श्लोक (संक्षेप प्रचलित मंत्र):
“इदं वस्त्रम् मया धृतं दीर्घायुः सुखवर्धनम् ।
शुभं करोतु मे नित्यं लक्ष्मीवर्धनमेव च ॥”
अर्थ (Hindi): यह वस्त्र मुझे दीर्घायु, सुख और नित्य शुभता दे, लक्ष्मी की वृद्धि करे।
Meaning (English): May this garment grant me long life, happiness,
auspiciousness, and increase prosperity.
2) आभूषण / कंगन (Jewellery / Bangle) – श्लोक (धारण-विधान)
श्लोक:
“सौभाग्यं संततिं लक्ष्मीं आरोग्यं दीर्घमायुषः ।
देहि मे देवि भूषणे धारणात् शुभदर्शनम् ॥”
अर्थ (Hindi): हे देवि! इस आभूषण के धारण से सौभाग्य, संतान, लक्ष्मी, आरोग्य और दीर्घायु प्रदान हों।
Meaning (English): O Goddess, by wearing this ornament may I receive
fortune, progeny, prosperity, health, and long life.
🌼 शुक्रवार (शुक्र) 📛 "शुक्रवार + प्रतिपदा + पुष्य" = नया वस्त्र, नया आभूषण, नया वाहन, नया घर या पूजा के वस्त्र प्रयोग वर्जित।
⛔ यह एक विरोध योग है जो शुभ कार्यों के लिए वर्जनीय समय बनाता है।
✔ शुभ — सफेद, गुलाबी, क्रीम
✖ अशुभ — काला
🌼 शनिवार (शनि)
✔ शुभ — नीला, काला, गहरा धूसर
✖ अशुभ — लाल, पीला
नक्षत्र अनुसार वस्त्र/आभूषण धारण — प्रमाण (Bhadrabahu Saṃhita, 27वां अध्याय)
· 🌑 1. ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रभाव
🔻 तामसिक, तीव्र, विद्वेषात्मक, ग्रहणकारी नक्षत्र
📖 भद्रबाहु संहिता:
“ज्येष्ठायां च ग्रहैः
युक्ते वस्त्रभूषणधारणं न कारयेत्। अशुभं भवति।"
(ज्येष्ठा में ग्रह विशेषतः चंद्रमा स्थित हो तो नए वस्त्र, गहने, चूड़ियाँ पहनना
वर्ज्य।)
📖 ज्योतिष सार:
"ज्येष्ठा
क्रूरकर्मणि, रहस्यकर्म, यंत्रतंत्र प्रयोग योग्य।"
❌ दैनिक,
पारिवारिक, सौंदर्य अथवा सार्वजनिक कार्यों हेतु वर्जित।
📖 मुहूर्त चिंतामणि:
"ज्येष्ठा नक्षत्रे नववस्त्राभरणादीनां प्रयोगे न युक्तं। स्त्रीक्लेश, दोष संभवः।"
📖 पाराशर होरा शास्त्र:
"ग्रहयुतो ज्येष्ठा नक्षत्रे चंद्रे, स्त्रीनाश, भावनाश।"
🌘 2. चंद्रमा वृश्चिक
(नीच)
राशि में
🔻 नीचस्थ चंद्र
= मानसिक दुर्बलता,
मोह,
भ्रम
📖 भद्रबाहु संहिता:
"नीचचंद्रे सौंदर्यकार्यं वर्जयेत्।"
(सौंदर्य-सज्जा कार्य जैसे वस्त्र-गहनों का प्रयोग वर्ज्य।)
📖 भारतीय ज्योतिष सिद्धांत:
“चंद्रमा यदि नीचस्थ हो तो सौम्य कार्य रुक जाएं; विशेषतः सोमवार को।”
🌗 3. दशमी
/ एकादशी संधिकाल
🔶 दशमी
(11:41 तक)
– मध्यम
🔷 एकादशी
(11:42 से)
– उत्तम, विशेषतः व्रत, जप आदि के लिए
📖 मुहूर्त चिंतामणि:
"एकादश्यां वस्त्रधारणं यद्यपि शुभं, तथापि नक्षत्रदोषे निषेधः।"
(तिथि शुभ हो, परंतु यदि नक्षत्र दोषयुक्त हो, तो निषेध रहता है।)
🌕 4. वार – सोमवार (चंद्रवार)
📖 मुहूर्त चिंतामणि:
"सोमवारे चंद्रे शुभे वस्त्रधारणं शुभदं।"
📖 भद्रबाहु संहिता:
"सोमवार सौम्यकार्ये, सौंदर्य-परिधेय-अभूषण कर्मे।"
👉 लेकिन यहाँ चंद्रमा नीचस्थ व अशुभ नक्षत्र में है
– अतः वार का शुभत्व निष्प्रभावी हो जाता है।
🧾 🔚 निष्कर्ष (संयुक्त प्रभाव):
|
घटक |
प्रभाव |
|
ज्येष्ठा नक्षत्र |
❌ अशुभ – तामसिक, विद्वेष कारक |
|
वृश्चिक चंद्र |
❌ अशुभ – नीचस्थ, मानसिक क्षति |
|
दशमी/एकादशी |
⚠️ मध्यम-शुभ (एकादशी शुभ, पर
संधिकाल दोष) |
|
सोमवार |
✅ शुभ (पर नीच चंद्र से निष्फल) |
✅ यदि अत्यावश्यक हो, तो उपाय: वस्त्र/गहनों को दाहिने हाथ में लेकर दक्षिण की
ओर मुख करके धारण करें।
🔸 वस्त्र या आभूषण को पहले शंख-गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कराएँ।
🔸 ताम्रपत्र पर रखें और 5 बार “ॐ दुं दुर्गायै नमः” जपें।
🔸 फिर “ॐ चन्द्राय नमः” का 11 बार उच्चारण करें।
🔸 अंत में वस्त्र/गहनों को दाहिने हाथ में लेकर दक्षिण की ओर मुख करके धारण
करें।
वस्त्र-आभूषण धारण करते समय दिशा सिद्धांत — पूर्व एवं दक्षिण का प्रभाव (शास्त्रीय प्रमाण सहित)
🌼 1. पूर्व दिशा — सर्वश्रेष्ठ (देव दिशा)
मनुस्मृति (आचाराध्याय)
पूर्वाभिमुखो देवकर्माणि कुर्यात्।
अर्थ — देवकार्य एवं शुभ कर्म पूर्वमुख होकर करना चाहिए।
➡ वस्त्र, आभूषण, रत्न, यज्ञोपवीत, नवीन धारण आदि शुभ आरम्भ पूर्व दिशा में श्रेष्ठ माने गये हैं।
फल
• प्रतिष्ठा वृद्धि
• शुभारम्भ सफलता
• तेज एवं मान-सम्मान
• सामाजिक स्वीकृति
🌼 2. दक्षिण दिशा — कर्मफल एवं शांति कर्म
गरुड़ पुराण
दक्षिणा पितृदिक् प्रोक्ता कर्मफलप्रदायिनी।
अर्थ — दक्षिण दिशा कर्मफल एवं पितृ सम्बन्धी प्रभाव देने वाली है।
➡ दोषशांति, उपाय, ग्रहपीड़ा निवारण हेतु धारण दक्षिणमुख होकर किया जाता है।
फल
• बाधा शमन
• ऋण/कर्म शांति
• संकट नियंत्रण
• स्थिर परिणाम
🌼 3. उत्तर दिशा — वृद्धि एवं धन प्रभाव
वास्तु शास्त्र सिद्धांत
उत्तरं कुबेरदिक् प्रोक्ता धनधान्यविवर्धिनी।
अर्थ — उत्तर दिशा कुबेर की दिशा है, धन वृद्धि करती है।
फल
• आर्थिक लाभ
• आभूषण धारण से धन स्थिरता
• व्यवसायिक उन्नति
🌼 4. पश्चिम दिशा — सामान्य / विलम्बकारक
मत्स्य पुराण (दिशा फल सिद्धांत)
पश्चिमाभिमुखं कर्म विलम्बफलदं स्मृतम्।
अर्थ — पश्चिममुख कर्म में परिणाम देर से प्राप्त होते हैं।
फल
• परिणाम में देरी
• प्रभाव कम
• औपचारिक धारण
🌼 5. धारण के समय हाथ का नियम
गृह्यसूत्र सिद्धांत
दक्षिणहस्तेन शुभं कर्म।
अर्थ — शुभ कर्म दाहिने हाथ से करना चाहिए।
🌼 संक्षिप्त निर्णय नियम (Classical Practical Rule)
• पूर्वमुख → सर्वश्रेष्ठ शुभ धारण (Best)
• दक्षिणमुख → उपाय / दोष शांति धारण
• उत्तरमुख → धन एवं आभूषण लाभ हेतु अच्छा
• पश्चिममुख → आवश्यक हो तो ही
➡ इसलिए कहा जाता है —
शुभ धारण → पूर्वमुख
उपाय धारण → दक्षिणमुख
(आचार, पुराण एवं वास्तु दिशा सिद्धांतों पर आधारित)।
1. 🧘♀️ स्थिति:
o
शांतचित्त बैठकर पहनें (avoid haste or anger)
o
Sit calmly; never while walking or in emotional
disturbance.
2. 🧭 दिशा (Direction):
o
पूर्व या उत्तरमुखी होकर वस्त्र/आभूषण पहनें
o
Face East or North while adorning.
3.
📿 मंत्र
उच्चारण (Mantras to Chant While Wearing):
🪔 वस्त्र पहनते
समय:
"ॐ वाग्देव्यै च विद्महे, क्लेशनाशिन्यै
धीमहि, तन्नो वस्त्रः प्रचोदयात्॥"
(वाणी, शील और तेज प्राप्त करने हेतु)
🪔 चूड़ी/कंकण पहनते समय:
"ॐ शुभाङ्गि सुरूपे,
सुखदा च कन्यके।
मम सौभाग्यसिद्ध्यर्थं, कङ्कणं धारयाम्यहम्॥"
🪔 गहने (कर्णफूल, हार, नथ) पहनते समय:
"ॐ श्रीं क्लीं
सौंदर्यायै नमः"
(सौंदर्य व लक्ष्मी वृद्धि हेतु)
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