सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अस्थि-विसर्जन — वार, तिथि एवं नियम-13 दिनों

 

अस्थि-विसर्जनवार, तिथि एवं नियम (शास्त्रीय प्रमाण सहित)


बुधवारअस्थि-विसर्जन हेतु उचित (प्रमाण)

धर्मसिन्धु (पितृकर्म प्रकरण)
सौम्यवासरेषु पितृकर्म प्रशस्यते।

सौम्य वार: सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार
बुधवार पितृकर्म हेतु शुभ एवं प्रशस्त।


-अस्थि को अस्थायी रूप से रखनाशास्त्रीय विधि

गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प
अस्थीनि शुद्धपात्रे स्थापयेत् यावत् तीर्थगमनम्।

अर्थ: तीर्थ या विसर्जन तक अस्थियों को शुद्ध पात्र में सुरक्षित रखना चाहिए।


वृक्ष पर टांगना (पीपल आदि) — प्रमाण

गरुड़ पुराण (प्रेतकल्प परंपरागत व्याख्या)
अश्वत्थमूले स्थितं तोयं पितृणां तृप्तिदायकम्।

अश्वत्थ (पीपल) पितृसंबंधी वृक्ष माना गया।

धर्मशास्त्रीय व्यवहार नियम:
अस्थि को मिट्टी या ताम्र पात्र में रखें।
लाल/सफेद वस्त्र से बांधें।
भूमि से ऊँचाई पर, शुद्ध स्थान में रखें।
पीपल या वट वृक्ष पर अस्थायी रूप से लटकाना परंपरागत रूप से स्वीकार।

उद्देश्य: विसर्जन तक पवित्र एवं सुरक्षित संरक्षण।

****************************************************************************

शीघ्र अस्थि-विसर्जन का नियमप्रमाण

गरुड़ पुराण
दशाहाभ्यन्तरे कार्यमस्थीनां जलनिक्षेपणम्।

अर्थ: दस दिन के भीतर अस्थि विसर्जन करना श्रेष्ठ बताया गया है।

मृत्यु के बाद यथाशीघ्र (सामान्यतः 3, 7, 9 या 10 दिन के भीतर) विसर्जन श्रेष्ठ।
सूर्योदय से मध्याह्न के बीच समय उत्तम।
शुद्ध भावना और विधि, मुहूर्त से अधिक महत्वपूर्ण मानी गई है (गरुड़ पुराण मत)

अस्थि विसर्जनगुरुवार को उचित या नहीं (शास्त्रीय मत)

1. गुरुवार को अस्थि-विसर्जनप्रमाण

गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प
अस्थीनि गङ्गतोये तु निक्षिपेत् श्रद्धयान्वितः
पितॄणां तृप्तिर् भवति पापक्षयकरं परम्

अर्थ: श्रद्धा से जल में अस्थि विसर्जन करने से पितरों की तृप्ति होती हैश्लोक में किसी वार का निषेध नहीं दिया गया।

धर्मसिन्धु (अन्त्येष्टि प्रकरण)
अस्थिसञ्चयनं विसर्जनं शीघ्रमेव विधीयते।

अर्थ: अस्थि संग्रह और विसर्जन शीघ्र करना चाहिए; वार-निषेध नहीं बताया गया।

निष्कर्ष (प्रमाणाधारित): गुरुवार सहित किसी भी दिन किया जा सकता है, अतः गुरुवार शास्त्रसम्मत। गुरुवार (बृहस्पतिवार) — उचित माना गया है।
धर्म, पितृकर्म एवं संस्कार कार्यों के लिए गुरुवार शुभ माना गया है।

प्रमाण (गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प):
अस्थीनां जलसमर्पणं पितृणां तृप्तिकारकम्।
अर्थअस्थि का जल में विसर्जन पितरों को तृप्ति देने वाला है; इसमें वार बाधक नहीं, शुद्ध भाव मुख्य है।अस्थि-विसर्जन के शुभ दिनप्रमाण

निर्णयसिन्धु / धर्मशास्त्रीय परंपरा
सौम्य वार पितृकर्म हेतु अनुकूल

सोमवार
बुधवार
गुरुवार
शुक्रवार

(शांत ग्रहों के दिनपितृ तृप्तिकर)

शनिवार को अस्थि-विसर्जनशास्त्रीय प्रमाण

1. शनिवार का स्वभाव (प्रमाण)

मुहूर्त चिन्तामणि
मन्दवासरे कर्म विलम्बं दुःखदं स्मृतम्।

अर्थ: मन्द (शनिवार) के दिन किए कर्म में विलंब एवं कष्टफल की संभावना मानी गई है।


2. पितृकर्म में शनिवारप्रमाण

निर्णयसिन्धु (पितृकर्म निर्णय)
शनिवासरे पितृकार्यं प्रशस्तं विलम्बकारणात्।

अर्थ: शनिवार में पितृकर्म प्रशस्त नहीं माना गया क्योंकि यह विलंब और क्लेशकारक ग्रह का दिन है।

3. शनि का पितृ सम्बन्धप्रमाण

गरुड़ पुराण
शनिर्मन्दगतिः प्रोक्तः कर्मफलप्रदो नृणाम्।

अर्थ: शनि कर्मफल देने वाला एवं मंद गति ग्रह हैइसलिए शांति कर्म शीघ्रफल हेतु अन्य वार श्रेष्ठ माने गए।

4. शास्त्रीय निर्णय

शनिवारपूर्ण निषिद्ध नहीं
परंतुअप्रशस्त / विकल्प हो तो त्याज्य
अत्यावश्यक स्थिति में श्रद्धा से किया गया कर्म दोषरहित माना जाता है।

धर्मशास्त्र सिद्धांत
कालात्यये दोषः।
(
धार्मिक कर्तव्य में विलंब स्वयं दोष है)

 (परंपरागत मत -अशुभ या त्याज्य दिन-no शास्त्रीय प्रमाण )

रविवारतेज/अग्नि प्रधान
मंगलवारक्रूर ग्रह दिन
शनिवारविलंब एवं कष्टकारक माना गया

(यह पूर्ण निषेध नहीं, परंतु विकल्प हो तो त्याग बताया गया

 


2-❌ तिथि-वर्जन (किन तिथियों में करें) — प्रमाण

निर्णयसिन्धुश्राद्ध/पितृकर्म प्रकरण
रिक्तासु तिथिषु पितृकार्यं प्रशस्यते।

रिक्ता तिथियाँ:
चतुर्थी
नवमी
चतुर्दशी


इन तिथियों में पितृकर्म प्रशस्त नहीं माना गया।

जिन तिथियों में अस्थि विसर्जन नहीं करना चाहिए

शास्त्रीय परंपरा अनुसार निम्न तिथियाँ वर्जित मानी गई हैं

अमावस्या (कुछ परंपराओं में केवल श्राद्ध हेतु)• चतुर्दशीप्रतिपदानवमी

प्रमाणधर्मसिन्धु / निर्णयसिन्धु परंपरा
पितृकर्म में रिक्ता एवं उग्र तिथियों का त्याग बताया गया है।4. अमावस्या संबंधी नियमप्रमाण

धर्मसिन्धु
अमावस्या मुख्यतः श्राद्ध हेतु निर्दिष्ट; अन्य पितृकर्म आवश्यकता अनुसार किए जाते हैं।

इसलिए अमावस्या पूर्ण निषिद्ध नहीं, पर सामान्यतः श्राद्ध प्रधान दिन।शुभ तिथियाँ
द्वितीया
तृतीया
पंचमी
सप्तमी
दशमी
एकादशी
द्वादशी
त्रयोदशी


जिन लग्नों में नहीं करना चाहिए

मेष लग्नसिंह लग्नवृश्चिक लग्न

(अग्नि एवं तीक्ष्ण स्वभावपितृकर्म हेतु अशांत माने गए)


श्रेष्ठ लग्न (शास्त्रीय मान्यता)

वृषभकर्ककन्यातुलामीन

(शांत एवं सौम्य लग्नपितृकार्य अनुकूल)

5. नक्षत्र वर्जनप्रमाण

मुहूर्त चिन्तामणि (संस्काराध्याय परंपरा)
उग्रतीक्ष्णेषु नक्षत्रेषु शान्तिकर्म कारयेत्।

उग्र/तीक्ष्ण नक्षत्र:जिन नक्षत्रों में अस्थि विसर्जन वर्जित

कृत्तिकाभरणीआश्लेषामघाज्येष्ठामूल

(उग्र या तीक्ष्ण नक्षत्रशांति कर्म हेतु त्याज्य)

मुख्य शास्त्रीय सिद्धांतप्रमाण

धर्मशास्त्र सिद्धांत
कालात्यये दोषः।

अर्थ: धार्मिक कर्तव्य में अनावश्यक विलंब स्वयं दोष माना गया है।

इसलिए मुहूर्त से अधिक श्रद्धा और समय पर कर्म को महत्व दिया गया है।

*****************************************************

मृत्यु के बाद दाह-संस्कार नियम (शास्त्रीय प्रमाण)

गरुड़ पुराण — प्रेतकल्प
“मृतं शरीरं संसाध्य वह्नौ दाहं विधीयते।”
अर्थ — मृत्यु के बाद शरीर का अग्नि द्वारा दाह संस्कार करना विधि है।

याज्ञवल्क्य स्मृति (अन्त्येष्टि विधि)
“दाहसंस्कारकृत्येन देहस्य अन्त्यक्रिया स्मृता।”
अर्थ — दाह संस्कार ही शरीर की अंतिम क्रिया मानी गई।

अनुचित (वर्जित)
• दाह में अनावश्यक विलंब
• अशुद्ध अवस्था में संस्कार
• क्रोध, विलाप या कलह


अस्थि-विसर्जन नियम (प्रमाण सहित)

गरुड़ पुराण
“अस्थीनि जलमध्ये तु निक्षिपेत् श्रद्धयान्वितः।”
अर्थ — श्रद्धा से अस्थियों का जल में विसर्जन करना चाहिए।

गरुड़ पुराण
“दशाहाभ्यन्तरे कार्यमस्थीनां जलनिक्षेपणम्।”
अर्थ — दस दिन के भीतर विसर्जन श्रेष्ठ।

अनुचित
• रिक्ता तिथि में (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी)
• क्रूर वार में (मंगल, रवि — मुहूर्त ग्रंथ मत)
• अपवित्र स्थान या अशुद्ध पात्र


अगामी 13 दिन (त्रयोदशाह) के नियम — प्रमाण

गरुड़ पुराण — प्रेतकल्प
“दशाहं सूतकं ज्ञेयं प्रेतस्य परिकीर्तितम्।”
अर्थ — मृत्यु के बाद दस दिन सूतक माना गया।

मनुस्मृति (5.59 परंपरागत संदर्भ)
“दशाहेन शुद्ध्यन्ति ज्ञातयः।”
अर्थ — दस दिन बाद शुद्धि मानी जाती है।

धर्मसिन्धु
“एकादशे द्वादशे कर्म, त्रयोदशे शुद्धिरिष्यते।”
अर्थ — 11–12वें दिन कर्म, 13वें दिन शुद्धि एवं समापन।


13 दिनों में मुख्य कर्तव्य (संक्षेप)

• दैनिक पिण्डदान एवं तर्पण
• एकभुक्त या सात्त्विक आहार
• ब्रह्मचर्य एवं संयम
• देवपूजा सीमित, पितृकर्म प्रधान


13 दिनों में अनुचित आचरण (शास्त्रीय उल्लेख)

गरुड़ पुराण
“गीतवादित्रहासादि प्रेतकाले विवर्जयेत्।”

अर्थ — शोककाल में गीत, संगीत, उत्सव, हँसी-विलास त्याज्य।

धर्मशास्त्रीय नियम
• शुभ कार्य (विवाह, गृहप्रवेश आदि) वर्जित
• श्रृंगार, उत्सव, मांस-मद्य त्याज्य
• यात्रा एवं नया आरंभ टालना

मृत्यु के बाद तेहरवीं तक दैनिक कर्तव्य (संक्षिप्त — 1-1 पंक्ति)

दिन 1 — दाह संस्कार
• अग्नि संस्कार, तिल-जल अर्पण, “राम नाम” स्मरण।

दिन 2
• प्रातः तिलांजलि (जल + तिल) अर्पण, दीपक दक्षिण दिशा में।

दिन 3
• अस्थि संग्रह, शुद्ध पात्र में सुरक्षित रखना।

दिन 4
• पिण्डदान एवं तर्पण, पितृ नाम स्मरण।

दिन 5
• तिल-जल अर्पण, एक समय सात्त्विक भोजन।

दिन 6
• दीपक जलाना, गीता/गरुड़ पुराण श्रवण।

दिन 7
• पिण्डदान, कौवा/गाय/कुत्ते को अन्न दान।

दिन 8
• पितृ तर्पण, शांत जप (गायत्री या राम नाम)।

दिन 9
• जल अर्पण, ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न दान।

दिन 10 — दशगात्र
• विशेष पिण्डदान, शुद्धि कर्म प्रारंभ।

दिन 11 — एकादशाह
• पिण्डदान, ब्राह्मण भोजन, विष्णु स्मरण।

दिन 12 — द्वादशाह
• सपिण्डीकरण/पितृ सम्मिलन कर्म (परंपरा अनुसार)।

दिन 13 — तेहरवीं (शुद्धि)
• हवन/श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन, दान, परिवार शुद्धि।


पूजा एवं दीपक नियम (पूरे 13 दिन)

• प्रतिदिन दक्षिण दिशा में तिल तेल या घी का दीपक।
• तिल मिश्रित जल अर्पण।
• पितृ नाम लेकर “ॐ पितृभ्यो स्वधा”।
• घर में सादगी, उत्सव वर्जित।
• सात्त्विक भोजन, लहसुन-प्याज त्याग (परंपरा अनुसार)।
• देवपूजा सीमित, पितृकर्म प्रमुख।

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

श्राद्ध की गूढ़ बाते ,किसकी श्राद्ध कब करे

श्राद्ध क्यों कैसे करे? पितृ दोष ,राहू ,सर्प दोष शांति ?तर्पण? विधि             श्राद्ध नामा - पंडित विजेंद्र कुमार तिवारी श्राद्ध कब नहीं करें :   १. मृत्यु के प्रथम वर्ष श्राद्ध नहीं करे ।   २. पूर्वान्ह में शुक्ल्पक्ष में रात्री में और अपने जन्मदिन में श्राद्ध नहीं करना चाहिए ।   ३. कुर्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति अग्नि विष आदि के द्वारा आत्महत्या करता है उसके निमित्त श्राद्ध नहीं तर्पण का विधान नहीं है । ४. चतुदर्शी तिथि की श्राद्ध नहीं करना चाहिए , इस तिथि को मृत्यु प्राप्त पितरों का श्राद्ध दूसरे दिन अमावस्या को करने का विधान है । ५. जिनके पितृ युद्ध में शस्त्र से मारे गए हों उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करने से वे प्रसन्न होते हैं और परिवारजनों पर आशीर्वाद बनाए रखते हैं ।           श्राद्ध कब , क्या और कैसे करे जानने योग्य बाते           किस तिथि की श्राद्ध नहीं -  १. जिस तिथी को जिसकी मृत्यु हुई है , उस तिथि को ही श्राद्ध किया जाना चा...

रामचरितमानस की चौपाईयाँ-मनोकामना पूरक सरल मंत्रात्मक (ramayan)

*****मनोकामना पूरक सरल मंत्रात्मक रामचरितमानस की चौपाईयाँ-       रामचरितमानस के एक एक शब्द को मंत्रमय आशुतोष भगवान् शिव ने बना दिया |इसलिए किसी भी प्रकार की समस्या के लिए सुन्दरकाण्ड या कार्य उद्देश्य के लिए लिखित चौपाई का सम्पुट लगा कर रामचरितमानस का पाठ करने से मनोकामना पूर्ण होती हैं | -सोमवार,बुधवार,गुरूवार,शुक्रवार शुक्ल पक्ष अथवा शुक्ल पक्ष दशमी से कृष्ण पक्ष पंचमी तक के काल में (चतुर्थी, चतुर्दशी तिथि छोड़कर )प्रारंभ करे -   वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र-शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को स्मरण कर  इनका सम्पुट लगा कर पढ़े या जप १०८ प्रतिदिन करते हैं तो ११वे दिन १०८आहुति दे | अष्टांग हवन सामग्री १॰ चन्दन का बुरादा , २॰ तिल , ३॰ शुद्ध घी , ४॰ चीनी , ५॰ अगर , ६॰ तगर , ७॰ कपूर , ८॰ शुद्ध केसर , ९॰ नागरमोथा , १०॰ पञ्चमेवा , ११॰ जौ और १२॰ चावल। १॰ विपत्ति-नाश - “ राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।। ” २॰ संकट-नाश - “ जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।। जपहिं ना...

दुर्गा जी के अभिषेक पदार्थ विपत्तियों के विनाशक एक रहस्य | दुर्गा जी को अपनी समस्या समाधान केलिए क्या अर्पण करना चाहिए?

दुर्गा जी   के अभिषेक पदार्थ विपत्तियों   के विनाशक एक रहस्य | दुर्गा जी को अपनी समस्या समाधान केलिए क्या अर्पण करना चाहिए ? अभिषेक किस पदार्थ से करने पर हम किस मनोकामना को पूर्ण कर सकते हैं एवं आपत्ति विपत्ति से सुरक्षा कवच निर्माण कर सकते हैं | दुर्गा जी को अर्पित सामग्री का विशेष महत्व होता है | दुर्गा जी का अभिषेक या दुर्गा की मूर्ति पर किस पदार्थ को अर्पण करने के क्या लाभ होते हैं | दुर्गा जी शक्ति की देवी हैं शीघ्र पूजा या पूजा सामग्री अर्पण करने के शुभ अशुभ फल प्रदान करती हैं | 1- दुर्गा जी को सुगंधित द्रव्य अर्थात ऐसे पदार्थ ऐसे पुष्प जिनमें सुगंध हो उनको अर्पित करने से पारिवारिक सुख शांति एवं मनोबल में वृद्धि होती है | 2- दूध से दुर्गा जी का अभिषेक करने पर कार्यों में सफलता एवं मन में प्रसन्नता बढ़ती है | 3- दही से दुर्गा जी की पूजा करने पर विघ्नों का नाश होता है | परेशानियों में कमी होती है | संभावित आपत्तियों का अवरोध होता है | संकट से व्यक्ति बाहर निकल पाता है | 4- घी के द्वारा अभिषेक करने पर सर्वसामान्य सुख एवं दांपत्य सुख में वृद्धि होती...

श्राद्ध:जानने योग्य महत्वपूर्ण बातें |

श्राद्ध क्या है ? “ श्रद्धया यत कृतं तात श्राद्धं | “ अर्थात श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म श्राद्ध है | अपने माता पिता एवं पूर्वजो की प्रसन्नता के लिए एवं उनके ऋण से मुक्ति की विधि है | श्राद्ध क्यों करना चाहिए   ? पितृ ऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध किया जाना अति आवश्यक है | श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम ? यदि मानव योनी में समर्थ होते हुए भी हम अपने जन्मदाता के लिए कुछ नहीं करते हैं या जिन पूर्वज के हम अंश ( रक्त , जींस ) है , यदि उनका स्मरण या उनके निमित्त दान आदि नहीं करते हैं , तो उनकी आत्मा   को कष्ट होता है , वे रुष्ट होकर , अपने अंश्जो वंशजों को श्राप देते हैं | जो पीढ़ी दर पीढ़ी संतान में मंद बुद्धि से लेकर सभी प्रकार की प्रगति अवरुद्ध कर देते हैं | ज्योतिष में इस प्रकार के अनेक शाप योग हैं |   कब , क्यों श्राद्ध किया जाना आवश्यक होता है   ? यदि हम   96  अवसर पर   श्राद्ध   नहीं कर सकते हैं तो कम से कम मित्रों के लिए पिता माता की वार्षिक तिथि पर यह अश्वनी मास जिसे क्वांर का माह    भी कहा ज...

श्राद्ध रहस्य प्रश्न शंका समाधान ,श्राद्ध : जानने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य -कब,क्यों श्राद्ध करे?

संतान को विकलांगता, अल्पायु से बचाइए श्राद्ध - पितरों से वरदान लीजिये पंडित विजेंद्र कुमार तिवारी jyotish9999@gmail.com , 9424446706   श्राद्ध : जानने  योग्य   महत्वपूर्ण तथ्य -कब,क्यों श्राद्ध करे?  श्राद्ध से जुड़े हर सवाल का जवाब | पितृ दोष शांति? राहू, सर्प दोष शांति? श्रद्धा से श्राद्ध करिए  श्राद्ध कब करे? किसको भोजन हेतु बुलाएँ? पितृ दोष, राहू, सर्प दोष शांति? तर्पण? श्राद्ध क्या है? श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम क्या संभावित है? श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम क्या संभावित है? श्राद्ध की प्रक्रिया जटिल एवं सबके सामर्थ्य की नहीं है, कोई उपाय ? श्राद्ध कब से प्रारंभ होता है ? प्रथम श्राद्ध किसका होता है ? श्राद्ध, कृष्ण पक्ष में ही क्यों किया जाता है श्राद्ध किन२ शहरों में  किया जा सकता है ? क्या गया श्राद्ध सर्वोपरि है ? तिथि अमावस्या क्या है ?श्राद्द कार्य ,में इसका महत्व क्यों? कितने प्रकार के   श्राद्ध होते   हैं वर्ष में   कितने अवसर श्राद्ध के होते हैं? कब  श्राद्ध किया जाना...

गणेश विसृजन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि

28 सितंबर गणेश विसर्जन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए जिस प्रकार उसका प्रारंभ किया जाता है समापन भी किया जाना उद्देश्य होता है। गणेश जी की स्थापना पार्थिव पार्थिव (मिटटीएवं जल   तत्व निर्मित)     स्वरूप में करने के पश्चात दिनांक 23 को उस पार्थिव स्वरूप का विसर्जन किया जाना ज्योतिष के आधार पर सुयोग है। किसी कार्य करने के पश्चात उसके परिणाम शुभ , सुखद , हर्षद एवं सफलता प्रदायक हो यह एक सामान्य उद्देश्य होता है।किसी भी प्रकार की बाधा व्यवधान या अनिश्ट ना हो। ज्योतिष के आधार पर लग्न को श्रेष्ठता प्रदान की गई है | होरा मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना गया है।     गणेश जी का संबंध बुधवार दिन अथवा बुद्धि से ज्ञान से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों प्रतियोगियों एवं बुद्धि एवं ज्ञान में रूचि है , ऐसे लोगों के लिए बुध की होरा श्रेष्ठ होगी तथा उच्च पद , गरिमा , गुरुता , बड़प्पन , ज्ञान , निर्णय दक्षता में वृद्धि के लिए गुरु की हो रहा श्रेष्ठ होगी | इसके साथ ही जल में विसर्जन कार्य होता है अतः चंद्र की होरा सामा...

श्राद्ध रहस्य - श्राद्ध क्यों करे ? कब श्राद्ध नहीं करे ? पिंड रहित श्राद्ध ?

श्राद्ध रहस्य - क्यों करे , न करे ? पिंड रहित , महालय ? किसी भी कर्म का पूर्ण फल विधि सहित करने पर ही मिलता है | * श्राद्ध में गाय का ही दूध प्रयोग करे |( विष्णु पुराण ) | श्राद्ध भोजन में तिल अवश्य प्रयोग करे | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि - श्राद्ध अपरिहार्य - अश्वनी माह के कृष्ण पक्ष तक पितर अत्यंत अपेक्षा से कष्ट की   स्थिति में जल , तिल की अपनी संतान से , प्रतिदिन आशा रखते है | अन्यथा दुखी होकर श्राप देकर चले जाते हैं | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि इसको नहीं करने से पीढ़ी दर पीढ़ी संतान मंद बुद्धि , दिव्यांगता .मानसिक रोग होते है | हेमाद्रि ग्रन्थ - आषाढ़ माह पूर्णिमा से /कन्या के सूर्य के समय एक दिन भी श्राद्ध कोई करता है तो , पितर एक वर्ष तक संतुष्ट/तृप्त रहते हैं | ( भद्र कृष्ण दूज को भरणी नक्षत्र , तृतीया को कृत्तिका नक्षत्र   या षष्ठी को रोहणी नक्षत्र या व्यतिपात मंगलवार को हो ये पिता को प्रिय योग है इस दिन व्रत , सूर्य पूजा , गौ दान गौ -दान श्रेष्ठ | - श्राद्ध का गया तुल्य फल- पितृपक्ष में मघा सूर्य की अष्टमी य त्रयोदशी को मघा नक्षत्र पर चंद्र ...

गणेश भगवान - पूजा मंत्र, आरती एवं विधि

सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

विवाह बाधा और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा पूजा

विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । 10 oct - 18 oct विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन कर...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...