify air

  • Destroys bacteria, improves respiration
  • Resonance activates energy in space
  • Enhances focus & reduces stress

🔹 Mind, Body & Prosperity Effects Mental calmness & focus

  • Improves vitality & breathing
  • Stabilizes household harmony
  • Promotes wealth & prosperity
  • Removes Vastu defects

🔹 Complete References / Purana: Padma Purana, Skanda Purana

  • Tantra: Rudrayamal, Tantrasaar
  • Dharma Sindhu & Nirnaya Sindhu

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28 सितंबर गणेश विसर्जन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए जिस प्रकार उसका प्रारंभ किया जाता है समापन भी किया जाना उद्देश्य होता है। गणेश जी की स्थापना पार्थिव पार्थिव (मिटटीएवं जल   तत्व निर्मित)     स्वरूप में करने के पश्चात दिनांक 23 को उस पार्थिव स्वरूप का विसर्जन किया जाना ज्योतिष के आधार पर सुयोग है। किसी कार्य करने के पश्चात उसके परिणाम शुभ , सुखद , हर्षद एवं सफलता प्रदायक हो यह एक सामान्य उद्देश्य होता है।किसी भी प्रकार की बाधा व्यवधान या अनिश्ट ना हो। ज्योतिष के आधार पर लग्न को श्रेष्ठता प्रदान की गई है | होरा मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना गया है।     गणेश जी का संबंध बुधवार दिन अथवा बुद्धि से ज्ञान से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों प्रतियोगियों एवं बुद्धि एवं ज्ञान में रूचि है , ऐसे लोगों के लिए बुध की होरा श्रेष्ठ होगी तथा उच्च पद , गरिमा , गुरुता , बड़प्पन , ज्ञान , निर्णय दक्षता में वृद्धि के लिए गुरु की हो रहा श्रेष्ठ होगी | इसके साथ ही जल में विसर्जन कार्य होता है अतः चंद्र की होरा सामा...

श्राद्ध रहस्य - श्राद्ध क्यों करे ? कब श्राद्ध नहीं करे ? पिंड रहित श्राद्ध ?

श्राद्ध रहस्य - क्यों करे , न करे ? पिंड रहित , महालय ? किसी भी कर्म का पूर्ण फल विधि सहित करने पर ही मिलता है | * श्राद्ध में गाय का ही दूध प्रयोग करे |( विष्णु पुराण ) | श्राद्ध भोजन में तिल अवश्य प्रयोग करे | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि - श्राद्ध अपरिहार्य - अश्वनी माह के कृष्ण पक्ष तक पितर अत्यंत अपेक्षा से कष्ट की   स्थिति में जल , तिल की अपनी संतान से , प्रतिदिन आशा रखते है | अन्यथा दुखी होकर श्राप देकर चले जाते हैं | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि इसको नहीं करने से पीढ़ी दर पीढ़ी संतान मंद बुद्धि , दिव्यांगता .मानसिक रोग होते है | हेमाद्रि ग्रन्थ - आषाढ़ माह पूर्णिमा से /कन्या के सूर्य के समय एक दिन भी श्राद्ध कोई करता है तो , पितर एक वर्ष तक संतुष्ट/तृप्त रहते हैं | ( भद्र कृष्ण दूज को भरणी नक्षत्र , तृतीया को कृत्तिका नक्षत्र   या षष्ठी को रोहणी नक्षत्र या व्यतिपात मंगलवार को हो ये पिता को प्रिय योग है इस दिन व्रत , सूर्य पूजा , गौ दान गौ -दान श्रेष्ठ | - श्राद्ध का गया तुल्य फल- पितृपक्ष में मघा सूर्य की अष्टमी य त्रयोदशी को मघा नक्षत्र पर चंद्र ...

गणेश भगवान - पूजा मंत्र, आरती एवं विधि

सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

विवाह बाधा और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा पूजा

विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । 10 oct - 18 oct विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन कर...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...