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श्राद्ध कर्म दैनिक तर्पण(15 दिन जल,तिल एवं जौ)VIDHI MANTR

 

-दैनिक तर्पण मन्त्र

विशेष ध्यातव्य- गया के पश्चात् भी पितृ पक्ष में 15 दिन जल,तिल एवं जौ से जल पितरों ,ऋषि एवं  देवताओं को दैनिक देना आवश्यक है,कवक पिंड दान गया श्राद्ध कर्म के पश्चात् आवश्यक  नहीं होता है,

 


आवाहन : दोनों हाथों की अनामिका (छोटी तथा बड़ी उँगलियों के बीच की उंगली) में कुश (विशेष घास) की पवित्री (उंगली में लपेटकर दोनों सिरे ऐंठकर अंगूठी की तरह छल्ला) पहनकर, बाएं कंधे पर सफेद वस्त्र डालकर  दोनों हाथ जोड़कर अपने पूर्वजों को निम्न मन्त्र से आमंत्रित करें 
 :

'ॐ आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम'  
ॐ हे पितरों! पधारिये .



निम्न में से प्रत्येक को 3 बार किसी पवित्र नदी, तालाब, झील के शुद्ध जल में थोडा सा दूध, तिल तथा जौ मिला कर जलांजलि अर्पित करें। 
पिता हेतु  -: 
(गोत्र  नाम) गोत्रे अस्मत पिता ,

पिता का नाम शर्मा वसुरूपस्य तृप्तप्यतम इदं तिलोदकम

तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः तस्मै( गोत्र wale  मेरे पिता श्री वसुरूप में तिल तथा पवित्र जल ग्रहण कर तृप्त हों। 

 स्वधा नमः।


 ...........pitamah-

तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।
रूद्र  रूपस्य तृप्तप्यतम इदं तिलोदकम तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।
 ...........


पिता के नाम के स्थान पर पितामाह का नाम लें 

 माता हेतु  तर्पण -
(गोत्र नाम) गोत्रे अस्मन्माता (माता का नाम) देवी वसुरूपस्य तृप्तप्यतम इदं तिलोदकम तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।
 ...........
गोत्र की मेरी माता श्रीमती ....... देवी वसुरूप में तिल तथा पवित्र जल ग्रहण कर तृप्त हों। तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।

पितृ विसर्जन दिवस: आश्विन पितृ पक्ष अमावस्या -

 

दक्षिण दिशा में 14 बार अर्पित करें 
उत्तर दिशा में 7 बार तथा

जलांजलि पूर्व दिशा में 16 बार,

 -पितृ तर्पण विधि:

 पितरों का तर्पण करने के पूर्व ,उनका आवाहन करे - मन्त्र -

ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलान्जलिम ।

 

-तिल जल और जौ के साथ तीन-तीन जलान्जलियां दें -
(
पिता के लिये)
अमुकगोत्रः अस्मत्पिता अमुक (नाम) शर्मा वसुरूपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः ।
(
माता के लिये)
अमुकगोत्रा अस्मन्माता अमुकी (नाम) देवी वसुरूपा तृप्यताम इदं ,

तिलोदकं तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः ।.

श्राद्ध:

ग्रहस्थ जीवन में पितर (पूर्वज) प्रथम पूज्य है। सूर्य ग्रह स्वधा के द्वारा पूर्वजो का (पितरा) पोषण करते है।

मनुष्यानो स्नेह स्वधया च पितृ नपि।

सूर्य की सुषम्न किरण चंद्र ग्रह की चांदनी प्रदान करती है। अमावस्या चंद्र की किरणो से निकलने वाली स्वधा को पी कर एक माह के लिये स्वस्थ / संतुष्ट हो जाते है।

निःसृत तदभावस्या गमस्तिम्यः स्वधामृतय मासतृप्तिम वाप्यगमया पितरः सति निर्वृता।

वामनपुराण

पितृ चंद्रमा की सुधा नग्मक कला को पीते है।

पितर पूजा का पर्व क्रम श्राद्र

 मत्स्य पुराण: (14 अध्याय): ब्राहस्थो को देवपूजा से पूर्व पितर पूजा करना चाहिए।

पितर - पूर्वज मनुष्यो, देवो, ऋषियो के होेते है।

यथा मारीच पुत्र देवताओ के पितर कहलाए।

स्वधा से उत्पन्न

सोमपथ लोक में देव पितर रहते है। देवषितर अग्निवात नाम से प्रसिद्ध है।

अमावस्या पितरौ की पूजा:

देव पितरो की मानस कन्या अच्छोदा है।

अमावसु नामक पितर पर मोहित होने के कारण योग भ्रष्ट होकर अच्छोद पृथ्वी लोक पर गिर गयी। अमावसु धेर्य के कारण पथभ्रष्ट नहीं हुआ अंतः वह तिथि अमावस्या कहलायी।

अमावस्या पितरो की प्रिय तिथि है इस दिन पितरो को दिया दान श्रेष्ठ फलदायी है।

पिंड एवं हाथ से दर्प्रण दोनो हाथ से करना चाहिए।

स्वधा से उत्पन्न मानस पितर (कन्या नर्मदा नदी)

प्रथम तर्पण श्राद्ध में अग्नि चंद्र व यमराज को प्रथम दर्पण दिया जाता है।

समय - दिन के तीसरे भाग अर्थात अपान्ह समय पित श्राद्ध / कर्म दान करना उचित होता है।

ब्राद्ध अन्य अग्नि में छोडा जाता है।

दिन के 15 भाग (सूर्योदय से भूपति के घंटो को 15 से विभाजित को भाग दिन का हो वह कुतुप कहलाता है। श्राद्ध कार्य हेतु श्रेष्ठ)

पितर स्थान - तीर्थ अजाकर्ण, अश्वकर्ण, गोशाला, जलाशयत्र समीप एवं आकाश पितर निवास है।

दक्षिण दिशा में मुंह कर पूजा दान तर्पण आदि पितरो का किया जाता है।

बलिप्रथा में - अश्व कर्ण, बकरी का कान

पितरो को प्रिय है।

पितृ तर्पण में आगे हाथ / बाए अंग जाने के बाए से दाहिने किया जाता है।

दर्म - कुश सामान्यतः पितृ कार्य मे कुशा कास तीक्ष्ण रोम वाले कुश मूंगज बल्बल शादवल का प्रयोग होता है।

श्राद्ध प्रकार (1) नित्य श्राद्ध अर्हय / आवाहन के बिना (अदेवी) श्राद्ध कार्य

(2) पार्वण श्राद्ध जो विशिष्ट पर्दो पर किया जावे।

(3) अन्वाहार्दक श्राद्ध केवल अमावस्या के श्राद्धकर्म में ब्राहम्ण को निमंत्रित करे।

निमंत्रण के कारण इनके शरीर में वायु रुप मंें पितरगण आते है।

 

निमंत्रित

ब्राहम्ण्धो को पिप्त मिश्रित जल देना चाहिए। इसके बाद पिंड अंश देवे।

निमंत्रित ब्राहम्णो से कहे (भोजन उपरांत)

अभिलाषा कथन / याचना हे पितरगण हमारे दाताओ की अभिवृद्धि है। वेदज्ञान, संतान, श्रद्धा की संख्या बढे। हमसे सब याचना करे हमे याचना न करना पडे।

आमंत्रित ब्राहम्ण तथास्तु कहकर आशीर्वाद दे।

श्राद्ध कर्म के पश्चात् –

पिंड गाय, , ब्राहम्ण, अग्नि .जल पक्षि को दे।

संतान की अभिलाषा –

 बीच वाले पिंड को  खाने से पूर्व याचना करे।

हे पितरगण वंश वृद्धि करने वाली संतान का मुझमे गर्भाधान करे।

पितृकर्म की समाप्ति के पश्चात वेश्वदेव का पूजन करे।

श्राद्ध कब करेः

(1)      : सूर्य जब भ्रमण करते हुए राशि –

 मकर, कर्क, तुला और मेष संक्राति की स्थिति में हो।

       सामान्यत: प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी / 15 जनवरी, 14 अप्रैल, 16 जुलाई अक्टूबर को (श्राद्ध सूर्य ग्रह के आधार पर) करे।

       क्योंकि सूर्य को श्राद्ध / पितर देव माना गया है।

(2)   तिथि के अनुसार - सामान्यत अमावस्या पूर्णिमा के दिन।

(3)   युगाारंभ:    हे शारदा - शुक्ल तृतीया (treta युगारंभ)

                     कार्तिक शुक्ल नवमी (सतयुग आरंभ)

                     माघ पूर्णिमा (द्वापर युग आरंभ)

                     श्रावण त्रयोदशी (कलियुग आरंभ)

                     इनमे श्राद्ध के अक्षय फल मिलते है।

(4)   मन्वन्तर - (6) आश्वनि नवमी (7) कार्तिक पूर्णिमा शुक्ल दशमी (1) चेत्र पूर्णिमा शुक्ल तृतीया (4) ज्येष्ठ पूर्णिमा (9) भाद्र शुक्ल (10) फाल्गुन अमावस्या तोष शुक्ल श्रावस शुक्ल अष्टमी आषाढ पूर्णिमा व दशमली आर्दा, रोहणी, मधा, नक्षत्र विशिष्ट करण।

LEKH SANKLIT-SABHAR 

 

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