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सौभाग्य,धन,ऋण मुक्ति, सुयोग्य वर -अश्वनी माह -शरद / रास पूनम-कथा लक्ष्मी मन्त्र-(शुभ मुहूर्त) -18:00-18:440;21:10-22:50; 23:15-12:05;01:10-01:50;पूर्णिमा उपवास के दिन चन्द्रोदय - 05:05 पी एम



 सौभाग्य,धन,ऋण मुक्ति, सुयोग्य वर -अश्वनी माह -शरद / रास पूनम                                                 
   
पंडित विजेंद्र कुमार तिवारी "ज्योतिष शिरोमणि "jyotish9999@gmail.com

शरद पूर्णिम क्यो ?-
प्रदोष कालीन पूर्णिमा होना अनिवार्य है ,जो कि 25अक्टूबर  को है|
कोजागर पूर्णिमा क्यों -?"
को जाग्रत" कौन जाग रहा है ? अश्वनी मास की पूर्णिमा को रात्रि जागरण किए जाने का उल्लेख लिंग पुराण में है रात्रि जागरण से एवं चंद्र पूजा से ईश्वर की प्राप्ति होती है|
इसे कोजागरी व्रत भी कहते हैं, क्योंकि इस रात्रि में जागरण करना एवं पूजा करना लक्ष्मी की श्रेष्ठ माना गया है।
पुराण के अनुसार एरावत हाथी पर स्थित इंद्र ,धन की देवी लक्ष्मी का चांदनी रात में पूजन करें एवं रात्रि जागरण करें।
निशीथम वरदा, लक्ष्मी: को जागर्तिती भाषणि ।
तस्मै वित्तं प्रयच्छामी अक्षै क्रिडां करोति या:।।

आधी रात को  वर देने वाली लक्ष्मी कहती हैं कि -कौन जागता है ,उसके लिए धन दूंगी ,। इस रात को चंद्रमा की पूजा (Chandra Puja) और महा निशीथ काल/निशिता काल (Maha Nisheeth Kaal) में माता लक्ष्मी की विशेष पूजा (Kojagari Lakshmi Puja) की जाती है
रात 11 बजकर 40 मिनिट से 12 बजकर 20 मिनिट तक है

कैसे प्रारम्भ ?महत्व उपादेयता- –
1-श्रीमद भगवत -द्वापर में भगवान् श्रीकृष्ण ने गोपिकाओ के अथाह अनुराग का मान रखने के लिए इस दिन चांदनी रात्रि में महारास आरम्भ किया था ,जिसमे तात्कालीन ऋषि,मनीषी,मुनि गोपिकाओं के भेष में महारास के समाहित हुए |चंद्र द्वारा अमृत वर्षा की गयी |
2-ऐश्वर्य याचना ,ऋण मुक्ति पर्व - धन देवी लक्ष्मी  का जन्म दिन मन जाता है |उनकी कृपा के लिए ,उनसे ऐश्वर्य याचना ,ऋण मुक्ति के लिए पुजाजैसे  श्री सूक्त,कनक धारा आदि का हवंन पाठ करना श्रेष्ठ होता है |

3- 

आरोग्यदायी एवं शुभ पर्व — शरद पूर्णिमा

1. रावण और शरद पूर्णिमा की चन्द्र-किरणें

पारंपरिक मान्यता के अनुसार, लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की रात्रि में दर्पण के माध्यम से चन्द्रमा की किरणों को अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। ऐसी मान्यता है कि इससे उसे पुनर्यौवन की शक्ति प्राप्त होती थी।

वर्ष की विशेष पूर्णिमा मानी जाने वाली इस रात्रि में चन्द्रमा की सोलह कलाओं और उसकी शीतल किरणों का विशेष महत्त्व बताया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं में इन किरणों को नेत्र-ज्योति तथा आरोग्य के लिए लाभकारी माना गया है।

महत्त्वपूर्ण सूचना: रावण से संबंधित इस कथन तथा चन्द्र-किरणों द्वारा नेत्र-ज्योति बढ़ने या अनेक रोगों के नाश होने के दावों की प्रामाणिक शास्त्रीय अथवा वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

2. निशीथ काल और आरोग्य

शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि के आसपास के समय को निशीथ काल कहा जाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, यह समय चन्द्र-आराधना, ध्यान, मंत्र-जप और आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष महत्त्व रखता है।

चन्द्रमा को देखते हुए 15 मिनट तक कोई औषधि लेने से निम्न रक्तचाप, अवसाद, उदर-रोग अथवा अस्थमा नियंत्रित होने का दावा प्रमाणित चिकित्सकीय तथ्य नहीं है। औषधि हमेशा चिकित्सक के निर्देशानुसार ही लेनी चाहिए।

3. चन्द्र-दोष शमन का पर्व

ज्योतिषीय मान्यताओं में शरद पूर्णिमा को चन्द्र-आराधना के लिए विशेष पर्व माना जाता है।

यदि जन्मकुंडली में चन्द्रमा छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, राहु के साथ हो, चन्द्रमा की अशुभ दशा चल रही हो अथवा चन्द्रमा वृश्चिक राशि में स्थित हो, तो इस दिन चन्द्रमा के मंत्र का जप या हवन करने की परंपरा प्रचलित है।

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, इस प्रकार की उपासना मानसिक शान्ति और चन्द्र-दोष के शमन के उद्देश्य से की जाती है। इससे वर्ष भर की सभी परेशानियाँ समाप्त होने की गारंटी नहीं दी जा सकती।

4. विवाह के लिए शुभ पर्व — कुमार पूर्णिमा

ओडिशा में शरद पूर्णिमा से संबंधित पर्व को कुमार पूर्णिमा कहा जाता है।

परंपरानुसार, अविवाहित कन्याएँ सुयोग्य जीवनसाथी की कामना से व्रत रखती हैं तथा चन्द्रदेव और भगवान कार्तिकेय की पूजा करती हैं।

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, चन्द्रमा के छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित होने अथवा राहु के साथ होने से संबंधित दोषों के शमन के लिए भी चन्द्र-आराधना की जाती है।

यह उपासना श्रद्धा, शुभकामना और आध्यात्मिक संकल्प का प्रतीक है; इसे विवाह या ज्योतिषीय दोषों के निवारण की निश्चित गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।


A Health-Giving and Auspicious Festival — Sharad Purnima

1. Ravana and the Moonlight of Sharad Purnima

According to a traditional belief, Ravana, the ruler of Lanka, used a mirror to direct the moonlight of Sharad Purnima night towards his navel. It is believed in this account that he thereby gained the power of rejuvenation.

This full-moon night is considered especially significant in traditional Hindu beliefs because of the Moon's sixteen kalas, or phases of completeness, and its soothing rays. Traditional accounts regard these rays as beneficial for eyesight and general well-being.

Important note: The account concerning Ravana, as well as claims that moonlight improves eyesight or cures numerous diseases, has not been established by reliable scriptural or scientific evidence.

2. Nishitha Kaal and Well-Being

The period around midnight is known as Nishitha Kaal. According to traditional belief, it is an especially significant time for lunar worship, meditation, mantra recitation and spiritual practice.

The claim that taking medication while looking at the Moon for 15 minutes can control low blood pressure, depression, abdominal disorders or asthma is not an established medical fact. Medication should always be taken according to a qualified healthcare professional's instructions.

3. A Festival for the Pacification of Lunar Afflictions

According to astrological traditions, Sharad Purnima is considered an auspicious occasion for worshipping Chandra, the Moon.

If the Moon is placed in the sixth, eighth or twelfth house of a birth chart, is conjunct Rahu, is undergoing an inauspicious planetary period, or is placed in Scorpio, some traditions recommend reciting lunar mantras or performing a havan on this day.

Within these astrological beliefs, such worship is undertaken with the intention of attaining mental peace and seeking relief from perceived lunar afflictions. It cannot be guaranteed to eliminate every difficulty throughout the year.

4. An Auspicious Festival for Marriage — Kumar Purnima

In Odisha, the festival associated with Sharad Purnima is known as Kumar Purnima.

According to tradition, unmarried girls observe a fast and worship Chandra, the Moon deity, and Lord Kartikeya, praying for a suitable life partner.

Some astrological traditions also recommend lunar worship to seek relief from perceived afflictions associated with the Moon's placement in the sixth, eighth or twelfth house, or its conjunction with Rahu.

This worship represents faith, auspicious wishes and spiritual resolve. It should not be regarded as a guaranteed remedy for marriage-related concerns or astrological afflictions.

६-नया अन्न गेहूं  /चावल से यञं करना चाहिए |इसके पश्चात ही नया अन्न भोजन में प्रयोग करना चाहिए |
7- "अमरित बार सइया  / पाय के  पुन्नी आय- सरदपुन्नी -छत्तीसगढ़ में बांस गाड़ कर रस्सी द्वारा कागज की बहुरंगी लालटेन प्रकाश हेतु बनाते थे  |जिसमे दीपक या छोटे बल्ब लगाने का प्रचलन ग्रामीण अंचल में था |"अमरित बार सइया  / पाय के  पुन्नी आय- सरदपुन्नी |" लोगन मन के ऐसा मानना है की लक्ष्मी द्वार द्वार घर -घर जाती हैं |जो जागता होता है उस पर धन कृपा करती हैं |
8-खीर का विशेष महत्व विज्ञान पर आधारित -दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति काशोषण करता है। चावल में स्टार्च के कारण यह प्रक्रिया आसान हो जाती है। ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आकाश में रखने की परम्परा एवं विधान निर्मित किया ।
श्वेत पदार्थ का विशेष महत्व है | चावल.दूध,मखाने,मिश्री ,काजू ,शक़्कर की खीर का भोग चंद्र को दिया जाता है खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है| रात्रि में चंद्र से निर्झरित रश्मियों से अमृत तुल्य आरोग्यद बिंदु की वर्षा खीर में  मिश्रित होती है|
क्या करे ?
1-तेज,ओज के लिए -कांसे के पात्र में घी दान करे |कल्याण्यार्थ-दोपहर पश्चात् आरती पूजा करे |
2-इष्टदेव को श्वेत वस्त्र पहना कर पूजा करे |खीर का भोग लगा कर रात्रि में अर्ध रात्रि के पश्चात् भोजन ग्रहण करे|
3-दीपक-महालक्ष्मी की पूजा एवं १०,१००,१००० दीपक प्रज्वलित कर मंदिर,द्वार,5दीपक पूजा स्थान,पीपल ,तुलसी एवं  बरगद वृक्ष ,बगीचे ,चौराहे,घर की छत पर रखे |
4-प्रातः इंद्र की पूजा करे -ॐ इन्द्राय नम:|सर्व वाञ्छाम पूरय २ नम:|8, 28 या 108 जप/ आहुति दे |
लक्ष्मी मन्त्र-(शुभ मुहूर्त) -18:00-18:440;21:10-22:50; 23:15-12:05;01:10-01:50
1-मंत्र- ॐ श्रीं श्रीये नमK|
2-मंत्र-  ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमK|
3-मंत्र- ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ|
4-ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ,ॐ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं ,सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्री ॐ | 
5-ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी नमK|
6-ऐं ह्रीं श्रीं अष्टलक्ष्मीयै ह्रीं सिद्धये मम गृहे आगच्छागच्छ नमः स्वाहा |
(सन्दर्भ-लिंगपुराण,दीपिका,कृत्यनिर्णयामृत,श्रीमद्भागवत  |)
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शरद पूर्णिमा : तिथि और पूजा-समय अलग से

1. पूर्णिमा तिथि

  • 2. पूजा के शुभ समय

चन्द्रमा को अर्घ्य देने का समय: शाम लगभग 6:15 बजे चन्द्रोदय के बाद।

लक्ष्मी पूजन: सूर्यास्त के बाद, लगभग शाम 5:56 बजे से पूजा कर सकते हैं।

प्रदोष काल: शाम 5:56 बजे से रात 8:23 बजे तक।

कोजागरी लक्ष्मी पूजा का निशीथ मुहूर्त: रात 11:39 बजे से  रात 12:28 बजे तक।

3. खीर कब बनाएं और चाँदनी में कब रखें?

*- शाम को खीर बनाकर भगवान को भोग लगाएँ। चन्द्रोदय के बाद खीर को स्वच्छ पात्र में कुछ समय के लिए चन्द्रमा की रोशनी में रख सकते हैं।

खीर को पूरी रात बाहर रखना आवश्यक नहीं है। दूध और चावल की खीर को दूषित होने से बचाने के लिए कुछ समय बाद फ्रिज में रख दें।

4. अगले दिन क्या करें?

26 अक्टूबर को सुबह पूर्णिमा तिथि समाप्त होने से पहले स्नान, दान और अपनी पारिवारिक परम्परा के अनुसार पूर्णिमा से जुड़े धार्मिक कार्य कर सकते हैं। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि कर लें।

मेरी सलाह: सामान्य पूजा के लिए 25 अक्टूबर को चन्द्रोदय के बाद लक्ष्मी पूजन, चन्द्रमा को अर्घ्य और खीर का भोग करें। यदि आप विशेष कोजागरी व्रत करते हैं, तो मध्यरात्रि के निशीथ मुहूर्त में भी पूजा कर सकते हैं।**********

शरद पूर्णिमा 

धार्मिक महत्त्व, शास्त्रीय संदर्भ, भारत की परम्पराएँ, व्रत-कथा, पूजा-विधि, चन्द्रमा को अर्घ्य तथा खीर बनाने की विधि

1. शरद पूर्णिमा कब है और पूर्णिमा तिथि कब से शुरू होगी?

 हिंदू पंचांग के अनुसार यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है। इसे शरद पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा और कौमुदी पूर्णिमा जैसे नामों से भी जाना जाता है।

इस पर्व का धार्मिक महत्त्व केवल पूर्णिमा तिथि तक सीमित नहीं है। यह भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला, माता लक्ष्मी की आराधना, चन्द्रमा की पूजा और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है।

2. शरद पूर्णिमा की शुरुआत कब और कैसे हुई?

शरद पूर्णिमा किस ऐतिहासिक वर्ष में पहली बार मनाई गई, इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसे किसी एक व्यक्ति द्वारा शुरू किया गया पर्व कहना भी उचित नहीं होगा।

यह उत्सव भारतीय चन्द्र-आधारित पंचांग, धार्मिक परम्पराओं, पुराणों में वर्णित प्रसंगों और क्षेत्रीय लोकाचार के विकास से जुड़ा है।

शरद ऋतु में आकाश सामान्यतः साफ होने लगता है और पूर्ण चन्द्रमा विशेष रूप से आकर्षक दिखाई देता है। भारतीय संस्कृति में चन्द्रमा को शीतलता, शान्ति, मन और सौम्यता का प्रतीक माना गया है। इस प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ धार्मिक मान्यताएँ जुड़ने से शरद पूर्णिमा का विशेष स्थान बना।

इस पर्व के तीन प्रमुख धार्मिक पक्ष हैं। पहला, ब्रज परम्परा में भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला। दूसरा, कोजागरी परम्परा में माता लक्ष्मी की आराधना और रात्रि-जागरण। तीसरा, चन्द्रमा को अर्घ्य देना और खीर बनाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करना।

3. शरद पूर्णिमा का वर्णन किन धार्मिक ग्रंथों में मिलता है?

शरद पूर्णिमा से जुड़ी सभी मान्यताओं का वर्णन किसी एक ग्रंथ में एक ही स्थान पर नहीं मिलता। इसलिए श्रीकृष्ण की रासलीला, कोजागरी व्रत और प्रचलित लोककथाओं को अलग-अलग समझना चाहिए।

श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय 29 से 33 में भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का वर्णन मिलता है।

इन अध्यायों में शरद ऋतु की सुन्दर रात्रि, भगवान श्रीकृष्ण की वंशी, गोपियों का प्रेम और रासलीला का आध्यात्मिक प्रसंग आता है। ब्रज की धार्मिक परम्परा इस लीला को शरद पूर्णिमा से जोड़ती है।

इस प्रसंग का आध्यात्मिक संदेश भगवान के प्रति अनन्य प्रेम, समर्पण और भक्ति है। वैष्णव परम्परा में रासलीला को जीवात्मा और परमात्मा के दिव्य प्रेम के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि भागवत पुराण में रासलीला का विस्तृत वर्णन है, लेकिन आज प्रचलित प्रत्येक स्थानीय रस्म का वर्णन उन्हीं अध्यायों में होना आवश्यक नहीं है।

लिङ्ग पुराण और निर्णयसिन्धु

कोजागरी व्रत से संबंधित धार्मिक संदर्भ धर्मनिबन्ध ग्रंथों में भी मिलते हैं। निर्णयसिन्धु जैसे ग्रंथों में कोजागरी परम्परा से जुड़े उद्धरणों का उल्लेख किया जाता है।

इस परम्परा में पूर्णिमा की रात्रि में जागरण, माता लक्ष्मी की पूजा और समृद्धि की कामना का महत्त्व बताया जाता है। किसी विशेष श्लोक का शाब्दिक उद्धरण देने से पहले उसके मूल पाठ और संस्करण की पुष्टि करना आवश्यक है।

व्रतराज और सनत्कुमार संहिता का संदर्भ

कोजागरी व्रत की कुछ प्रचलित कथाओं का संदर्भ व्रतराज जैसे व्रत-संग्रहों में सनत्कुमार संहिता के उल्लेख के साथ मिलता है। इनमें निर्धन व्यक्ति, व्रत और देवी लक्ष्मी की कृपा से जुड़ी कथा-परम्पराएँ बताई जाती हैं।

हालाँकि, ऐसे संदर्भों को मूल ग्रंथ के प्रमाणित पाठ से जाँचे बिना किसी निश्चित अध्याय का शाब्दिक उद्धरण नहीं मानना चाहिए।

शरद पूर्णिमा की लोक-व्रत कथा

साहूकार की दो बेटियों की कथा शरद पूर्णिमा पर कई स्थानों में सुनाई जाती है। इसमें व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने का संदेश मिलता है।

यह एक प्रचलित लोक-व्रत कथा है। इसके विभिन्न रूप मिलते हैं। इसे बिना प्रमाण किसी वेद, उपनिषद या पुराण का मूल प्रसंग बताना उचित नहीं है।

4. शरद पूर्णिमा की धार्मिक मान्यताएँ

हिंदू धार्मिक परम्परा में शरद पूर्णिमा को पूर्णता, शान्ति, भक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला के कारण यह तिथि ब्रज के वैष्णव भक्तों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। कोजागरी परम्परा में माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है। चन्द्रमा को अर्घ्य देकर मन की शान्ति और परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।

लोकमान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की चाँदनी अमृततुल्य मानी जाती है। इसी विश्वास से खीर या दूध को चन्द्रमा की रोशनी में रखने की परम्परा प्रचलित हुई।

यह धार्मिक मान्यता है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं। चन्द्रमा की रोशनी में रखने से खीर में अमृत उत्पन्न होने या उसके औषधीय गुण बढ़ने का विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

5. भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा की परम्पराएँ

ब्रज क्षेत्र: मथुरा और वृन्दावन

उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृन्दावन और ब्रज क्षेत्र में शरद पूर्णिमा का विशेष सम्बन्ध भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से है।

इस अवसर पर मंदिरों में विशेष श्रृंगार, भजन, संकीर्तन और धार्मिक आयोजन होते हैं। भक्त भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का स्मरण करते हैं और उन्हें विशेष भोग अर्पित करते हैं।

ब्रज की परम्परा में यह पर्व भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण का उत्सव है।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश

उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा पर लक्ष्मी पूजन, चन्द्रमा को अर्घ्य, खीर बनाना और व्रत-कथा सुनना प्रचलित है।

परिवार के सदस्य एक साथ पूजा करते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। कुछ परिवार रात्रि में जागरण भी करते हैं।

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में यह पर्व कोजागरी लक्ष्मी पूजा के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

घर में माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। कई परिवार घर के आँगन में अल्पना बनाते हैं, दीपक जलाते हैं और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

कोजागरी का सम्बन्ध रात्रि-जागरण की धार्मिक मान्यता से भी है।

ओडिशा

ओडिशा में आश्विन पूर्णिमा के आसपास कुमार पूर्णिमा की परम्परा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसमें युवा लड़कियाँ चन्द्रमा की पूजा करती हैं और अच्छे जीवनसाथी तथा सुखमय जीवन की कामना से जुड़े रीति-रिवाज निभाती हैं।

स्थानीय परम्पराओं में पूजा, चन्द्र-दर्शन और पारिवारिक उत्सव का महत्त्व है।

गुजरात

गुजरात में शरद पूर्णिमा को शरद पूनम कहा जाता है। इस अवसर पर गरबा, रास, भजन और सामूहिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं।

दूध-पोहा और अन्य पारम्परिक खाद्य पदार्थों का सेवन भी कई परिवारों में प्रचलित है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में इसे कोजागिरी पूर्णिमा कहा जाता है। इस अवसर पर मसाला दूध तैयार करने और परिवार या मित्रों के साथ रात्रि में उसका सेवन करने की परम्परा प्रचलित है।

कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत और सामूहिक आयोजन भी होते हैं।

बिहार और मिथिला

बिहार तथा मिथिला क्षेत्र में कोजागरा नाम से जुड़ी विवाह-परम्पराएँ प्रसिद्ध हैं। कुछ समुदायों में नवविवाहित दूल्हे और उनके परिवार से जुड़ी रस्में निभाई जाती हैं। मखाना, मिठाई, पान और अन्य पारम्परिक वस्तुओं का विशेष स्थान हो सकता है।

इन परम्पराओं का स्वरूप परिवार, समुदाय और स्थानीय रीति के अनुसार बदलता है।

6. शरद पूर्णिमा की पहली प्रमुख कथा: भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का विस्तृत वर्णन मिलता है।

शरद ऋतु की एक सुन्दर रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी वंशी बजाई। उसकी मधुर ध्वनि से आकर्षित होकर गोपियाँ उनके पास पहुँचीं। श्रीकृष्ण ने उनसे संवाद किया और उनकी भक्ति की परीक्षा ली। इसके बाद दिव्य रासलीला का वर्णन आता है।

इस प्रसंग को ब्रज की धार्मिक परम्परा शरद पूर्णिमा से जोड़ती है। रासलीला का आध्यात्मिक अर्थ केवल नृत्य या उत्सव नहीं है। इसे भगवान के प्रति अनन्य प्रेम, अहंकार के त्याग और आत्मसमर्पण के रूप में भी समझा जाता है।

इस कथा का संदेश है कि सच्ची भक्ति में स्वार्थ, अहंकार और दिखावे की जगह प्रेम, निष्ठा तथा समर्पण का महत्त्व होता है।

7. शरद पूर्णिमा की दूसरी कथा: साहूकार की दो बेटियाँ

लोक-प्रचलित कथा के अनुसार एक साहूकार की दो बेटियाँ थीं। दोनों पूर्णिमा का व्रत करती थीं, लेकिन छोटी बेटी व्रत के नियमों को पूरी तरह नहीं निभाती थी।

विवाह के बाद छोटी बेटी को सन्तान से संबंधित दुःखों का सामना करना पड़ा। कथा के विभिन्न संस्करणों में बताया जाता है कि उसे व्रत की विधि और श्रद्धा के महत्त्व का बोध हुआ।

इसके बाद उसने पूरे विश्वास और निष्ठा से व्रत किया तथा देवी-देवताओं की पूजा की। कथा के प्रचलित रूपों में उसके जीवन में सुख लौटने और परिवार के दुःख दूर होने का वर्णन मिलता है।

इस कथा का संदेश श्रद्धा, संयम और संकल्प के प्रति निष्ठा है।

यह एक लोक-प्रचलित धार्मिक कथा है। इसके अलग-अलग संस्करण हैं, इसलिए इसे ऐतिहासिक घटना या किसी एक पुराण का प्रमाणित मूल अध्याय नहीं समझना चाहिए।

8. शरद पूर्णिमा पर सुबह से रात तक क्या करना चाहिए?

सुबह की तैयारी

सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। घर के पूजा-स्थान की सफाई करें। यदि आप व्रत रखना चाहते हैं, तो अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार संकल्प लें।

व्रत रखना अनिवार्य नहीं है। बच्चे, वृद्ध, गर्भवती महिलाएँ, बीमार व्यक्ति और नियमित दवाएँ लेने वाले लोग अपनी आवश्यकताओं के अनुसार भोजन और पानी लेते रहें।

पूजा की सामग्री

पूजा के लिए माता लक्ष्मी या भगवान विष्णु का चित्र, भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र, दीपक, घी, धूप, फूल, अक्षत, रोली, चन्दन, जल, फल, मिठाई और खीर रख सकते हैं।

चन्द्रमा को अर्घ्य देने के लिए स्वच्छ जल का पात्र रखें। सामग्री की लम्बी सूची होना अनिवार्य नहीं है। श्रद्धा और स्वच्छता के साथ उपलब्ध वस्तुओं से पूजा की जा सकती है।

शाम की लक्ष्मी पूजा

शाम को पूजा-स्थान साफ करके दीपक जलाएँ। माता लक्ष्मी को फूल और अक्षत अर्पित करें। मिठाई या फल का भोग लगाएँ।

इसके बाद माता लक्ष्मी का ध्यान करें। इच्छानुसार श्रीसूक्त, लक्ष्मी चालीसा या लक्ष्मी स्तुति का पाठ करें।

आप यह मंत्र जप सकते हैं:

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।

इस मंत्र का 11, 21 या 108 बार जप अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं। किसी एक निश्चित संख्या को सभी के लिए अनिवार्य नहीं माना जाना चाहिए।

इसके बाद माता लक्ष्मी की आरती करें और परिवार के सुख, शान्ति, सद्बुद्धि तथा समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।

चन्द्रमा को अर्घ्य देने की विधि

चन्द्रोदय के बाद चन्द्रमा के दर्शन करें। एक स्वच्छ पात्र में जल लें। चाहें तो उसमें कुछ अक्षत डाल सकते हैं।

चन्द्रमा की ओर मुख करके श्रद्धापूर्वक अर्घ्य अर्पित करें। मन को शान्त रखते हुए परिवार के कल्याण और जीवन में सुख-शान्ति की प्रार्थना करें।

आप यह मंत्र बोल सकते हैं:

ॐ सोम सोमाय नमः।

कुछ परिवार अर्घ्य के जल में थोड़ा दूध मिलाते हैं। यह स्थानीय या पारिवारिक परम्परा है, सभी के लिए अनिवार्य नियम नहीं।

9. शरद पूर्णिमा की खीर बनाने की पूरी विधि

खीर बनाने के लिए एक लीटर दूध, लगभग 40 से 50 ग्राम चावल, स्वादानुसार चीनी या मिश्री, थोड़ी इलायची और इच्छानुसार बादाम या काजू ले सकते हैं।

सबसे पहले चावल को अच्छी तरह धोकर कुछ देर भिगो दें। फिर दूध को उबालें और उसमें चावल डाल दें। धीमी आँच पर पकाएँ, बीच-बीच में चलाते रहें ताकि दूध तले में न लगे।

जब चावल अच्छी तरह पक जाएँ और दूध गाढ़ा होने लगे, तब स्वादानुसार चीनी या मिश्री डालें। इसके बाद इलायची और इच्छानुसार मेवे मिलाएँ।

खीर तैयार होने पर उसे थोड़ा ठंडा होने दें। फिर साफ पात्र में निकालकर भगवान को भोग लगाएँ।

आप अपनी पारिवारिक परम्परा के अनुसार मखाने की खीर, दूध-पोहा या कोई अन्य सात्त्विक प्रसाद भी बना सकते हैं।

10. खीर को चन्द्रमा की रोशनी में कैसे रखें?

परम्परा के अनुसार खीर को चन्द्रमा की रोशनी में रखने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

चन्द्रोदय के बाद खीर को स्वच्छ पात्र में रखें और ऐसी सुरक्षित जगह पर रखें जहाँ चन्द्रमा की रोशनी आती हो। उसे धूल और कीड़ों से बचाने के लिए साफ, खाद्य-सुरक्षित महीन जाली से ढक सकते हैं।

कुछ समय बाद खीर को वापस ले आएँ। उसके बाद उसे सुरक्षित तापमान पर रखें और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।

ध्यान रखें कि दूध और पके चावल की खीर को पूरी रात सामान्य तापमान पर छोड़ना सुरक्षित नहीं हो सकता। चाँदनी में रखने से खीर रोगाणुरहित नहीं हो जाती। खीर को थोड़ी देर चाँदनी में रखने के बाद फ्रिज में रखना अधिक सुरक्षित है। यदि वह कई घंटों तक गर्म वातावरण में बाहर रही हो, तो उसे खाने से बचें।

11. क्या शरद पूर्णिमा की रात चन्द्रमा की किरणों से अमृत बरसता है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस रात्रि में चन्द्रमा की सोलह कलाएँ पूर्ण होती हैं और उसकी किरणों को अमृततुल्य माना जाता है। इसी विश्वास से खीर को चाँदनी में रखने की परम्परा जुड़ी है।

यह भारतीय धार्मिक और लोक-संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण मान्यता है।

हालाँकि, वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा प्रमाण नहीं है कि चन्द्रमा की रोशनी से खीर में अमृत उत्पन्न होता है या उसके औषधीय गुण बढ़ जाते हैं।

इसलिए इस परम्परा को भक्ति, प्रकृति के प्रति सम्मान और प्रसाद के धार्मिक महत्त्व के रूप में अपना सकते हैं। इसे किसी बीमारी के उपचार का विकल्प नहीं मानना चाहिए।

12. कोजागरी का अर्थ क्या है और रात्रि-जागरण क्यों किया जाता है?

कोजागरी शब्द को संस्कृत के प्रश्न ‘को जागर्ति?’ से जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ है ‘कौन जाग रहा है?’

धार्मिक मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि में जागरण करने वाले भक्तों पर माता लक्ष्मी की कृपा होती है। इस विश्वास के कारण रात्रि में लक्ष्मी पूजा, भजन, कीर्तन और धार्मिक पाठ करने की परम्परा है।

रात्रि में आप माता लक्ष्मी की आरती कर सकते हैं, भगवान श्रीकृष्ण के भजन गा सकते हैं, श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध का पाठ कर सकते हैं या शरद पूर्णिमा की व्रत-कथा सुन सकते हैं।

ध्यान और मंत्र-जप भी कर सकते हैं। जरूरतमंद लोगों को भोजन या अन्य सहायता देना भी धार्मिक भावना के अनुरूप एक अच्छा कार्य है।

रातभर जागना सभी के लिए अनिवार्य नहीं है। अपनी सेहत और आवश्यकताओं के अनुसार विश्राम करना उचित है।

13. शरद पूर्णिमा की रात का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?लक्ष्मी मन्त्र-(शुभ मुहूर्त) -18:00-18:440;21:10-22:50; 23:15-12:05;01:10-01:50

शरद पूर्णिमा की पूजा के लिए समय का चुनाव आपके धार्मिक उद्देश्य के अनुसार किया जा सकता है।

चन्द्रमा को अर्घ्य देने के लिए चन्द्रोदय के बाद का समय उपयुक्त है। सामान्य लक्ष्मी पूजा सूर्यास्त के बाद की जा सकती है। कोजागरी की विशेष पूजा करने वाले भक्त परम्परा के अनुसार निशीथ काल, अर्थात मध्यरात्रि के आसपास, पूजा कर सकते हैं।

ये समय स्थान और पंचांग के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए विशेष मुहूर्त का पालन करने वाले लोग अपने नगर के विश्वसनीय पंचांग से पुष्टि कर लें।

यदि आप केवल एक सरल पूजा करना चाहते हैं, तो चन्द्रोदय के बाद चन्द्रमा को अर्घ्य दें, लक्ष्मी पूजन करें, खीर का भोग लगाएँ और प्रसाद बाँटें।

14. शरद पूर्णिमा पर क्या नहीं करना चाहिए?

इस दिन पूजा और व्रत को लेकर अनावश्यक विवाद नहीं करना चाहिए। दूसरों की श्रद्धा का अपमान नहीं करना चाहिए। व्रत के नाम पर स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए और पूजा के नाम पर अनावश्यक खर्च नहीं करना चाहिए।

खीर या दूध को ऐसी जगह पर न रखें जहाँ उसके दूषित होने की आशंका हो। चन्द्रमा की किरणों से रोग ठीक होने के दावों पर भरोसा करके आवश्यक चिकित्सा नहीं छोड़नी चाहिए।

बाल काटना, नाखून काटना या कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करना जैसी बातें विभिन्न परिवारों और समुदायों की मान्यताओं पर निर्भर करती हैं। इन्हें सभी हिंदुओं पर लागू होने वाले सार्वभौमिक नियम नहीं मानना चाहिए।

15. शरद पूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश

शरद पूर्णिमा हमें भक्ति, मन की शान्ति, पारिवारिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है।

भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला प्रेम और समर्पण की प्रेरणा देती है। माता लक्ष्मी की आराधना हमें समृद्धि के साथ सद्बुद्धि, संतोष और सद्कर्मों का महत्त्व समझाती है। चन्द्रमा को अर्घ्य देना शान्त मन से प्रार्थना करने का अवसर है।

इस पर्व का सार केवल खीर, चाँदनी या रात्रि-जागरण में नहीं है। इसका वास्तविक आध्यात्मिक उद्देश्य अपने विचारों को शुद्ध करना, परिवार में प्रेम बनाए रखना, दूसरों की सहायता करना और जीवन में सदाचार अपनाना है।

यदि आप शरद पूर्णिमा पर केवल तीन कार्य करना चाहते हैं, तो श्रद्धापूर्वक माता लक्ष्मी का पूजन करें, चन्द्रमा को अर्घ्य दें और खीर का भोग लगाकर प्रसाद बाँटें।

इसी प्रकार शरद पूर्णिमा को एक सरल, सात्त्विक, धार्मिक और पारिवारिक उत्सव के रूप में मनाया जा सकता है।

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