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14.01.2026-मकर संक्रान्ति 2026

 🌸 मकर संक्रान्ति 2026

Makar Sankranti 2026

बुधवार | Wednesday
📅 14 जनवरी 2026 | 14 January 2026


☀️ संक्रान्ति का क्षण | Sankranti Moment

⏰ 03:13 PM

महा-पुण्य काल | Maha Punya Kaal
🕰 03:13 PM – 05:07 PM


☀️ मकर संक्रान्ति — शुद्ध पुण्यकाल निर्णय

संक्रान्ति क्षण
15:13 (3:13 PM)


पुण्यकाल (Correct)

➡️ प्रातः 08:45 से सूर्यास्त पूर्व तक

📖 धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु

उदये नास्ति चेत् पुण्यं, अष्टघट्यां ततः परम्।

👉 जब संक्रान्ति सूर्योदय के बाद हो, तब सूर्योदय से पूर्व 8 घटी (≈ 3 घं 12 मि) पहले से सूर्यास्त तक पुण्यकाल माना जाता है।


🌟 महा-पुण्य काल (BEST)

➡️ संक्रान्ति क्षण से
15:13 से लगभग 16:01 तक

📖 धर्मसिन्धु

संक्रान्तेः परतः पुण्यं महापुण्यं प्रकीर्तितम्।


🛕 पूजा का समय

08:45 के बाद
विशेषतः 15:13 के बाद (महा-पुण्य काल)
❌ रात्रि वर्जित


🎁 दान का समय

🥇 महा-पुण्य काल (15:13–16:01)
🥈 पुण्यकाल (08:45–सूर्यास्त पूर्व)
❌ सूर्यास्त के बाद नहीं


✅ अंतिम सूत्र

08:45 से सूर्यास्त तक पुण्यकाल,
15:13 के बाद महा-पुण्य काल —

दान व पूजा का सर्वोत्तम समय।🌼 पर्व का आध्यात्मिक महत्व

Spiritual Significance

हिंदी
सूर्य का धनु से मकर राशि में प्रवेश उत्तरायण का आरम्भ है।
यह काल दान, स्नान, सूर्योपासना और शुभ कार्यों के लिए अत्यन्त पुण्यकारी माना गया है।

English
The Sun’s transition into Capricorn marks the beginning of Uttarayan,
an auspicious phase for charity, purification, worship, and new beginnings.


🛕 पूजा एवं स्नान विधि

Rituals & Worship

🔸 तिल एवं तेल मिश्रित जल से स्नान
🔸 ताँबे के पात्र से सूर्य को अर्घ्य
🔸 तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र का दान
🔸 “ॐ घृणि सूर्याय नमः” – 108 जप

तिल के 6 प्रयोग (Six Uses of Til)
स्नान • दान • भोजन • आहुति • तर्पण • उबटन


🌾 क्षेत्रीय उत्सव | Regional Celebrations

🇮🇳 भारत
• उत्तर भारत – मकर संक्रान्ति / खिचड़ी
• पंजाब–हरियाणा – लोहड़ी
• तमिलनाडु – पोंगल
• गुजरात – उत्तरायण
• असम – माघ बिहू
• बंगाल – पौष संक्रान्ति
• केरल – मकरविलक्कू

🌏 World
• Nepal – Maghe Sankranti
• Sri Lanka – Pongal
• Thailand – Songkran
• Myanmar – Thingyan


🐅 संक्रान्ति फल-संकेत (Highlights)

Quick Interpretation

व्याघ्र वाहन → शक्ति एवं साहस
पीत वस्त्र + पायस → समृद्धि
दक्षिण मुख → परिश्रम से सफलता
ईशान दृष्टि → आध्यात्मिक उन्नति
चाँदी पात्र → आर्थिक स्थिरता


🦂 वृश्चिक राशि – विशेष फल

For Scorpio Sign

✔ परिश्रम से सिद्धि
✔ गुप्त शत्रुओं पर विजय
✔ भूमि-वाहन लाभ योग
⚠ क्रोध व पित्त दोष पर नियंत्रण आवश्यक

उपाय
• रविवार सूर्य अर्घ्य
• तिल-गुड़ दान
• सूर्य मंत्र जप


🍲 पारंपरिक व्यंजन | Festive Foods

• तिल-गुड़ लड्डू
• खिचड़ी
• पोंगल / पायसम
• पूरन पोली
• चिक्की

☀️ मकर संक्रान्ति : ग्रंथ, श्लोक, मंत्र एवं विधि


📜 1. शास्त्रीय आधार (Granth Reference)

📖 भविष्यपुराण

उत्तरायणे दक्षिणायने च संक्रान्तौ व्रतं चरेत्।

अर्थ
सूर्य के उत्तरायण अथवा दक्षिणायन में प्रवेश के दिन संक्रान्ति व्रत अवश्य करना चाहिए।


📖 विष्णु धर्मसूत्र

तिलैः स्नानं तिलैर्दानं तिलैर्भोज्यं तिलैर्हविः।
तिलैस्तर्पणमेव स्यात् षट्कर्माणि तिलैः स्मृताः॥

अर्थ
तिल के द्वारा किए गए छः कर्म
स्नान, दान, भोजन, हवन, तर्पण और उबटन—अत्यन्त पुण्यदायक होते हैं।


☀️ 2. सूर्य के वैदिक नाम (Vedic Solar Names)

ऋग्वेद व पौराणिक परंपरा में 12 नाम

आदित्य, भास्कर, सूर्य, अर्क, भानु, दिवाकर,
स्वर्णरेता, मित्र, पूषा, त्वष्टा, सविता, विवस्वान

📌 फल
इन नामों का स्मरण करने से
👉 रोग शमन
👉 तेज वृद्धि
👉 पाप क्षय
👉 आयु व बल में वृद्धि


🔱 3. मुख्य सूर्य मंत्र (Surya Mantra)

🔸 वैदिक मंत्र

ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

फल — बुद्धि शुद्धि, तेज, निर्णय-शक्ति


🔸 सरल सूर्य बीज मंत्र

ॐ घृणि सूर्याय नमः

📿 108 जप – विशेषतः मकर संक्रान्ति को


🕉️ 4. आदित्यहृदय स्तोत्र (संक्षेप)

📖 वाल्मीकि रामायण – युद्धकाण्ड

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥

फल
✔ रोगनाश
✔ भय मुक्ति
✔ आत्मबल एवं विजय

📌 विशेष
संकट, रोग, मानसिक अशांति में आदित्यहृदय सर्वोत्तम स्तोत्र माना गया है।


🪔 5. दीपक विधि (Ghee / Oil Lamp Rules)

🔸 घी का दीपक

  • स्थान: दाईं ओर

  • फल: ज्ञान, तेज, आत्मिक शुद्धि

🔸 तिल के तेल का दीपक

  • स्थान: बाईं ओर / मुख्य द्वार के बाहर

  • फल: पितृ शांति, बाधा नाश


🕯️ 6. वर्तिका (बाती) – रंग एवं संख्या

🔹 शुभ रंग

  • पीली → सूर्य, तेज, समृद्धि

  • सफेद → शांति, पितृ कृपा

  • लाल → शक्ति, रोग नाश

🔹 संख्या

  • 1 बाती – सामान्य पूजा

  • 2 बाती – गृह एवं पितृ संतुलन

  • 5 बाती – विशेष संक्रान्ति फल

  • 7 बाती – सूर्योपासना में श्रेष्ठ


🎁 7. दान देते समय बोले जाने वाले मंत्र

🔸 तिल / अन्न दान मंत्र

ॐ संक्रान्त्यै नमः

🔸 वस्त्र / दीपक दान

ॐ सूर्याय नमः

🔸 सामान्य दान मंत्र

इदं दानं मया दत्तं सूर्य प्रीत्यर्थमस्तु मे।

📌 दान का मुख
👉 पूर्व या उत्तर
👉 ब्राह्मण, वृद्ध, गरीब, गौ, पक्षी


👣 8. पितृ तर्पण विधि (संक्षेप)

  • मुख: दक्षिण

  • हस्त: तर्जनी व अंगूठे के मध्य

  • द्रव्य: जल + तिल

मंत्र:

ॐ पितृभ्यो नमः

  • तिल के तेल का दीपक घर के बाहर चौखट पर रख दें |
  • ॥ श्रीसूर्याष्टकम् ॥

·         आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥1

·         सप्ताश्व रथमारूढं प्रचण्डं कश्यप आत्मजम् ।
श्वेत पद्माधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्य अहम् ॥2

·         लोहितं रथमारूढं सर्वलोक पितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्य अहम्  3

·         त्रैगुण्यश्च महाशूरं ब्रह्मा विष्णु महेश्वरम् ।
महापाप हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्य अहम्  4

·         बृह्मितं तेजःपुञ्जञ्च वायु आकाश मेव च ।
प्रभुत्वं सर्व लोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्य अहम्  5

·         बन्धूक पुष्पसङ्काशं हार कुण्डल भूषितम् ।
एक चक्र धरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्य अहम्  6

·         तं सूर्यं लोककर्तारं महा तेजः प्रदीपनम् ।
महापाप हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्य अहम्  7

·         तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञान प्रकाश मोक्षदम् ।
महा पाप हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्य अहम्  8

·         ॥ इति श्रीसूर्याष्टकम् 



☀️ मकर संक्रान्ति कथा

(शास्त्रीय एवं पौराणिक विवेचन सहित)

मकर संक्रान्ति हिन्दू धर्म का एक अत्यन्त प्राचीन एवं पवित्र पर्व है। यह पर्व उस दिव्य क्षण का स्मरण कराता है, जब सूर्यदेव धनु राशि को त्यागकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यही प्रवेश उत्तरायण का आरम्भ कहलाता है, जिसे शास्त्रों में देवताओं का दिन कहा गया है। इस कारण मकर संक्रान्ति को दान, स्नान, सूर्योपासना, पितृ-तर्पण और नव आरम्भ का महापर्व माना गया है।

📖 भविष्यपुराण में स्पष्ट कहा गया है—

उत्तरायणे दक्षिणायने च संक्रान्तौ व्रतं चरेत्।
अर्थात सूर्य के उत्तरायण या दक्षिणायन में प्रवेश के समय मनुष्य को व्रत, स्नान और दान अवश्य करना चाहिए।


🌞 सूर्यदेव और शनि की पौराणिक कथा

पुराणों के अनुसार सूर्यदेव के पुत्र शनि मकर राशि के स्वामी हैं। सूर्य और शनि के संबंधों में मतभेद का वर्णन शास्त्रों में मिलता है, क्योंकि सूर्य तेजस्वी हैं और शनि तपस्वी एवं न्यायप्रिय। जब सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो यह पिता द्वारा पुत्र के क्षेत्र में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है।
इस कथा का भाव यह है कि तेज और तप, अधिकार और अनुशासन के बीच संतुलन स्थापित होता है। इसी कारण मकर संक्रान्ति पर अहंकार त्याग, क्रोध शमन और दान का विशेष महत्व बताया गया है।

📖 पद्मपुराण के अनुसार—

सूर्य मकरस्थे कर्मसिद्धिः।
अर्थात जब सूर्य मकर राशि में होते हैं, तब परिश्रम से सिद्धि निश्चित होती है।


🕉️ भगीरथ, गंगा और पितृ-मोक्ष की कथा

☀️ मकर संक्रान्ति कथा

(शास्त्रीय एवं पौराणिक विवेचन सहित)

मकर संक्रान्ति हिन्दू धर्म का एक अत्यन्त प्राचीन एवं पवित्र पर्व है। यह पर्व उस दिव्य क्षण का स्मरण कराता है, जब सूर्यदेव धनु राशि को त्यागकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यही प्रवेश उत्तरायण का आरम्भ कहलाता है, जिसे शास्त्रों में देवताओं का दिन कहा गया है। इस कारण मकर संक्रान्ति को दान, स्नान, सूर्योपासना, पितृ-तर्पण और नव आरम्भ का महापर्व माना गया है।

📖 भविष्यपुराण में स्पष्ट कहा गया है—

उत्तरायणे दक्षिणायने च संक्रान्तौ व्रतं चरेत्।
अर्थात सूर्य के उत्तरायण या दक्षिणायन में प्रवेश के समय मनुष्य को व्रत, स्नान और दान अवश्य करना चाहिए।


🌞 सूर्यदेव और शनि की पौराणिक कथा

पुराणों के अनुसार सूर्यदेव के पुत्र शनि मकर राशि के स्वामी हैं। सूर्य और शनि के संबंधों में मतभेद का वर्णन शास्त्रों में मिलता है, क्योंकि सूर्य तेजस्वी हैं और शनि तपस्वी एवं न्यायप्रिय। जब सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो यह पिता द्वारा पुत्र के क्षेत्र में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है।
इस कथा का भाव यह है कि तेज और तप, अधिकार और अनुशासन के बीच संतुलन स्थापित होता है। इसी कारण मकर संक्रान्ति पर अहंकार त्याग, क्रोध शमन और दान का विशेष महत्व बताया गया है।

🌞 सूर्य और शनि की कथा (मकर संक्रान्ति से संबंधित)

  1. प्राचीन काल में सूर्यदेव अत्यंत तेजस्वी, उज्जवल और सभी लोकों में आदरणीय थे। उनकी किरणें पृथ्वी, जल, आकाश और सभी प्राणियों तक फैलती थीं।

  2. शनि ग्रह तपस्वी, गंभीर और न्यायप्रिय थे। वे नियम और अनुशासन के प्रतीक माने जाते थे।

  3. सूर्य अपने तेजस्विता और अधिकार के लिए विख्यात थे, जबकि शनि अपने कठोर तप और कर्मनिष्ठा के लिए।

  4. समय आया जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करने वाले थे, जो शनि ग्रह की भी राशि थी।

  5. शनि ने सूर्य से कहा, “यह मेरी राशि है। अपने तेज का संचालन मेरे नियम और अनुशासन के अनुसार करो।”

  6. सूर्य ने उत्तर दिया, “मेरा तेज और अधिकार तो रहेगा, पर मैं आपके नियम का सम्मान करूँगा।”

  7. जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहे थे, तब शनि ने अपनी दृष्टि से उन्हें परखा। सूर्य ने अपने तेज और प्रकाश का संचालन ऐसा किया कि सभी जीवों को लाभ पहुँचा, लेकिन शनि के नियम भी बने रहे।

  8. इस समय सूर्य का मकर राशि में प्रवेश ही उत्तरायण का प्रारंभ माना गया, जिसे हम आज मकर संक्रान्ति के रूप में मनाते हैं।

  9. इस घटना ने देवताओं और मनुष्यों को यह सिखाया कि तेज और तप, अधिकार और अनुशासन में संतुलन आवश्यक है।

  10. सूर्य और शनि के मतभेद का यह केवल स्वभाविक विरोध था; कोई दुष्परिणाम या शुभ फल इससे जुड़ा नहीं था।

  11. सूर्य के इस प्रवेश के समय से संक्रान्ति पर्व आरंभ हुआ और यही समय पुण्य कर्म, दान और सूर्योपासना के लिए शुभ माना गया।

  12. शास्त्रों में इसे सांकेतिक कथा के रूप में वर्णित किया गया है, जो मनुष्य को संतुलन, संयम और परिश्रम का संदेश देती है।


💡 सारां📖 पद्मपुराण के अनुसार—

सूर्य मकरस्थे कर्मसिद्धिः।
अर्थात जब सूर्य मकर राशि में होते हैं, तब परिश्रम से सिद्धि निश्चित होती है।


🕉️ भगीरथ, गंगा और पितृ-मोक्ष की कथा

मकर संक्रान्ति का घनिष्ठ संबंध राजा भगीरथ और गंगा अवतरण की कथा से जुड़ा है। राजा सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के शाप से भस्म हो गए थे। उनकी मुक्ति के लिए भगीरथ ने कठोर तप किया, जिसके फलस्वरूप गंगा माता का पृथ्वी पर अवतरण हुआ।
शास्त्रों के अनुसार यह अवतरण उत्तरायण काल में हुआ, और गंगा के जल से सगर पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ

इसी कारण मकर संक्रान्ति पर
गंगा स्नान,
पितृ तर्पण,
जल एवं तिल दान
को विशेष पुण्यकारी माना गया है।

📖 महाभारत (अनुशासन पर्व) में कहा गया है—

उत्तरायणे कृतं दानं अक्षय्यं भवति।
अर्थात उत्तरायण में किया गया दान अक्षय फल देने वाला होता है।


🪔 तिल और षट्कर्म की महिमा

मकर संक्रान्ति पर तिल का अत्यन्त महत्व है। तिल को अग्नि, सूर्य और पितृ-तत्व का प्रतीक माना गया है।

इसी कारण मकर संक्रान्ति पर
गंगा स्नान,
पितृ तर्पण,
जल एवं तिल दान
को विशेष पुण्यकारी माना गया है।

📖 महाभारत (अनुशासन पर्व) में कहा गया है—

उत्तरायणे कृतं दानं अक्षय्यं भवति।
अर्थात उत्तरायण में किया गया दान अक्षय फल देने वाला होता है।


🪔 तिल और षट्कर्म की महिमा

मकर संक्रान्ति पर तिल का अत्यन्त महत्व है। तिल को अग्नि, सूर्य और पितृ-तत्व का प्रतीक माना गया है।🌺 निष्कर्ष (शास्त्रीय भाव)

मकर संक्रान्ति केवल पर्व नहीं,
यह सूर्य-तत्व, कर्म-तत्व और पितृ-तत्व का संगम है।

जो व्यक्ति इस दिन
✔ सूर्योपासना
✔ तिल-दान
✔ दीपक
✔ संयम
का पालन करता है,
उसके जीवन में स्थिर समृद्धि और शांति आती है।


🌺 संदेश | Message

मकर संक्रान्ति
🌞 सूर्य, कृषि और नव-आरम्भ का महापर्व

परिश्रम का सम्मान,
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
और
नए संकल्पों का उत्सव।

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श्राद्ध रहस्य - क्यों करे , न करे ? पिंड रहित , महालय ? किसी भी कर्म का पूर्ण फल विधि सहित करने पर ही मिलता है | * श्राद्ध में गाय का ही दूध प्रयोग करे |( विष्णु पुराण ) | श्राद्ध भोजन में तिल अवश्य प्रयोग करे | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि - श्राद्ध अपरिहार्य - अश्वनी माह के कृष्ण पक्ष तक पितर अत्यंत अपेक्षा से कष्ट की   स्थिति में जल , तिल की अपनी संतान से , प्रतिदिन आशा रखते है | अन्यथा दुखी होकर श्राप देकर चले जाते हैं | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि इसको नहीं करने से पीढ़ी दर पीढ़ी संतान मंद बुद्धि , दिव्यांगता .मानसिक रोग होते है | हेमाद्रि ग्रन्थ - आषाढ़ माह पूर्णिमा से /कन्या के सूर्य के समय एक दिन भी श्राद्ध कोई करता है तो , पितर एक वर्ष तक संतुष्ट/तृप्त रहते हैं | ( भद्र कृष्ण दूज को भरणी नक्षत्र , तृतीया को कृत्तिका नक्षत्र   या षष्ठी को रोहणी नक्षत्र या व्यतिपात मंगलवार को हो ये पिता को प्रिय योग है इस दिन व्रत , सूर्य पूजा , गौ दान गौ -दान श्रेष्ठ | - श्राद्ध का गया तुल्य फल- पितृपक्ष में मघा सूर्य की अष्टमी य त्रयोदशी को मघा नक्षत्र पर चंद्र ...

गणेश भगवान - पूजा मंत्र, आरती एवं विधि

सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

विवाह बाधा और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा पूजा

विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । 10 oct - 18 oct विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन कर...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...