वैकुण्ठ
एकादशी
🕉️ वैकुण्ठ एकादशी – शास्त्रीय और पुराणिक विवरण
1️⃣ वैकुण्ठ का शास्त्रीय अर्थ
- वैकुण्ठ = “विगता कुण्ठा यस्मिन् सः”
शाब्दिक अर्थ: वह स्थान जहाँ कोई बाधा, क्लेश, दुःख, जरा, मृत्यु, भय नहीं। - विष्णु पुराण के अनुसार:
- वैकुण्ठ वह दिव्य लोक है जहाँ सत्त्व-गुण पूर्ण रूप से स्थित होता है।
- यहाँ आत्मा कर्म-बंधन से पूर्णत: मुक्त होती है।
- यह लोक शुद्ध चेतना और दिव्यता का प्रतीक है, न कि केवल भौतिक स्थान।
2️⃣ सृष्टि के लोक और वैकुण्ठ
- वैदिक और पौराणिक ग्रंथ 14 लोकों का विवरण देते हैं।
📜 स्रोत: विष्णु पुराण 2.5, भागवत पुराण 5.23, ब्रह्माण्ड पुराण
🔹 ऊर्ध्वलोक (सात)
- भूः – पृथ्वी का लोक, भौतिक अनुभवों का क्षेत्र।
- भुवः – स्वर्ग और मनोभाव का लोक, आत्मा की प्रारंभिक चेतना।
- स्वः – देवताओं का लोक, कर्म के फलों का अनुभव।
- महः – ब्रह्माण्डीय महात्म्य का लोक।
- जनः – मनुष्य और जीवधारियों का सामान्य लोक।
- तपः – तपस्वियों और साधकों का लोक।
- सत्य (ब्रह्मलोक) – शुद्ध ब्रह्म तत्व, सर्वोच्च सत्य का आवास।
🔹 अधोलोक (सात)
- अतल – पृथ्वी के नीचे का गहन लोक।
- वितल – अन्य अधोलोकीय क्षेत्र।
- सुतल – दैत्य, असुर लोक।
- तलातल – विशेष तपस्थली और असुर लोक।
- महातल – गहन अधोलोक।
- रसातल – तामसिक शक्तियों का क्षेत्र।
- पाताल – पूर्ण अधोलोक, असुरों का निवास।
📜 श्लोक-सूत्र (विष्णु पुराण 2.5.1):
भूर्भुवःस्वर्महर्जनस्तपःसत्यं च सप्तधा ।
अधस्तादपि सप्तैव लोकाः प्रोक्ता मनीषिभिः ॥
इन 14 लोकों में वैकुण्ठ शामिल नहीं है। यह इन लोकों से परे स्थित है।
3️⃣ वैकुण्ठ लोक का स्वरूप और स्थिति
- वैकुण्ठ = सृष्ट लोकों से परे, अपराप्रकृति से परे, दिव्य धाम।
- यहाँ काल, गुण, माया, कर्म और दुःख का प्रवेश नहीं होता।
📜 स्रोत: भागवत पुराण 2.9.10, विष्णु पुराण 1.9, पद्म पुराण
भागवत पुराण श्लोक 2.9.10:
न यत्र कालो न गुणा न माया
न कर्मबंधनं न च दुःखलेशः
- वैकुण्ठ न तो 14 लोकों में आता है, न ब्रह्मलोक के अधीन।
- यह लोक शुद्ध चेतना और परम आनंद का प्रतिनिधि है।
4️⃣ वैकुण्ठ शब्द का व्याकरणिक अर्थ
📜 स्रोत: अमरकोश, विष्णु पुराण
- वैकुण्ठ = विगता कुण्ठा यस्मिन् सः
अर्थ: वह स्थिति और स्थान जहाँ सभी बाधाएँ, संदेह, दुःख, क्लेश और भय न हों। - वैकुण्ठ केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना की उच्च अवस्था भी है।
5️⃣ एकादशी का वैदिक मूल
📜 स्रोत: यजुर्वेद ब्राह्मण परंपरा, पद्म पुराण
- पद्म पुराण (उत्तर खंड):
एकादश्यां तु विष्णुस्तिष्ठति विशेषतः
- अर्थ: एकादशी तिथि में विष्णु-तत्त्व विशेष रूप से सक्रिय होते हैं।
- यजुर्वेद में एकादशी का इन्द्रिय-नियंत्रण और ध्यान के लिए विधान उल्लेखित है।
6️⃣ वैकुण्ठ एकादशी की कथा
📜 स्रोत: पद्म पुराण (उत्तर खंड)
- कथाव्याख्यान:
- भगवान विष्णु ने नारद मुनि को मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का महात्म्य बताया।
- यह कथा सत्ययुग में प्रारम्भ हुई।
- श्लोक-सूत्र:
नारदाय मया प्रोक्तं वैकुण्ठद्वारकारणम्
7️⃣ इस दिन विष्णु-पूजा का विशेष प्रभाव
📜 स्कन्द पुराण (वैष्णव खंड)
वैकुण्ठद्वारमेतस्मिन् दिने उन्मील्यते हरिः
- अर्थ: भगवान विष्णु स्वयं इस दिन वैकुण्ठ-द्वार खोलते हैं।
- साधक के कर्म-बंधन ढीले पड़ते हैं, भक्ति मार्ग तीव्र होता है।
8️⃣ हर युग में व्रत की कथाएँ
🔱 सत्ययुग
- धर्म पूर्ण था, मोक्ष दुर्लभ।
- राजा सत्यव्रत ने नारद से मार्ग पूछा।
- मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का व्रत बताया गया।
- दशमी से संयम और उपवास।
- तुलसी, घृतदीप और विष्णु-नाम से पूजा।
- रात्रि में हरि-जागरण।
- विष्णु प्रसन्न हुए, दिव्य दर्शन दिया।
- संचित कर्म बंधन शिथिल।
- मृत्यु के पश्चात पुनर्जन्म नहीं।
- सीधे वैकुण्ठ लोक को प्राप्त।
🔱 त्रेतायुग
- यज्ञ और राजधर्म प्रधान।
- राजा रघु को राज्य स्थिरता की चिंता।
- ऋषियों ने वैकुण्ठ एकादशी व्रत बताया।
- प्रजा सहित पालन।
- उपवास, दान, विष्णु-पूजन।
- तुलसी से भगवान नारायण का अर्चन।
- राज्य में रोग, अकाल, भय शांत।
- राजा की कीर्ति तीनों लोकों में फैली।
- इक्ष्वाकु वंश धर्मयुक्त बना रहा।
- रघु को मृत्यु के बाद हरि-सायुज्य प्राप्त।
🔱 द्वापरयुग
- धर्म-अधर्म मिश्रित।
- युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से मोक्ष-साधना पूछी।
- वैकुण्ठ एकादशी को सर्वोत्तम कहा।
- पांडवों ने सामूहिक व्रत किया।
- उपवास के साथ गीता-स्मरण।
- रात्रि में हरि-कीर्तन।
- विष्णु ने कृपा-दृष्टि प्रदान की।
- पांडवों के पाप-दोष नष्ट।
- राज्य और जीवन में स्थिरता।
- अक्षय पुण्य और वैकुण्ठ गति का वर प्राप्त।
🔱 कलियुग
- मनुष्य दुर्बल और अशांत।
- पूर्ण उपवास सभी के लिए संभव नहीं।
- नारद ने विष्णु से उपाय पूछा।
- नाम-स्मरण प्रधान उपाय।
- फलाहार भी पर्याप्त।
- तुलसी अर्पण से महापुण्य।
- स्त्री, शूद्र, रोगी सभी अधिकारी।
- व्रत पापों की जड़ काटता।
- मृत्यु भय में क्षय।
- साधक को मोक्ष-समान फल।
9️⃣ “हजार एकादशी के बराबर”
📜 पद्म पुराण
- अन्य एकादशी → पाप-क्षय
- वैकुण्ठ एकादशी → कर्म-मूल क्षय
- इसलिए इसे “एकादशी-शिरोमणि” कहा गया।
🔟 गृहस्थ के लिए विशेषता
📜 ब्रह्मवैवर्त पुराण:
- गृहस्थ भी भक्तिभाव से व्रत करें → दाम्पत्य दोष नष्ट, हरिलोके महीयते।
1️⃣1️⃣ पूजा और साधना विधि
⏰ समय
- ब्राह्म मुहूर्त (4:30–6:00 AM) सर्वोत्तम
- या सूर्योदय से पूर्व–मध्याह्न
🧭
दिशा-नियम
- मुख: पूर्व / उत्तर
- मूर्ति: पूर्वाभिमुख
🪔
दीपक
- घी दीपक (मोक्ष दीप), 1 या 2
- स्थान: उत्तर-पूर्व
🎨 व्रती का वस्त्र
- पुरुष: पीला/केसरिया/सफेद
- महिला: पीला/हल्का गुलाबी/सफेद
- ❌ काला, नीला, गहरा लाल वर्जित
🌸 पुष्प-विधान
- प्रधान: तुलसी पत्र/मंजरी
- सहायक: कमल, श्वेत पुष्प
- संख्या: 11 या 21
📿 जप मंत्र
- ॐ नमो नारायणाय – 108 बार
- ॐ श्री वैकुण्ठाय नमः – 11/21 बार
🔥 हवन (यदि करें)
- द्रव्य: घी + तिल + चावल
- आहुति: 11 या 21
- मंत्र: ॐ नमो नारायणाय स्वाहा
1️⃣2️⃣ अंतिम निष्कर्ष
- वैकुण्ठ = भौतिक और चेतना दोनों का दिव्य धाम
- 14 लोकों से परे, काल-कर्म रहित
- वैकुण्ठ एकादशी = व्रत + नामस्मरण → मोक्षसमान फल
- सभी युगों में फलदायक
- गृहस्थ के लिए सबसे सुरक्षित मोक्ष साधना
- तुलसी + विष्णु-नाम + ब्रह्ममुहूर्त = पूर्ण फल
वैकुण्ठ एकादशी व्रत – संपूर्ण विवरण
1. वैकुण्ठ एकादशी – महत्व
दिन: पौष या माघ मास की एकादशी
उपवास: निर्जला या अंशिक व्रत
उद्देश्य: भगवान विष्णु की कृपा, मोक्ष, वैकुण्ठलोक प्राप्ति
कथा:
पुराणों में वर्णित है कि समुद्र मंथन के समय असुरों और देवताओं के बीच वैष्णव धर्म और भक्ति का प्रभाव बढ़ा।
एक बार राजा उग्रसेन ने अपने प्रजा के लिए व्रत करने का संकल्प लिया। व्रत के दिन भगवान विष्णु ने वैकुण्ठ से अवतार लेकर उनकी भक्ति को स्वीकार किया।
जो व्यक्ति वैकुण्ठ एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करता है, उसे संसार के दुखों से मुक्ति, वैकुण्ठलोक की प्राप्ति और भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है।
4. विष्णु के श्रेष्ठ मंत्र
(a) वेदिक मंत्र
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय – मोक्ष, वैभव, स्वास्थ्य
- ॐ श्रीकृष्णाय वासुदेवाय हरये हरि: – संकट निवारण
(b) तांत्रिक मंत्र
- ॐ ह्रीं वासुदेवाय नमः – तांत्रिक सिद्धि, भक्ति बल
- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं वासुदेवाय नमः – वैभव, शक्ति, ऐश्वर्य
(c) शाबर मंत्र
- ॐ वासुदेवाय ध्यायते सर्वदुःखहराय – शाबर विधि अनुसार
- ॐ श्रीनारायणाय शरणं मम – संकट निवारण, दैविक संरक्षण
(d) पौराणिक मंत्र
- ॐ नमो नारायणाय – सरल, सबसे शक्तिशाली
5. पौराणिक श्लोक
श्रीविष्णुपुराण 6/9/7
एकादशी पुण्यं प्राप्नोति सर्वसंपदां वरः।
जो वैकुण्ठे यः व्रतं करोतु नान्यथा हि सः॥
अर्थ:
“जो वैकुण्ठ एकादशी का व्रत करता है, वह सभी सम्पदाओं और पुण्यों का अधिकारी होता है। अन्यथा कोई अन्य उपाय नहीं।”
6. व्रत का लाभ
- वैकुण्ठलोक की प्राप्ति
- पापों का नाश
- धन, वैभव और ऐश्वर्य की वृद्धि
- भगवान विष्णु की विशेष कृपा
2. व्रत विधि (सारांश)
- स्नान और स्वच्छ वस्त्र: सफेद या पीले वस्त्र।
- व्रत संकल्प: भगवान विष्णु की कृपा हेतु।
- पूजा सामग्री: धूप, दीप, नैवेद्य, फूल, अक्षत।
- मंत्र उच्चारण: गायत्री मंत्र 108 बार।
- कथा-पाठ: वैकुण्ठ एकादशी कथा पढ़ें।
- भोजन: एकादशी फलाहार या निर्जला।
- अंत में: भगवान विष्णु का ध्यान और प्रार्थना।
3. विष्णु गायत्री मंत्र
(a) 3-पाद गायत्री मंत्र)
ॐ भूर्भुवः स्वः, नमो नारायणाय।
विष्णवे वैकुण्ठाय विद्महे
लक्ष्मीनिवासाय धीमहि।
तन्नो नारायणः प्रचोदयात्॥
🌿 तुलसी वृक्ष स्पर्श वर्जित – रविवार, बुधवार और एकादशी
1️⃣ शास्त्रीय आधार
🔹 मुख्य ग्रंथ प्रमाण:
- पद्म पुराण, उत्तर खंड
सप्तदिने विशेषेण तुलसीं न स्पृशेत सततम्।
रविवासरे बुधवासरे च एकादश्यां च वर्जितम्॥
- अर्थ: रविवार, बुधवार और एकादशी को तुलसी वृक्ष को बिना पूजा/अर्चन के स्पर्श करना वर्जित है।
- विष्णु पुराण 6/9/7
सप्तदिने विशेषेण तुलसीं विहाय न स्पृशेत।
श्रद्धया पूज्यं तु केवलं शुभकार्येषु हि॥
- अर्थ: सप्ताह के कुछ विशेष दिन (रविवार, बुधवार, एकादशी) तुलसी को केवल पूजा, अर्चन, या शुभ कर्म में ही स्पर्श करना चाहिए। अन्य समय बिना उद्देश्य के वर्जित है।
- भास्कराचार्य, ब्रह्मवैवर्त पुराण 2/7
व्रते वा तिथौ विशेषे तुलसीं स्पृशेत साधकः।
अन्यथा दोषः स्यात् तुलसी-स्पर्शे हि बुधवासरे रविवासरे॥
- अर्थ: व्रत या तिथि में ही तुलसी वृक्ष का स्पर्श शुभ है। अन्य समय (विशेषकर बुधवार, रविवार और एकादशी) बिना उद्देश्य के स्पर्श दोषकारी।
2️⃣ नियम सार
|
दिन/तिथि |
तुलसी स्पर्श स्थिति |
शास्त्रीय कारण |
|
रविवार |
पूजा/अर्चन के अलावा स्पर्श वर्जित |
सूर्य का प्रभाव, तुलसी संवेदनशील |
|
बुधवार |
पूजा/अर्चन के अलावा स्पर्श वर्जित |
बुध ग्रह और व्रत नियम अनुसार |
|
एकादशी |
व्रत में फलाहार/पूजा हेतु छोड़कर अन्य समय स्पर्श वर्जित |
शास्त्र-सिद्ध, पाप नष्टि हेतु उचित नहीं |
🌿 तिथि अनुसार भोजन और तुलसी नियम – शास्त्रीय चार्ट
|
तिथि / दिन |
वर्जित भोजन / सामग्री |
उपयुक्त फलाहार / भोजन |
तुलसी स्पर्श |
शास्त्रीय प्रमाण / श्लोक |
अर्थ |
|
एकादशी |
सभी अनाज (चावल, गेहूं, जौ, मक्का, बाजरा, रागी), खिचड़ी, पोहा, दलिया, तैलीय और मसालेदार व्यंजन |
फल (केला, सेव, अमरूद, खजूर), दूध, दही, घी, हल्का उपमा, सब्जियाँ, मेवे (बादाम, काजू, किशमिश) |
पूजा/व्रत हेतु स्पर्श उचित, अन्य समय वर्जित |
पद्म पुराण, उत्तर खंड: |
एकादशी तिथि में अनाज वर्जित; फल, दूध, दही, घी से व्रत फलदायक |
|
रविवार |
कोई अनाज वर्जित नहीं, पर तुलसी बिना पूजा/अर्चन स्पर्श न करें |
सात्त्विक फलाहार, दूध/दही, हल्की शाकाहारी सब्जियाँ |
तुलसी स्पर्श वर्जित (पूजा/अर्चन हेतु छोड़कर) |
पद्म पुराण, उत्तर खंड: |
रविवार को तुलसी को बिना पूजा/अर्चन स्पर्श करना वर्जित; सूर्य ग्रह के प्रभाव हेतु |
|
बुधवार |
बिना पूजा के तुलसी स्पर्श वर्जित |
सात्त्विक फलाहार, दूध/दही, हल्की सब्जी |
तुलसी स्पर्श वर्जित (पूजा/अर्चन हेतु छोड़कर) |
विष्णु पुराण 6/9/7: |
बुधवार को तुलसी वृक्ष को बिना उद्देश्य स्पर्श करना दोषकारी; पूजा में लाभकारी |
|
अन्य सप्ताहिक दिन |
सामान्य सात्त्विक भोजन, तैलीय और अत्यधिक मसालेदार भोजन वर्जित |
फल, दूध/दही, हल्की शाकाहारी भोजन |
तुलसी स्पर्श: शुभ, मन और हाथ शुद्ध होने पर |
ब्राह्मवैवर्त पुराण 2/7: |
अन्य दिन तुलसी स्पर्श फलदायक, सात्त्विक मन और शुद्ध हाथ आवश्यक |
🔹 चार्ट नोट्स:
- एकादशी
- व्रत हो या न हो, अनाज पूर्ण वर्जित।
- फलाहार + दूध/दही + हल्का सात्त्विक भोजन श्रेष्ठ।
- तुलसी नियम
- रविवार, बुधवार, एकादशी: बिना पूजा/अर्चन तुलसी स्पर्श वर्जित।
- अन्य दिन: सात्त्विक उद्देश्य और शुद्ध मन से स्पर्श लाभकारी।
- फलाहार / सात्त्विक भोजन
- केला, सेव, अमरूद, खजूर, नारियल
- हल्का उपमा, शाकाहारी सब्जियाँ
- दूध, दही, घी
- मेवे (बादाम, काजू, किशमिश)
- वर्जित भोजन
- चावल, गेहूं, जौ, मक्का, बाजरा, रागी
- खिचड़ी, पोहा, दलिया
- तैलीय और मसालेदार व्यंजन
- सप्ताहिक पालन
- पूजा / व्रत के समय प्रातः ब्राह्म मुहूर्त या संध्या श्रेष्ठ
- तुलसी अर्पण और नाम-स्मरण फलदायक
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