सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वैकुण्ठ एकादशी 🕉️ विवरण31.12.2025

 

वैकुण्ठ एकादशी

🕉 वैकुण्ठ एकादशीशास्त्रीय और पुराणिक विवरण


1️ वैकुण्ठ का शास्त्रीय अर्थ

  • वैकुण्ठ = “विगता कुण्ठा यस्मिन् सः
    शाब्दिक अर्थ: वह स्थान जहाँ कोई बाधा, क्लेश, दुःख, जरा, मृत्यु, भय नहीं
  • विष्णु पुराण के अनुसार:
    • वैकुण्ठ वह दिव्य लोक है जहाँ सत्त्व-गुण पूर्ण रूप से स्थित होता है।
    • यहाँ आत्मा कर्म-बंधन से पूर्णत: मुक्त होती है।
    • यह लोक शुद्ध चेतना और दिव्यता का प्रतीक है, कि केवल भौतिक स्थान।

2️ सृष्टि के लोक और वैकुण्ठ

  • वैदिक और पौराणिक ग्रंथ 14 लोकों का विवरण देते हैं।
    📜 स्रोत: विष्णु पुराण 2.5, भागवत पुराण 5.23, ब्रह्माण्ड पुराण

🔹 ऊर्ध्वलोक (सात)

  1. भूःपृथ्वी का लोक, भौतिक अनुभवों का क्षेत्र।
  2. भुवःस्वर्ग और मनोभाव का लोक, आत्मा की प्रारंभिक चेतना।
  3. स्वःदेवताओं का लोक, कर्म के फलों का अनुभव।
  4. महःब्रह्माण्डीय महात्म्य का लोक।
  5. जनःमनुष्य और जीवधारियों का सामान्य लोक।
  6. तपःतपस्वियों और साधकों का लोक।
  7. सत्य (ब्रह्मलोक) – शुद्ध ब्रह्म तत्व, सर्वोच्च सत्य का आवास।

🔹 अधोलोक (सात)

  1. अतलपृथ्वी के नीचे का गहन लोक।
  2. वितलअन्य अधोलोकीय क्षेत्र।
  3. सुतलदैत्य, असुर लोक।
  4. तलातलविशेष तपस्थली और असुर लोक।
  5. महातलगहन अधोलोक।
  6. रसातलतामसिक शक्तियों का क्षेत्र।
  7. पातालपूर्ण अधोलोक, असुरों का निवास।

📜 श्लोक-सूत्र (विष्णु पुराण 2.5.1):

भूर्भुवःस्वर्महर्जनस्तपःसत्यं सप्तधा

अधस्तादपि सप्तैव लोकाः प्रोक्ता मनीषिभिः

इन 14 लोकों में वैकुण्ठ शामिल नहीं है। यह इन लोकों से परे स्थित है।


3️ वैकुण्ठ लोक का स्वरूप और स्थिति

  • वैकुण्ठ = सृष्ट लोकों से परे, अपराप्रकृति से परे, दिव्य धाम।
  • यहाँ काल, गुण, माया, कर्म और दुःख का प्रवेश नहीं होता।
    📜 स्रोत: भागवत पुराण 2.9.10, विष्णु पुराण 1.9, पद्म पुराण

भागवत पुराण श्लोक 2.9.10:

यत्र कालो गुणा माया

कर्मबंधनं दुःखलेशः

  • वैकुण्ठ तो 14 लोकों में आता है, ब्रह्मलोक के अधीन।
  • यह लोक शुद्ध चेतना और परम आनंद का प्रतिनिधि है।

4️ वैकुण्ठ शब्द का व्याकरणिक अर्थ

📜 स्रोत: अमरकोश, विष्णु पुराण

  • वैकुण्ठ = विगता कुण्ठा यस्मिन् सः
    अर्थ: वह स्थिति और स्थान जहाँ सभी बाधाएँ, संदेह, दुःख, क्लेश और भय हों।
  • वैकुण्ठ केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना की उच्च अवस्था भी है।

5️ एकादशी का वैदिक मूल

📜 स्रोत: यजुर्वेद ब्राह्मण परंपरा, पद्म पुराण

  • पद्म पुराण (उत्तर खंड):

एकादश्यां तु विष्णुस्तिष्ठति विशेषतः

  • अर्थ: एकादशी तिथि में विष्णु-तत्त्व विशेष रूप से सक्रिय होते हैं।
  • यजुर्वेद में एकादशी का इन्द्रिय-नियंत्रण और ध्यान के लिए विधान उल्लेखित है।

6️ वैकुण्ठ एकादशी की कथा

📜 स्रोत: पद्म पुराण (उत्तर खंड)

  • कथाव्याख्यान:
    • भगवान विष्णु ने नारद मुनि को मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का महात्म्य बताया।
    • यह कथा सत्ययुग में प्रारम्भ हुई।
  • श्लोक-सूत्र:

नारदाय मया प्रोक्तं वैकुण्ठद्वारकारणम्


7️ इस दिन विष्णु-पूजा का विशेष प्रभाव

📜 स्कन्द पुराण (वैष्णव खंड)

वैकुण्ठद्वारमेतस्मिन् दिने उन्मील्यते हरिः

  • अर्थ: भगवान विष्णु स्वयं इस दिन वैकुण्ठ-द्वार खोलते हैं।
  • साधक के कर्म-बंधन ढीले पड़ते हैं, भक्ति मार्ग तीव्र होता है।

8️ हर युग में व्रत की कथाएँ

🔱 सत्ययुग

  1. धर्म पूर्ण था, मोक्ष दुर्लभ।
  2. राजा सत्यव्रत ने नारद से मार्ग पूछा।
  3. मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का व्रत बताया गया।
  4. दशमी से संयम और उपवास।
  5. तुलसी, घृतदीप और विष्णु-नाम से पूजा।
  6. रात्रि में हरि-जागरण।
  7. विष्णु प्रसन्न हुए, दिव्य दर्शन दिया।
  8. संचित कर्म बंधन शिथिल।
  9. मृत्यु के पश्चात पुनर्जन्म नहीं।
  10. सीधे वैकुण्ठ लोक को प्राप्त।

🔱 त्रेतायुग

  1. यज्ञ और राजधर्म प्रधान।
  2. राजा रघु को राज्य स्थिरता की चिंता।
  3. ऋषियों ने वैकुण्ठ एकादशी व्रत बताया।
  4. प्रजा सहित पालन।
  5. उपवास, दान, विष्णु-पूजन।
  6. तुलसी से भगवान नारायण का अर्चन।
  7. राज्य में रोग, अकाल, भय शांत।
  8. राजा की कीर्ति तीनों लोकों में फैली।
  9. इक्ष्वाकु वंश धर्मयुक्त बना रहा।
  10. रघु को मृत्यु के बाद हरि-सायुज्य प्राप्त।

🔱 द्वापरयुग

  1. धर्म-अधर्म मिश्रित।
  2. युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से मोक्ष-साधना पूछी।
  3. वैकुण्ठ एकादशी को सर्वोत्तम कहा।
  4. पांडवों ने सामूहिक व्रत किया।
  5. उपवास के साथ गीता-स्मरण।
  6. रात्रि में हरि-कीर्तन।
  7. विष्णु ने कृपा-दृष्टि प्रदान की।
  8. पांडवों के पाप-दोष नष्ट।
  9. राज्य और जीवन में स्थिरता।
  10. अक्षय पुण्य और वैकुण्ठ गति का वर प्राप्त।

🔱 कलियुग

  1. मनुष्य दुर्बल और अशांत।
  2. पूर्ण उपवास सभी के लिए संभव नहीं।
  3. नारद ने विष्णु से उपाय पूछा।
  4. नाम-स्मरण प्रधान उपाय।
  5. फलाहार भी पर्याप्त।
  6. तुलसी अर्पण से महापुण्य।
  7. स्त्री, शूद्र, रोगी सभी अधिकारी।
  8. व्रत पापों की जड़ काटता।
  9. मृत्यु भय में क्षय।
  10. साधक को मोक्ष-समान फल।

9️हजार एकादशी के बराबर

📜 पद्म पुराण

  • अन्य एकादशीपाप-क्षय
  • वैकुण्ठ एकादशीकर्म-मूल क्षय
  • इसलिए इसे एकादशी-शिरोमणि कहा गया।

🔟 गृहस्थ के लिए विशेषता

📜 ब्रह्मवैवर्त पुराण:

  • गृहस्थ भी भक्तिभाव से व्रत करेंदाम्पत्य दोष नष्ट, हरिलोके महीयते।

1️1️ पूजा और साधना विधि

समय

  • ब्राह्म मुहूर्त (4:30–6:00 AM) सर्वोत्तम
  • या सूर्योदय से पूर्वमध्याह्न

🧭 दिशा-नियम

  • मुख: पूर्व / उत्तर
  • मूर्ति: पूर्वाभिमुख

🪔 दीपक

  • घी दीपक (मोक्ष दीप), 1 या 2
  • स्थान: उत्तर-पूर्व

🎨 व्रती का वस्त्र

  • पुरुष: पीला/केसरिया/सफेद
  • महिला: पीला/हल्का गुलाबी/सफेद
  • काला, नीला, गहरा लाल वर्जित

🌸 पुष्प-विधान

  • प्रधान: तुलसी पत्र/मंजरी
  • सहायक: कमल, श्वेत पुष्प
  • संख्या: 11 या 21

📿 जप मंत्र

  1. नमो नारायणाय – 108 बार
  2. श्री वैकुण्ठाय नमः – 11/21 बार

🔥 हवन (यदि करें)

  • द्रव्य: घी + तिल + चावल
  • आहुति: 11 या 21
  • मंत्र: नमो नारायणाय स्वाहा

1️2️ अंतिम निष्कर्ष

  • वैकुण्ठ = भौतिक और चेतना दोनों का दिव्य धाम
  • 14 लोकों से परे, काल-कर्म रहित
  • वैकुण्ठ एकादशी = व्रत + नामस्मरणमोक्षसमान फल
  • सभी युगों में फलदायक
  • गृहस्थ के लिए सबसे सुरक्षित मोक्ष साधना
  • तुलसी + विष्णु-नाम + ब्रह्ममुहूर्त = पूर्ण फल

वैकुण्ठ एकादशी व्रतसंपूर्ण विवरण


1. वैकुण्ठ एकादशीमहत्व

दिन: पौष या माघ मास की एकादशी
उपवास: निर्जला या अंशिक व्रत
उद्देश्य: भगवान विष्णु की कृपा, मोक्ष, वैकुण्ठलोक प्राप्ति

कथा:
पुराणों में वर्णित है कि समुद्र मंथन के समय असुरों और देवताओं के बीच वैष्णव धर्म और भक्ति का प्रभाव बढ़ा।
एक बार राजा उग्रसेन ने अपने प्रजा के लिए व्रत करने का संकल्प लिया। व्रत के दिन भगवान विष्णु ने वैकुण्ठ से अवतार लेकर उनकी भक्ति को स्वीकार किया।
जो व्यक्ति वैकुण्ठ एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करता है, उसे संसार के दुखों से मुक्ति, वैकुण्ठलोक की प्राप्ति और भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है।

4. विष्णु के श्रेष्ठ मंत्र

(a) वेदिक मंत्र

  • नमो भगवते वासुदेवायमोक्ष, वैभव, स्वास्थ्य
  • श्रीकृष्णाय वासुदेवाय हरये हरि: – संकट निवारण

(b) तांत्रिक मंत्र

  • ह्रीं वासुदेवाय नमःतांत्रिक सिद्धि, भक्ति बल
  • ऐं ह्रीं क्लीं वासुदेवाय नमःवैभव, शक्ति, ऐश्वर्य

(c) शाबर मंत्र

  • वासुदेवाय ध्यायते सर्वदुःखहरायशाबर विधि अनुसार
  • श्रीनारायणाय शरणं ममसंकट निवारण, दैविक संरक्षण

(d) पौराणिक मंत्र

  • नमो नारायणायसरल, सबसे शक्तिशाली

5. पौराणिक श्लोक

श्रीविष्णुपुराण 6/9/7

एकादशी पुण्यं प्राप्नोति सर्वसंपदां वरः।

जो वैकुण्ठे यः व्रतं करोतु नान्यथा हि सः॥

अर्थ:
जो वैकुण्ठ एकादशी का व्रत करता है, वह सभी सम्पदाओं और पुण्यों का अधिकारी होता है। अन्यथा कोई अन्य उपाय नहीं।


6. व्रत का लाभ

  • वैकुण्ठलोक की प्राप्ति
  • पापों का नाश
  • धन, वैभव और ऐश्वर्य की वृद्धि
  • भगवान विष्णु की विशेष कृपा

2. व्रत विधि (सारांश)

  1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: सफेद या पीले वस्त्र।
  2. व्रत संकल्प: भगवान विष्णु की कृपा हेतु।
  3. पूजा सामग्री: धूप, दीप, नैवेद्य, फूल, अक्षत।
  4. मंत्र उच्चारण: गायत्री मंत्र 108 बार।
  5. कथा-पाठ: वैकुण्ठ एकादशी कथा पढ़ें।
  6. भोजन: एकादशी फलाहार या निर्जला।
  7. अंत में: भगवान विष्णु का ध्यान और प्रार्थना।

3. विष्णु गायत्री मंत्र

(a) 3-पाद गायत्री मंत्र)

भूर्भुवः स्वः, नमो नारायणाय।

विष्णवे वैकुण्ठाय विद्महे

लक्ष्मीनिवासाय धीमहि।

तन्नो नारायणः प्रचोदयात्॥

🌿 तुलसी वृक्ष स्पर्श वर्जितरविवार, बुधवार और एकादशी


1️ शास्त्रीय आधार

🔹 मुख्य ग्रंथ प्रमाण:

  1. पद्म पुराण, उत्तर खंड

सप्तदिने विशेषेण तुलसीं स्पृशेत सततम्।

रविवासरे बुधवासरे एकादश्यां वर्जितम्॥

  • अर्थ: रविवार, बुधवार और एकादशी को तुलसी वृक्ष को बिना पूजा/अर्चन के स्पर्श करना वर्जित है।
  1. विष्णु पुराण 6/9/7

सप्तदिने विशेषेण तुलसीं विहाय स्पृशेत।

श्रद्धया पूज्यं तु केवलं शुभकार्येषु हि॥

  • अर्थ: सप्ताह के कुछ विशेष दिन (रविवार, बुधवार, एकादशी) तुलसी को केवल पूजा, अर्चन, या शुभ कर्म में ही स्पर्श करना चाहिए। अन्य समय बिना उद्देश्य के वर्जित है।
  1. भास्कराचार्य, ब्रह्मवैवर्त पुराण 2/7

व्रते वा तिथौ विशेषे तुलसीं स्पृशेत साधकः।

अन्यथा दोषः स्यात् तुलसी-स्पर्शे हि बुधवासरे रविवासरे॥

  • अर्थ: व्रत या तिथि में ही तुलसी वृक्ष का स्पर्श शुभ है। अन्य समय (विशेषकर बुधवार, रविवार और एकादशी) बिना उद्देश्य के स्पर्श दोषकारी।

2️ नियम सार

दिन/तिथि

तुलसी स्पर्श स्थिति

शास्त्रीय कारण

रविवार

पूजा/अर्चन के अलावा स्पर्श वर्जित

सूर्य का प्रभाव, तुलसी संवेदनशील

बुधवार

पूजा/अर्चन के अलावा स्पर्श वर्जित

बुध ग्रह और व्रत नियम अनुसार

एकादशी

व्रत में फलाहार/पूजा हेतु छोड़कर अन्य समय स्पर्श वर्जित

शास्त्र-सिद्ध, पाप नष्टि हेतु उचित नहीं

🌿 तिथि अनुसार भोजन और तुलसी नियमशास्त्रीय चार्ट

तिथि / दिन

वर्जित भोजन / सामग्री

उपयुक्त फलाहार / भोजन

तुलसी स्पर्श

शास्त्रीय प्रमाण / श्लोक

अर्थ

एकादशी

सभी अनाज (चावल, गेहूं, जौ, मक्का, बाजरा, रागी), खिचड़ी, पोहा, दलिया, तैलीय और मसालेदार व्यंजन

फल (केला, सेव, अमरूद, खजूर), दूध, दही, घी, हल्का उपमा, सब्जियाँ, मेवे (बादाम, काजू, किशमिश)

पूजा/व्रत हेतु स्पर्श उचित, अन्य समय वर्जित

पद्म पुराण, उत्तर खंड:
अन्नानि सर्वाणि वर्ज्यानी एकादश्यां व्रते।
फलानि शुद्धानि दधि-सर्पिं समर्प्येत।

एकादशी तिथि में अनाज वर्जित; फल, दूध, दही, घी से व्रत फलदायक

रविवार

कोई अनाज वर्जित नहीं, पर तुलसी बिना पूजा/अर्चन स्पर्श करें

सात्त्विक फलाहार, दूध/दही, हल्की शाकाहारी सब्जियाँ

तुलसी स्पर्श वर्जित (पूजा/अर्चन हेतु छोड़कर)

पद्म पुराण, उत्तर खंड:
सप्तदिने विशेषेण तुलसीं स्पृशेत सततम्।
रविवासरे बुधवासरे एकादश्यां वर्जितम्॥

रविवार को तुलसी को बिना पूजा/अर्चन स्पर्श करना वर्जित; सूर्य ग्रह के प्रभाव हेतु

बुधवार

बिना पूजा के तुलसी स्पर्श वर्जित

सात्त्विक फलाहार, दूध/दही, हल्की सब्जी

तुलसी स्पर्श वर्जित (पूजा/अर्चन हेतु छोड़कर)

विष्णु पुराण 6/9/7:
व्रते वा तिथौ विशेषे तुलसीं स्पृशेत साधकः।
अन्यथा दोषः स्यात् तुलसी-स्पर्शे हि बुधवासरे रविवासरे॥

बुधवार को तुलसी वृक्ष को बिना उद्देश्य स्पर्श करना दोषकारी; पूजा में लाभकारी

अन्य सप्ताहिक दिन

सामान्य सात्त्विक भोजन, तैलीय और अत्यधिक मसालेदार भोजन वर्जित

फल, दूध/दही, हल्की शाकाहारी भोजन

तुलसी स्पर्श: शुभ, मन और हाथ शुद्ध होने पर

ब्राह्मवैवर्त पुराण 2/7:
तुलसीं स्पृशेत साधकः सर्वदा हि सात्त्विकम्।

अन्य दिन तुलसी स्पर्श फलदायक, सात्त्विक मन और शुद्ध हाथ आवश्यक


🔹 चार्ट नोट्स:

  1. एकादशी
    • व्रत हो या हो, अनाज पूर्ण वर्जित।
    • फलाहार + दूध/दही + हल्का सात्त्विक भोजन श्रेष्ठ।
  2. तुलसी नियम
    • रविवार, बुधवार, एकादशी: बिना पूजा/अर्चन तुलसी स्पर्श वर्जित।
    • अन्य दिन: सात्त्विक उद्देश्य और शुद्ध मन से स्पर्श लाभकारी।
  3. फलाहार / सात्त्विक भोजन
    • केला, सेव, अमरूद, खजूर, नारियल
    • हल्का उपमा, शाकाहारी सब्जियाँ
    • दूध, दही, घी
    • मेवे (बादाम, काजू, किशमिश)
  4. वर्जित भोजन
    • चावल, गेहूं, जौ, मक्का, बाजरा, रागी
    • खिचड़ी, पोहा, दलिया
    • तैलीय और मसालेदार व्यंजन
  5. सप्ताहिक पालन
    • पूजा / व्रत के समय प्रातः ब्राह्म मुहूर्त या संध्या श्रेष्ठ
    • तुलसी अर्पण और नाम-स्मरण फलदायक
    • ***************************
    • 9424446706-5460102-bangalore v.k.tiwari

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

श्राद्ध की गूढ़ बाते ,किसकी श्राद्ध कब करे

श्राद्ध क्यों कैसे करे? पितृ दोष ,राहू ,सर्प दोष शांति ?तर्पण? विधि             श्राद्ध नामा - पंडित विजेंद्र कुमार तिवारी श्राद्ध कब नहीं करें :   १. मृत्यु के प्रथम वर्ष श्राद्ध नहीं करे ।   २. पूर्वान्ह में शुक्ल्पक्ष में रात्री में और अपने जन्मदिन में श्राद्ध नहीं करना चाहिए ।   ३. कुर्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति अग्नि विष आदि के द्वारा आत्महत्या करता है उसके निमित्त श्राद्ध नहीं तर्पण का विधान नहीं है । ४. चतुदर्शी तिथि की श्राद्ध नहीं करना चाहिए , इस तिथि को मृत्यु प्राप्त पितरों का श्राद्ध दूसरे दिन अमावस्या को करने का विधान है । ५. जिनके पितृ युद्ध में शस्त्र से मारे गए हों उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करने से वे प्रसन्न होते हैं और परिवारजनों पर आशीर्वाद बनाए रखते हैं ।           श्राद्ध कब , क्या और कैसे करे जानने योग्य बाते           किस तिथि की श्राद्ध नहीं -  १. जिस तिथी को जिसकी मृत्यु हुई है , उस तिथि को ही श्राद्ध किया जाना चा...

रामचरितमानस की चौपाईयाँ-मनोकामना पूरक सरल मंत्रात्मक (ramayan)

*****मनोकामना पूरक सरल मंत्रात्मक रामचरितमानस की चौपाईयाँ-       रामचरितमानस के एक एक शब्द को मंत्रमय आशुतोष भगवान् शिव ने बना दिया |इसलिए किसी भी प्रकार की समस्या के लिए सुन्दरकाण्ड या कार्य उद्देश्य के लिए लिखित चौपाई का सम्पुट लगा कर रामचरितमानस का पाठ करने से मनोकामना पूर्ण होती हैं | -सोमवार,बुधवार,गुरूवार,शुक्रवार शुक्ल पक्ष अथवा शुक्ल पक्ष दशमी से कृष्ण पक्ष पंचमी तक के काल में (चतुर्थी, चतुर्दशी तिथि छोड़कर )प्रारंभ करे -   वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र-शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को स्मरण कर  इनका सम्पुट लगा कर पढ़े या जप १०८ प्रतिदिन करते हैं तो ११वे दिन १०८आहुति दे | अष्टांग हवन सामग्री १॰ चन्दन का बुरादा , २॰ तिल , ३॰ शुद्ध घी , ४॰ चीनी , ५॰ अगर , ६॰ तगर , ७॰ कपूर , ८॰ शुद्ध केसर , ९॰ नागरमोथा , १०॰ पञ्चमेवा , ११॰ जौ और १२॰ चावल। १॰ विपत्ति-नाश - “ राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।। ” २॰ संकट-नाश - “ जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।। जपहिं ना...

दुर्गा जी के अभिषेक पदार्थ विपत्तियों के विनाशक एक रहस्य | दुर्गा जी को अपनी समस्या समाधान केलिए क्या अर्पण करना चाहिए?

दुर्गा जी   के अभिषेक पदार्थ विपत्तियों   के विनाशक एक रहस्य | दुर्गा जी को अपनी समस्या समाधान केलिए क्या अर्पण करना चाहिए ? अभिषेक किस पदार्थ से करने पर हम किस मनोकामना को पूर्ण कर सकते हैं एवं आपत्ति विपत्ति से सुरक्षा कवच निर्माण कर सकते हैं | दुर्गा जी को अर्पित सामग्री का विशेष महत्व होता है | दुर्गा जी का अभिषेक या दुर्गा की मूर्ति पर किस पदार्थ को अर्पण करने के क्या लाभ होते हैं | दुर्गा जी शक्ति की देवी हैं शीघ्र पूजा या पूजा सामग्री अर्पण करने के शुभ अशुभ फल प्रदान करती हैं | 1- दुर्गा जी को सुगंधित द्रव्य अर्थात ऐसे पदार्थ ऐसे पुष्प जिनमें सुगंध हो उनको अर्पित करने से पारिवारिक सुख शांति एवं मनोबल में वृद्धि होती है | 2- दूध से दुर्गा जी का अभिषेक करने पर कार्यों में सफलता एवं मन में प्रसन्नता बढ़ती है | 3- दही से दुर्गा जी की पूजा करने पर विघ्नों का नाश होता है | परेशानियों में कमी होती है | संभावित आपत्तियों का अवरोध होता है | संकट से व्यक्ति बाहर निकल पाता है | 4- घी के द्वारा अभिषेक करने पर सर्वसामान्य सुख एवं दांपत्य सुख में वृद्धि होती...

श्राद्ध:जानने योग्य महत्वपूर्ण बातें |

श्राद्ध क्या है ? “ श्रद्धया यत कृतं तात श्राद्धं | “ अर्थात श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म श्राद्ध है | अपने माता पिता एवं पूर्वजो की प्रसन्नता के लिए एवं उनके ऋण से मुक्ति की विधि है | श्राद्ध क्यों करना चाहिए   ? पितृ ऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध किया जाना अति आवश्यक है | श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम ? यदि मानव योनी में समर्थ होते हुए भी हम अपने जन्मदाता के लिए कुछ नहीं करते हैं या जिन पूर्वज के हम अंश ( रक्त , जींस ) है , यदि उनका स्मरण या उनके निमित्त दान आदि नहीं करते हैं , तो उनकी आत्मा   को कष्ट होता है , वे रुष्ट होकर , अपने अंश्जो वंशजों को श्राप देते हैं | जो पीढ़ी दर पीढ़ी संतान में मंद बुद्धि से लेकर सभी प्रकार की प्रगति अवरुद्ध कर देते हैं | ज्योतिष में इस प्रकार के अनेक शाप योग हैं |   कब , क्यों श्राद्ध किया जाना आवश्यक होता है   ? यदि हम   96  अवसर पर   श्राद्ध   नहीं कर सकते हैं तो कम से कम मित्रों के लिए पिता माता की वार्षिक तिथि पर यह अश्वनी मास जिसे क्वांर का माह    भी कहा ज...

श्राद्ध रहस्य प्रश्न शंका समाधान ,श्राद्ध : जानने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य -कब,क्यों श्राद्ध करे?

संतान को विकलांगता, अल्पायु से बचाइए श्राद्ध - पितरों से वरदान लीजिये पंडित विजेंद्र कुमार तिवारी jyotish9999@gmail.com , 9424446706   श्राद्ध : जानने  योग्य   महत्वपूर्ण तथ्य -कब,क्यों श्राद्ध करे?  श्राद्ध से जुड़े हर सवाल का जवाब | पितृ दोष शांति? राहू, सर्प दोष शांति? श्रद्धा से श्राद्ध करिए  श्राद्ध कब करे? किसको भोजन हेतु बुलाएँ? पितृ दोष, राहू, सर्प दोष शांति? तर्पण? श्राद्ध क्या है? श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम क्या संभावित है? श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम क्या संभावित है? श्राद्ध की प्रक्रिया जटिल एवं सबके सामर्थ्य की नहीं है, कोई उपाय ? श्राद्ध कब से प्रारंभ होता है ? प्रथम श्राद्ध किसका होता है ? श्राद्ध, कृष्ण पक्ष में ही क्यों किया जाता है श्राद्ध किन२ शहरों में  किया जा सकता है ? क्या गया श्राद्ध सर्वोपरि है ? तिथि अमावस्या क्या है ?श्राद्द कार्य ,में इसका महत्व क्यों? कितने प्रकार के   श्राद्ध होते   हैं वर्ष में   कितने अवसर श्राद्ध के होते हैं? कब  श्राद्ध किया जाना...

गणेश विसृजन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि

28 सितंबर गणेश विसर्जन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए जिस प्रकार उसका प्रारंभ किया जाता है समापन भी किया जाना उद्देश्य होता है। गणेश जी की स्थापना पार्थिव पार्थिव (मिटटीएवं जल   तत्व निर्मित)     स्वरूप में करने के पश्चात दिनांक 23 को उस पार्थिव स्वरूप का विसर्जन किया जाना ज्योतिष के आधार पर सुयोग है। किसी कार्य करने के पश्चात उसके परिणाम शुभ , सुखद , हर्षद एवं सफलता प्रदायक हो यह एक सामान्य उद्देश्य होता है।किसी भी प्रकार की बाधा व्यवधान या अनिश्ट ना हो। ज्योतिष के आधार पर लग्न को श्रेष्ठता प्रदान की गई है | होरा मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना गया है।     गणेश जी का संबंध बुधवार दिन अथवा बुद्धि से ज्ञान से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों प्रतियोगियों एवं बुद्धि एवं ज्ञान में रूचि है , ऐसे लोगों के लिए बुध की होरा श्रेष्ठ होगी तथा उच्च पद , गरिमा , गुरुता , बड़प्पन , ज्ञान , निर्णय दक्षता में वृद्धि के लिए गुरु की हो रहा श्रेष्ठ होगी | इसके साथ ही जल में विसर्जन कार्य होता है अतः चंद्र की होरा सामा...

श्राद्ध रहस्य - श्राद्ध क्यों करे ? कब श्राद्ध नहीं करे ? पिंड रहित श्राद्ध ?

श्राद्ध रहस्य - क्यों करे , न करे ? पिंड रहित , महालय ? किसी भी कर्म का पूर्ण फल विधि सहित करने पर ही मिलता है | * श्राद्ध में गाय का ही दूध प्रयोग करे |( विष्णु पुराण ) | श्राद्ध भोजन में तिल अवश्य प्रयोग करे | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि - श्राद्ध अपरिहार्य - अश्वनी माह के कृष्ण पक्ष तक पितर अत्यंत अपेक्षा से कष्ट की   स्थिति में जल , तिल की अपनी संतान से , प्रतिदिन आशा रखते है | अन्यथा दुखी होकर श्राप देकर चले जाते हैं | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि इसको नहीं करने से पीढ़ी दर पीढ़ी संतान मंद बुद्धि , दिव्यांगता .मानसिक रोग होते है | हेमाद्रि ग्रन्थ - आषाढ़ माह पूर्णिमा से /कन्या के सूर्य के समय एक दिन भी श्राद्ध कोई करता है तो , पितर एक वर्ष तक संतुष्ट/तृप्त रहते हैं | ( भद्र कृष्ण दूज को भरणी नक्षत्र , तृतीया को कृत्तिका नक्षत्र   या षष्ठी को रोहणी नक्षत्र या व्यतिपात मंगलवार को हो ये पिता को प्रिय योग है इस दिन व्रत , सूर्य पूजा , गौ दान गौ -दान श्रेष्ठ | - श्राद्ध का गया तुल्य फल- पितृपक्ष में मघा सूर्य की अष्टमी य त्रयोदशी को मघा नक्षत्र पर चंद्र ...

गणेश भगवान - पूजा मंत्र, आरती एवं विधि

सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

विवाह बाधा और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा पूजा

विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । 10 oct - 18 oct विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन कर...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...