🔸 अर्थ व नाम – संकष्टी = संकटों से मुक्ति देने
वाली, चतुर्थी = चंद्र मास की चौथी तिथि।
यह व्रत विशेष रूप से विघ्नहर्ता श्री गणेश को समर्पित है,
क्योंकि गणपति ही हर कार्य
के आरंभ में बाधाओं को दूर करते
हैं।
🔸 क्यों पूजा की जाती है – ऋण-संकट, मानसिक तनाव, संतान बाधा, कार्य में रुकावट, शत्रु भय, स्वास्थ्य समस्या से मुक्ति तथा
बुद्धि, स्थिरता, सफलता के लिए यह
व्रत किया जाता है।
🔸 आरंभ कैसे करें (व्रत प्रारंभ विधि) – प्रातः स्नान कर संकल्प लें, दिनभर निर्जल/फलाहार रखें, सूर्यास्त के बाद चंद्र
दर्शन
कर गणेश पूजन के उपरांत व्रत
खोलें।
🔸 किसकी पूजा – श्री गणेश (वक्रतुण्ड/विघ्नहर्ता स्वरूप); चंद्र देव का दर्शन अनिवार्य।
🔸 महत्व – यह व्रत
कष्टनाशक, कार्यसिद्धिदायक और ऋद्धि-सिद्धि प्रदायक माना गया है; मंगलवार होने से ऋण व शत्रु बाधा में विशेष फलदायी।
🔸 पूजा विधि (संक्षेप) –
साफ स्थान पर लाल वस्त्र बिछाएँ → गणेश प्रतिमा/चित्र स्थापित करें → गंगाजल से शुद्धि → दीप
प्रज्वलन → गणेश ध्यान → पंचोपचार/षोडशोपचार → नैवेद्य → आरती → चंद्र दर्शन।
🔸 गणेश को अर्पण सामग्री –
दूर्वा (21),
लाल पुष्प, मोदक/लड्डू, गुड़-चना, तिल, चंदन, अक्षत, धूप-दीप, पान-सुपारी, नारियल।
🔸 पुष्प, दीप, बाती (वर्तिका) –
पुष्प:
लाल (गुड़हल/गुलाब)
दीप:
घी का
बाती:
1 या
3 (विघ्ननाश
हेतु 3 श्रेष्ठ)
🔸 रंग (वस्त्र/आसन) – लाल या सिंदूरी।
🔸 संख्या (विशेष) – 21
दूर्वा,
21 नाम
जप
(ॐ गं गणपतये नमः)।
🔸 दिशा – पूजा करते
समय उत्तर-पूर्व (ईशान) या पूर्व मुख।
🔸 समय – सूर्यास्त के बाद, चंद्र दर्शन के पश्चात मुख्य पूजा।
🕉️
संकष्टी चतुर्थी
– तिल-बकरा
+ चंद्र पूजन
संपूर्ण विधि
1️⃣ तिल-बकरा बनाना (प्रतीकात्मक)
सामग्री
- तिल: काला, सफेद, लाल (थोड़े-थोड़े दाने)
- गुड़ / मिश्री
- मोदक / लड्डू
- लाल कपड़ा
- थाली / पत्तल
- दूर्वा (21)
- दीपक (घी / तेल)
विधि
- तिल + गुड़ से बकरा का आकार दें:
- गर्दन = काला तिल
- पेट = लाल तिल
- पैर = काला तिल
- मुंह = सफेद तिल
- यह शास्त्रीय प्रतीक है:
- गर्दन =
भय /
ऋण
- पेट =
काम /
कार्य
- पैर =
कर्म /
बाधा
- मुंह =
मन /
वाणी
- थाली पर गणेश प्रतिमा के सामने रखें।
- लाल पुष्प (गुड़हल) चारों ओर सजाएँ।
2️⃣ तिल-बकरा अर्पण संकल्प
संकल्प मंत्र (Full)
ॐ श्री गणेशाय नमः।
मम जीवनगतं सर्वं
ऋण-पाप-कर्म-बन्धनं
अहं तिलरूपेण समर्पयामि।
यथा एषः तिलबकरः प्रतीकात्मकः,
तथा मम दुःख-भय-विघ्ना नश्यन्तु।
श्री गणेशः प्रीयताम्।
ॐ स्वाहा।
छोटा सरल संकल्प:
ॐ श्री गणेशाय नमः।
मम सकल कष्ट-ऋण-बाधा निवारणार्थं
संकष्टी चतुर्थी व्रतं करिष्ये।
ॐ स्वाहा।
3️⃣ चंद्र दर्शन संकल्प और पूजन
संकल्प मंत्र (चंद्र दर्शन से पहले)
ॐ सोमाय नमः।
मम मनः-शुद्ध्यर्थं
व्रत-पूर्णतार्थं
चंद्रदर्शनं करिष्ये।
ॐ तत्सत्।
चंद्र दर्शन मंत्र (देखते समय)
दधिशंखतुषाराभं
क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं
शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥
अर्घ्य देते समय मंत्र
ॐ सोम सोमाय नमः।
मम मनोविकारान् शमय।
ॐ स्वाहा।
4️⃣ तीन प्रकार के तिल के प्रयोग और लाभ
|
तिल का रंग |
प्रयोग |
शास्त्रीय लाभ |
|
काला |
गर्दन / पैर |
ऋण शमन, शनि बाधा, भय नाश |
|
सफेद |
मुंह |
मन-शांति, संतान सुख, स्त्री व्रत में विशेष |
|
लाल |
पेट |
कार्य-विघ्न नाश, साहस, मंगल योग |
5️⃣ पाठ संख्या और विशेष प्रयोग
|
उद्देश्य |
पाठ संख्या |
विधि |
|
सामान्य शांति |
1 बार |
तिल-बकरा + गणेश सामने |
|
ऋण / आर्थिक |
3 या 11 बार |
काला तिल प्रधान |
|
संतान सुख |
5 या 21 बार |
सफेद तिल मुख्य |
|
कार्य / सफलता |
11 बार |
लाल पुष्प + लाल तिल प्रधान |
|
अत्यंत संकट |
21 बार |
तिल-बकरा पूर्ण, गणेश + चंद्र दर्शन |
📌 शास्त्रीय सार
- गणेश = बुद्धि
- तिल = कर्म-ऋण
- बकरा = अहं-भार
- चंद्र = मन
👉 चारों शुद्ध होने पर संकट स्थायी रूप से नष्ट होते हैं।
संकष्टी चतुर्थी का शुद्ध, शास्त्रीय संकल्प मंत्र, जिसे आप तिल-बकरा, गणेश पूजा और चंद्र दर्शन से पहले बोलें—
🕉️ संकल्प मंत्र (Sankalpa Mantra)
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ।
अद्य ब्रह्मणः द्वितीयपरार्धे
श्वेतवाराहकल्पे
वैवस्वत मन्वन्तरे
अष्टाविंशतितमे कलियुगे
प्रथमे पादे
जम्बूद्वीपे भारतवर्षे
भारतखण्डे
(अपने राज्य/नगर का नाम) स्थितः
अस्मिन् शुभे दिने
मम आत्मनः श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त
फलप्राप्त्यर्थं
सकल ऋण-बाधा-दोष-निवारणार्थं
संतान-सुख-समृद्धि-कार्यसिद्ध्यर्थं
श्री गणेश प्रीत्यर्थं
संकष्टी चतुर्थी व्रतं
तिल-द्रव्येण सह
अहं करिष्ये।
ॐ तत्सत्।
📌 बोलने की विधि
- दायाँ हाथ जल/अक्षत/तिल लेकर
- गणेश प्रतिमा की ओर मुख करके
- मन में इच्छा स्पष्ट रखकर
🙏 छोटा सरल संकल्प (यदि लंबा न बोल सकें)
ॐ श्री गणेशाय नमः।
मम सकल कष्ट-ऋण-बाधा निवारणार्थं
संकष्टी चतुर्थी व्रतं करिष्ये।
ॐ स्वाहा।
🕉️ तिल-बकरा अर्पण मंत्र (अत्यंत महत्वपूर्ण)
यह मंत्र तब बोलें जब तिल-बकरा थाली में रखकर गणेश के सामने अर्पित करें।
यह “काटने” का नहीं, “बंधन-छेदन और समर्पण” का मंत्र है।
🔶 तिल-बकरा अर्पण मंत्र
ॐ श्री गणेशाय नमः।
मम जीवनगतं सर्वं
ऋण-पाप-कर्म-बन्धनं
अहं तिलरूपेण समर्पयामि।
यथा एषः तिलबकरः प्रतीकात्मकः,
तथा मम दुःख-भय-विघ्ना नश्यन्तु।
श्री गणेशः प्रीयताम्।
ॐ स्वाहा।
📌 भाव (अवश्य समझें)
- तिल = कर्म-ऋण
- बकरा = अहंकार / बोझ
- समर्पण = कटना (भीतरी)
👉 चाकू/हिंसा निषिद्ध
👉 हाथ से तोड़कर / दान द्वारा विसर्जन ही सही विधि
🌙 चंद्र दर्शन संकल्प मंत्र (देखने से पहले)
🔶 चंद्र दर्शन संकल्प
ॐ सोमाय नमः।
मम मनः-शुद्ध्यर्थं
व्रत-पूर्णतार्थं
चंद्रदर्शनं करिष्ये।
ॐ तत्सत्।
🌙 चंद्र पूजा मंत्र (देखते समय)
🔶 चंद्र दर्शन मंत्र
दधिशंखतुषाराभं
क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं
शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥
👉 यह मंत्र मन, भय, चिंता, संतान-भाव पर सीधा प्रभाव डालता है।
🌊 अर्घ्य देते समय मंत्र
(जल / दूध / जल+दूध)
ॐ सोम सोमाय नमः।
मम मनोविकारान् शमय।
ॐ स्वाहा।
📌 चंद्र दर्शन के बाद क्या करें
- व्रत खोलें
- तिल-बकरा दान / गाय को / जल में प्रवाहित
- गणेश को नमस्कार
🔸 मंत्र (संक्षेप) –
📿 संपूर्ण पूजन मंत्र (शुद्ध रूप में)
🔹 ध्यान मंत्र
“गजाननं भूतगणादि सेवितं
कपित्थ जम्बूफलचारु भक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं
नमामि विघ्नेश्वर पादपङ्कजम्॥”
🔹 आवाहन मंत्र
“आगच्छ देवदेवेश गजानन कृपानिधे।
पूजां गृहाण विघ्नेश नमस्ते नमस्ते नमः॥”
🔹 मूल बीज मंत्र
“ॐ गं गणपतये नमः॥” (108 बार)
🔹 संकष्टी विशेष मंत्र
“ॐ वक्रतुण्डाय हुम् फट्॥” (21 बार)
🔹 विघ्ननाश मंत्र
“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥”
🔹 चंद्र दर्शन मंत्र
“दधिशंख तुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥”
📖 संपूर्ण संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
🕉️ संकष्टी चतुर्थी – ग्रंथीय-शैली विस्तृत कथा, चंद्र दर्शन मंत्र एवं चंद्र पूजा (अत्यंत विस्तार से)
(ऐसे लिखा गया है जैसे किसी व्रत-ग्रंथ / पुराण के पृष्ठ का पाठ हो)
📜 संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (शास्त्रीय–ग्रंथीय वर्णन शैली)
एकदा देवर्षि नारद मुनि श्रीकृष्ण के समीप आए। विनयपूर्वक बोले—
“हे योगेश्वर! कलियुग में मनुष्य अल्पायु, अल्पबल और चंचल मन वाला है। ऋण, रोग, संतान-दुःख, शत्रु-पीड़ा तथा कार्य-विघ्न से पीड़ित रहता है। ऐसा कौन-सा व्रत है जो इन समस्त संकटों का नाश करे?”
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले—
“नारद! कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला व्रत ‘संकष्टी चतुर्थी’ कहलाता है। यह व्रत स्वयं विघ्नहर्ता श्री गणेश को अत्यंत प्रिय है। इसके प्रभाव से असंभव भी संभव हो जाता है।”
भगवान ने आगे कहा—
पूर्वकाल में दक्ष प्रजापति की सत्ताइस कन्याएँ थीं, जिनका विवाह चंद्रदेव से हुआ। किंतु चंद्रदेव का अनुराग केवल रोहिणी से अधिक था। इससे दक्ष कुपित हुए और उन्होंने चंद्र को क्षय रोग का शाप दे दिया।
शाप के प्रभाव से—
- चंद्र का तेज क्षीण होने लगा
- देवताओं के यज्ञ निष्फल होने लगे
- वनस्पति, औषधि और जल का क्षय होने लगा
समस्त देवगण भयभीत होकर श्री गणेश की शरण में पहुँचे। चंद्रदेव ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा—
“हे विघ्नविनाशक! मुझसे अपराध हुआ है। कृपा कर मुझे शाप से मुक्त कीजिए।”
तब श्री गणेश ने कहा—
“हे सोम! कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को उपवास रखकर, रात्रि में मेरा पूजन करो और तत्पश्चात मेरा दर्शन कर स्वयं अपना दर्शन कराओ। इससे तुम्हें शाप से आंशिक मुक्ति मिलेगी।”
चंद्रदेव ने मंगलवार की संकष्टी चतुर्थी को—
- दिनभर कठोर व्रत रखा
- रात्रि में विधिपूर्वक गणेश पूजन किया
- 21 दूर्वा, मोदक, लाल पुष्प अर्पित किए
- तत्पश्चात चंद्र दर्शन किया
श्री गणेश की कृपा से चंद्रमा में क्षय-वृद्धि का क्रम प्रारंभ हुआ।
तभी से यह नियम हुआ—
“संकष्टी चतुर्थी बिना चंद्र दर्शन के पूर्ण नहीं मानी जाती।”
पुराणों के अनुसार, एक समय राजा हरिश्चंद्र के वंशज राजा हरसेन घोर संकटों में फँस गए। राज्य नष्ट होने लगा, पुत्रहीनता, ऋण, रोग और शत्रु बाधा चारों ओर फैल गई। राजपुरोहित ने उन्हें संकष्टी चतुर्थी व्रत करने का निर्देश दिया।
राजा ने मंगलवार की संकष्टी चतुर्थी को दिनभर उपवास रखकर, रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद श्री गणेश पूजन किया और कथा श्रवण किया। उन्होंने 21 दूर्वा, मोदक, लाल पुष्प अर्पित किए।
कुछ ही मास में –
राजा का ऋण समाप्त हुआ, राज्य लौटा, संतान प्राप्ति हुई और शत्रु शांत हो गए।
🔶 तिल (तिलक/तिल) का शास्त्रीय महत्व
तिल को धर्मशास्त्रों में “पापभक्षी” और “ऋणमोचक” द्रव्य कहा गया है।
मनुस्मृति, स्कंदपुराण, पद्मपुराण में तिल को शनि, पितृ और ऋण से जोड़ा गया है।
🕉️ संकष्टी चतुर्थी में तिल से संबंधित शास्त्रीय श्लोक, निषेध (किसे नहीं करना चाहिए) और सुरक्षित वैकल्पिक विधि
📜 1️⃣ तिल का शास्त्रीय महत्व – ग्रंथों के प्रमाण सहित
🔹 मनुस्मृति (अध्याय 4 – भावार्थ)
“तिलैः स्नानं तिलैः दानं तिलैः होमं च यः करे।
स सर्वपापविनिर्मुक्तः स्याद्वै जन्मनि जन्मनि॥”
अर्थ –
जो मनुष्य तिल से स्नान, दान, हवन या पूजन करता है,
वह जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होता है।
👉 इसलिए संकष्टी (संकट नाशक) व्रत में तिल सर्वोत्तम द्रव्य माना गया।
🔹 स्कंद पुराण – गणेश खंड (भावार्थ)
“चतुर्थ्यां कृष्णपक्षे तिलैः पूजितो गणाधिपः।
ऋणरोगभयक्लेशान् क्षणेन विनिवारयेत्॥”
अर्थ –
कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को तिल से पूजित गणेश
ऋण, रोग, भय और मानसिक क्लेश को शीघ्र नष्ट करते हैं।
🔹 पद्म पुराण – व्रतराज संवाद (भाव)
- तिल = पूर्व कर्मों का संचित रूप
- गुड़ = उन कर्मों का मधुर फल
👉 इसलिए तिल + गुड़ का प्रयोग कर्म-शुद्धि के लिए श्रेष्ठ।
🐐 2️⃣ “तिल का बकरा” – किसे यह क्रिया नहीं करनी चाहिए (महत्वपूर्ण निषेध)
⚠️ यह बिंदु बहुत ज़रूरी है, क्योंकि अंधानुकरण से दोष भी लग सकता है।
❌ यह प्रतीकात्मक क्रिया (तिल का बकरा बनाकर तोड़ना) इन लोगों को नहीं करनी चाहिए:
1️⃣ गर्भवती स्त्री
- कारण: यह कर्म-छेदन की क्रिया है
- गर्भ में अस्थिरता का भाव शास्त्रों में वर्जित
2️⃣ 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे
- बालक को “काटना/छेदन” जैसे संस्कार नहीं कराए जाते
3️⃣ जिनका मन अत्यधिक क्रोधित, भयभीत या विचलित हो
- तंत्र-भाव बिना गुरु के वर्जित
4️⃣ जिन घरों में हाल ही में मृत्यु-सूतक हो
- उस काल में प्रतीकात्मक छेदन कर्म नहीं किया जाता
🌿 3️⃣ सुरक्षित और शुद्ध वैकल्पिक विधि (सबके लिए मान्य)
यदि ऊपर में से कोई स्थिति हो —
तो यह वैकल्पिक विधि पूर्ण शास्त्रसम्मत और सुरक्षित है 👇
🔹 वैकल्पिक विधि A – तिल अर्पण विधि (सर्वश्रेष्ठ)
सामग्री
- काले तिल (1 चम्मच)
- गुड़ (छोटा टुकड़ा)
विधि
- गणेश पूजन के बाद
- तिल हाथ में लेकर बोलें:
“ॐ गणाधिपाय नमः।
मम जीवनगतं सर्वं ऋणं क्लेशं च नाशय।”
- तिल को दान कर दें (ब्राह्मण / गाय / जल में प्रवाह)
✅ फल = ऋण शमन, मानसिक शांति
🔹 वैकल्पिक विधि B – तिल दीप विधि (स्त्री/गर्भवती के लिए श्रेष्ठ)
- तिल के तेल का दीपक
- 1 बाती
- गणेश के सामने जलाएँ
मंत्र:
“ॐ दीपज्योति गणेशाय नमः” (11 बार)
👉 यह विधि संतान बाधा और मानसिक भय में बहुत लाभ देती है।
🔹 वैकल्पिक विधि C – तिल संकल्प जल (बहुत सरल)
- जल में थोड़े तिल डालें
- चंद्र दर्शन के बाद
- वह जल किसी पेड़ की जड़ में डालें
भाव रखें:
👉 “मेरे संकट पृथ्वी में विलीन हों”
❌ यह बलि नहीं
❌ यह हिंसा नहीं
✅ यह आंतरिक शुद्धि का कर्म है
तिल के गुण (ग्रंथीय भाव)
- तिल = पाप दहन (अग्नि तत्त्व प्रधान)
- तिल = ऋण शमन (विशेषतः पूर्वज/कर्म ऋण)
- तिल = विघ्न नाशक (गणेश प्रिय)
इसी कारण संकष्टी चतुर्थी (जो संकट नाशक व्रत है) में तिल का प्रयोग अनिवार्य या अत्यंत श्रेष्ठ माना गया।
🔶 “तिल का बकरा” क्या है? (परंपरा का सही अर्थ)
कुछ क्षेत्रों (विशेषतः मध्य भारत, महाराष्ट्र, बुंदेलखंड, राजस्थान के लोक-आचार) में
तिल और गुड़ से “बकरे” का प्रतीक रूप बनाया जाता है।
🔶 “तिल का बकरा काटना” – शास्त्रीय प्रतीकार्थ
यहाँ “काटना” का अर्थ है:
❌ हिंसा नहीं
✅ बंधन-छेदन (बंधन काटना)
ग्रंथीय भावार्थ में
- जैसे गणेश विघ्न काटते हैं,
- वैसे ही तिल से बना प्रतीक कर्म-ऋण और संकट का छेदन दर्शाता है।
यह क्रिया इस भाव से की जाती है:
“मेरे जीवन के संकट, ऋण, रोग, भय, दोष —
आज गणेश कृपा से कट जाएँ।”
🔶 यह परंपरा क्यों की जाती है? (गूढ़ कारण)
1️⃣ तिल + गुड़ = कर्म शुद्धि
- तिल → पुराने कर्म
- गुड़ → मधुर फल
👉 संदेश: कठोर कर्म भी मधुर फल दें
2️⃣ बकरा = पाप का भार
वैदिक काल में बकरा भार वहन करने वाले जीव का प्रतीक माना गया।
यहाँ बकरा = मैं अपने पापों का भार समर्पित कर रहा हूँ।
3️⃣ संकष्टी = संकट कटे
तिल का “छेदन” = संकट का छेदन
🔶 संकष्टी चतुर्थी में तिल प्रयोग का विशेष फल
🔹 ऋण से मुक्ति
- आर्थिक दबाव घटता है
- पुराने कर्ज उतरने का मार्ग बनता है
- शनि-दोष, पितृ-ऋण में लाभ
🔹 मानसिक तनाव शमन
- चंद्र (मन) पर शांति
- भय, अनिद्रा, चिंता में कमी
🔹 संतान बाधा में सहायक
- गर्भ धारण में मानसिक अवरोध कम
- संतान से जुड़ा भय शांत
🔹 कार्य-विघ्न नाश
- रुके हुए काम आगे बढ़ते हैं
- इंटरव्यू, व्यापार, मुकदमे में राहत
🔶 सही विधि (सरल, शुद्ध)
1️⃣ सामग्री
- काले तिल
- गुड़
- चाकू नहीं — हाथ या लकड़ी (प्रतीकात्मक)
2️⃣ विधि
- तिल-गुड़ मिलाकर छोटा प्रतीक बनाएँ
- गणेश पूजन के बाद कहें:
“मेरे समस्त संकट, ऋण और विघ्न आज नष्ट हों” - प्रतीक को तोड़ें / अलग करें
- उसे दान कर दें या जल में विसर्जन
🔶 शास्त्रीय निष्कर्ष (सार)
तिल = पापहर
संकष्टी = संकटहर
गणेश = विघ्नहर
👉 तीनों का योग =
ऋण-नाश | भय-शांति | कार्य-सिद्धि
जो मनुष्य श्रद्धा, नियम और संयम से यह व्रत करता है—
उसके संकट, ऋण, रोग, संतान-दुःख, मानसिक पीड़ा का नाश होता है।
🌙 चंद्र दर्शन का आध्यात्मिक रहस्य (ग्रंथीय भावार्थ)
- चंद्र = मन
- गणेश = बुद्धि
जब मन (चंद्र) और बुद्धि (गणेश) एक साथ संतुलित होते हैं—
👉 संकल्प सिद्ध होता है
इसी कारण संकष्टी चतुर्थी में—
पहले गणेश पूजन
फिर चंद्र दर्शन
अत्यंत अनिवार्य बताया गया है।
🌙 चंद्र दर्शन के संपूर्ण मंत्र (शुद्ध, ग्रंथीय रूप)
🔹 चंद्र ध्यान मंत्र
“श्वेताम्बरधरं देवं शशाङ्कं क्षीरसागरात्।
उदितं शान्तिमूर्तिं च नमामि सोममव्ययम्॥”
🔹 चंद्र दर्शन मंत्र (दर्शन के क्षण)
“दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥”
🔹 चंद्र शांति बीज मंत्र
“ॐ सोम सोमाय नमः॥” (11 / 21 बार)
🔹 मानसिक शांति हेतु मंत्र
“ॐ चन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा॥”
🌙 संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र पूजा की संपूर्ण विधि
1️⃣ समय
चंद्र उदय के तुरंत बाद, शांत मन से।
2️⃣ स्थान
खुला आकाश, छत, आँगन या खिड़की।
3️⃣ अर्घ्य द्रव्य
जल + दूध (थोड़ा सा)
चाहें तो सफेद पुष्प डाल सकते हैं।
4️⃣ पात्र
तांबे का लोटा या स्टील पात्र।
5️⃣ अर्घ्य विधि
- पूर्व या उत्तर-पूर्व मुख होकर खड़े हों
- चंद्र को देखें
- अर्घ्य अर्पित करते समय दर्शन मंत्र बोलें
6️⃣ अर्घ्य संख्या
1 या 3 (3 श्रेष्ठ माना गया है)
📿 चंद्र पूजा के बाद करने योग्य कार्य
- श्री गणेश को पुनः नमस्कार
- व्रत खोलना
- सात्विक भोजन
- क्रोध, असत्य, कटु वचन से बचना
📖 ग्रंथीय निष्कर्ष (व्रत-राज भाव)
“संकष्टी चतुर्थी व्रतेन गणेशः प्रीयते।
चन्द्रदर्शनेन मनः शुद्ध्यति।
तयोः योगेन सर्वसंकटनाशः भवति।”
अर्थ –
संकष्टी व्रत से गणेश प्रसन्न होते हैं,
चंद्र दर्शन से मन शुद्ध होता है,
और दोनों के योग से समस्त संकट नष्ट हो जाते हैं
*****************
तभी से यह मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से संकष्टी चतुर्थी का व्रत करता है, उसके जीवन के सभी विघ्न, ऋण और मानसिक क्लेश नष्ट हो जाते हैं।
🔸 ऋण समस्या
- पुराने कर्ज उतरते हैं
- कोर्ट–केस व दबाव घटता है
- मंगलवार होने से प्रभाव दोगुना
🔸 संतान बाधा
- गर्भधारण में सहायता
- संतान स्वास्थ्य व बुद्धि में वृद्धि
- संतान से जुड़ा भय शांत
🔸 कार्य / व्यवसाय
- रुके हुए कार्य आरंभ होते हैं
- इंटरव्यू, व्यापार, नई शुरुआत में सफलता
- बुद्धि व निर्णय शक्ति बढ़ती है
🔶 1️⃣ तिल का रंग – किस समस्या में कौन-सा तिल (शास्त्रीय प्रयोग)
◾ काला तिल (कृष्ण तिल) — सर्वोच्च
कब उपयोग करें:
- ऋण, आर्थिक संकट
- शनि बाधा, पितृ ऋण
- मानसिक तनाव, भय
शास्त्रीय कारण:
- काला तिल = तमस + अग्नि तत्व
- यह पुराने कर्म और ऋण को जलाता है
संकष्टी पर
👉 रुका पैसा चलने लगता है
👉 डर, चिंता, अस्थिरता घटती है
◾ सफेद तिल (श्वेत तिल)
कब उपयोग करें:
- संतान बाधा
- मानसिक शांति
- स्त्रियों के व्रत में
शास्त्रीय कारण:
- श्वेत तिल = सात्त्विक, चंद्र तत्व
- मन और गर्भ दोनों पर शुभ प्रभाव
संकष्टी पर
👉 संतान सुख में सहायक
👉 घर में शांति
◾ लाल तिल (रक्त तिल)
कब उपयोग करें:
- साहस की कमी
- कार्य में बार-बार रुकावट
- मंगल दोष शमन
शास्त्रीय कारण:
- लाल तिल = अग्नि + मंगल तत्व
संकष्टी पर
👉 निर्णय शक्ति बढ़ती है
👉 कामों में गति आती है
🔶 2️⃣
तिल की
मात्रा – शास्त्रीय संख्या रहस्य
|
समस्या |
तिल की मात्रा |
|
सामान्य व्रत |
11 दाने |
|
ऋण / कोर्ट केस |
21 दाने |
|
संतान बाधा |
27 दाने |
|
भारी संकट / शनि दोष |
108 दाने (दान हेतु) |
📌 नियम – तिल गिने हुए, मन शांत, क्रोध रहित।
🔶 3️⃣ मंगलवार की संकष्टी + तिल = विशेष महायोग
मंगलवार
= ऋण, भूमि, रक्त, शत्रु, साहस
संकष्टी
= संकट काटने की तिथि
तिल
= ऋण-पाप भस्म करने वाला द्रव्य
👉 तीनों का योग =
🔥 ऋणनाशक – शत्रुनाशक – भयशामक योग
इस दिन तिल प्रयोग का फल सामान्य संकष्टी से 2 गुना माना गया है।
🔶 4️⃣ राशि (Rashi) अनुसार तिल से मिलने वाला विशेष लाभ
♈ मेष / ♌ सिंह / ♐ धनु (अग्नि राशियाँ)
- लाल तिल या काला तिल
- लाभ: साहस, नौकरी, प्रतिस्पर्धा में जीत
♉ वृषभ / ♍ कन्या / ♑ मकर (पृथ्वी राशियाँ)
- काला तिल
- लाभ: धन, स्थिरता, ऋण मुक्ति
♊ मिथुन / ♎ तुला / ♒ कुंभ (वायु राशियाँ)
- सफेद तिल
- लाभ: मानसिक शांति, संबंध सुधार
♋ कर्क / ♏ वृश्चिक / ♓ मीन (जल राशियाँ)
- सफेद + काला तिल मिश्रित
- लाभ: संतान, भावनात्मक संतुलन
🔶 5️⃣ संकष्टी पर तिल का “सबसे सुरक्षित और सिद्ध प्रयोग” (सार विधि)
यदि आप सब कुछ सरल रखना चाहते हैं, तो यह एक विधि पर्याप्त है 👇
- काले तिल – 21 दाने
- गुड़ – छोटा टुकड़ा
- गणेश पूजन के बाद हाथ में लें
- बोलें:
“ॐ गं गणपतये नमः।
मम जीवनगतं सर्वसंकटं ऋणं च नाशय।”
- तिल दान / गाय को / जल में प्रवाह
✅ यही सबसे संतुलित, सुरक्षित, शास्त्रसम्मत उपाय है।
🔚 व्रत समापन मंत्र
“अनया पूजा च संकष्टी चतुर्थी व्रतेन
श्री गणेशः प्रीयताम् न मम॥”
🚫 संकष्टी चतुर्थी में क्या न करें (शास्त्रसम्मत वर्जनाएँ)
ध्यान रखें — संकष्टी “संकट काटने” की तिथि है,
गलत आचरण से वही संकट उल्टा सक्रिय हो सकता है।
❌ 1️⃣ चंद्र दर्शन से पहले व्रत न तोड़ें
कारण (ग्रंथीय भाव):
- चंद्र = मन
- बिना मन-शुद्धि भोजन = व्रत भंग
👉 फल घट जाता है, मानसिक अशांति बढ़ती है।
❌ 2️⃣ तामसिक भोजन / मांस / मदिरा
संकष्टी = गणेश व्रत (पूर्ण सात्त्विक)
तिल भी अग्नि-तत्व है, तामस से टकराव होता है।
👉 ऋण-शांति की जगह विवाद बढ़ सकता है।
📿 संकष्टी चतुर्थी का 13-व्रत चक्र (ग्रंथीय परंपरा)
यह परंपरा गणेश पुराण और लोक-व्रत परंपरा से आई है।
13 संकष्टी = एक पूर्ण संकट-चक्र का नाश
🔢 क्यों 13? (शास्त्रीय संकेत)
- 12 = राशियाँ (भौतिक जीवन)
- 13 = गणेश (राशियों से ऊपर)
👉 13वाँ व्रत = बंधन-मुक्ति
🪔 13 संकष्टी व्रत — क्रम और फल
1️⃣ पहली संकष्टी
- मानसिक स्थिरता
- भय में कमी
2️⃣ दूसरी
- आर्थिक रुकावट में हलचल
- रुका पैसा हिलना शुरू
3️⃣ तीसरी
- शत्रु शांति
- कोर्ट-कचहरी में राहत
4️⃣ चौथी
- स्वास्थ्य सुधार
- नींद, मन, पेट ठीक
5️⃣ पाँचवीं
- संतान चिंता में कमी
- घर का तनाव घटता है
6️⃣ छठी
- नौकरी / कार्य में स्थिरता
- वरिष्ठों की कृपा
7️⃣ सातवीं
- पितृ बाधा शमन
- अचानक सहायता मिलना
8️⃣ आठवीं
- शनि / मंगल दोष शांत
- दुर्घटना भय घटता है
9️⃣ नौवीं
- व्यापार वृद्धि
- निर्णय शक्ति प्रबल
🔟 दसवीं
- परिवार में सौहार्द
- विवाह / संबंध बाधा शमन
1️⃣1️⃣ ग्यारहवीं
- आध्यात्मिक स्थिरता
- मन का भार उतरना
1️⃣2️⃣ बारहवीं
- बड़ा संकट कटना
- जीवन की दिशा बदलना
1️⃣3️⃣ तेरहवीं (उद्यापन संकष्टी)
👉 ऋण-मुक्ति, भय-मुक्ति, विघ्न-मुक्ति
- 13 मोदक
- 13 दीप
- 13 ब्राह्मण/जरूरतमंद को तिल-दान
अत्यंत शुभ माना गया है।
🕉️ गणेश अथर्वशीर्ष (शांतिपाठ सहित) — श्लोक व अर्थ
🔶 1️⃣ शांतिपाठ
मंत्र
“ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥”
अर्थ (भाव सहित)
हे देवों! हम कानों से शुभ ही सुनें,
नेत्रों से शुभ ही देखें,
स्वस्थ अंगों से ईश्वर की स्तुति करते हुए
हमारी आयु लोककल्याण में व्यतीत हो।
इंद्र, पूषा, गरुड़ और बृहस्पति
हमारे लिए मंगल करें।
तीनों ताप (दैहिक-दैविक-भौतिक) शांत हों।
🔶 2️⃣ गणेश तत्त्व प्रतिपादन श्लोक
मंत्र
“ॐ नमस्ते गणपतये ।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ।
त्वमेव केवलं कर्तासि ।
त्वमेव केवलं धर्तासि ।
त्वमेव केवलं हर्तासि ।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ।
त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥”
शब्दार्थ
- प्रत्यक्षं तत्त्वम् = साक्षात् परम सत्य
- कर्ता = सृष्टि करने वाले
- धर्ता = पालन करने वाले
- हर्ता = संहार करने वाले
- साक्षात् आत्मा = जीवात्मा के भीतर स्थित परमात्मा
भावार्थ (अत्यंत महत्वपूर्ण)
यह श्लोक कहता है कि
👉 गणेश केवल देवता नहीं, ब्रह्मतत्त्व स्वयं हैं।
सृष्टि, स्थिति और लय — तीनों शक्तियाँ गणेश में ही निहित हैं।
वे बाहर भी हैं और भीतर आत्मा रूप में भी।
🔶 3️⃣ ऋतम्-सत्यम् श्लोक
मंत्र
“ऋतं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥”
अर्थ
मैं ऋत (ब्रह्म नियम) का पालन करता हूँ,
मैं सत्य का उच्चारण करता हूँ।
👉 यह साधक की प्रतिज्ञा है —
कि गणेश उपासना सत्य और धर्म के बिना फल नहीं देती।
🔶 4️⃣ गणेश बीज-रूप श्लोक
मंत्र
“अव त्वं माम् ।
अव वक्तारम् ।
अव श्रोतारम् ।
अव दातारम् ।
अव धातारम् ।
अव सर्वम् ॥”
अर्थ
हे गणेश!
मेरी रक्षा करो,
मेरे वचन, श्रवण, दान, धारण
और मेरे सम्पूर्ण जीवन की रक्षा करो।
👉 यह श्लोक पूर्ण शरणागति दर्शाता है।
🔶 5️⃣ गणेश बीजाक्षर श्लोक (अत्यंत गूढ़)
मंत्र
“त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् ।
त्वं शक्तित्रयात्मकः ।
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् ॥”
अर्थ
हे गणेश!
आप मूलाधार चक्र में स्थित हैं,
आपमें इच्छा-ज्ञान-क्रिया — तीनों शक्तियाँ हैं,
योगी निरंतर आपका ध्यान करते हैं।
👉 इसीलिए गणेश को
कुंडलिनी जागरण का अधिष्ठाता माना गया है।
🔶 6️⃣ गणेश गायत्री (अथर्वशीर्ष की आत्मा)
मंत्र
“ॐ एकदन्ताय विद्महे ।
वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥”
अर्थ (शब्द-भाव सहित)
हम एकदंत गणेश को जानते हैं,
वक्रतुण्ड का ध्यान करते हैं,
वे दंती हमें बुद्धि की प्रेरणा दें।
👉 यह मंत्र बुद्धि, निर्णय, विद्या, कार्य-सिद्धि का मूल है।
🔶 7️⃣ फलश्रुति (परिणाम श्लोक)
मंत्र
“यो गणेशाथर्वशीर्षमधीते
स ब्रह्मभूयाय कल्पते ।
न स विघ्नैर्बाध्यते कदाचन ॥”
अर्थ
जो व्यक्ति गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करता है,
वह ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है,
और उसे कोई विघ्न बाधित नहीं कर सकता।
📌 अंतिम शास्त्रीय सार (याद रखने योग्य)
✔ संकष्टी = संकट काटने की तिथि
✔ तिल = कर्म-ऋण का बीज
✔ चंद्र दर्शन = मन-शुद्धि
✔ 13 व्रत = जीवन-चक्र शुद्धि
👉 जो व्यक्ति भाव + विधि + संयम से करता है,
उसका संकट स्थायी रूप से कटता है, टलता नहीं।
🔹 संकष्टी चतुर्थी – यदि व्रत न करें तो आहार (संक्षिप्त)
- खा सकते हैं: हल्का, सुपाच्य, शाकाहारी भोजन – चावल, दाल, सादी सब्ज़ी, फल, दूध/दही
- वर्जित: मांस-मछली-अंडा, तीखा/बहुत मसालेदार, तली/भारी तेल वाली चीज़ें, शराब/मदिरा
- नक्षत्र विशेष (माघ, अश्लेषा / मघ): पेट भारी करने वाले काले तिल, उड़द, राजमा, मटर से बचें
- सुझाव: गुड़-तिल, हल्का हलवा, दीपक जलाना, दान करना पुण्यवर्धक
- ग्रंथ प्रमाण: भास्कर संहिता, मानस पूजाकरण, सर्वसिद्धि योगिनी
·
विशेष आहार (शुद्ध विकल्प)
|
प्रकार |
सुझाव |
|
प्रातःकाल |
हल्का दलिया या खिचड़ी |
|
मध्याह्न |
सादी दाल + चावल + हल्का सब्ज़ी |
|
सायंकाल |
फल + दूध / दही |
|
मिठाई |
गुड़, मूँगफली, हलवा (अत्यधिक नहीं) |
|
व्रत न होने पर भी |
1 छोटी गुड़-तिल (शुद्धिकरण) + दीपक जलाना लाभकारी |
1️⃣ खा सकते हैं (अनिवार्य नहीं, पर शुभ)
|
श्रेणी |
भोजन / फल |
कारण / शास्त्रीय प्रमाण |
|
अनाज |
चावल, मूंग दाल, गेहूँ की रोटी |
भास्कर संहिता में कहा गया – पित्त और वात संतुलन के लिए |
|
सब्ज़ियाँ |
लौकी, भिंडी, आलू, पालक, गाजर, कम तीखी सब्ज़ियाँ |
स्मृति शास्त्र – हल्का, सुपाच्य भोजन |
|
फल |
केला, सेब, नाशपाती, तरबूज |
विष्णु स्मृति 2.34 – फल पुण्य और स्वास्थ्यवर्धक हैं |
|
दूध / दही |
ताजे दूध, घी, दही |
चंद्र शक्ति और मानसिक शांति के लिए शंकर संहिता |
|
शाकाहारी |
सभी हरी सब्ज़ियाँ (असिक्त / नमक कम) |
नक्षत्रानुसार हल्का भोजन |
✔ संकष्टी = संकट काटने की तिथि
✔ तिल = कर्म-ऋण का बीज
✔ चंद्र दर्शन = मन-शुद्धि
✔ 13 व्रत = जीवन-चक्र शुद्धि
👉 जो व्यक्ति भाव + विधि + संयम से करता है,
उसका संकट स्थायी रूप से कटता है, टलता नहीं।
🚫 संकष्टी चतुर्थी में क्या न करें (शास्त्रसम्मत वर्जनाएँ)
ध्यान रखें — संकष्टी “संकट काटने” की तिथि है,
गलत आचरण से वही संकट उल्टा सक्रिय हो सकता है।
❌ 1️⃣ चंद्र दर्शन से पहले व्रत न तोड़ें
कारण (ग्रंथीय भाव):
- चंद्र = मन
- बिना मन-शुद्धि भोजन = व्रत भंग
👉 फल घट जाता है, मानसिक अशांति बढ़ती है।
❌ 2️⃣ तामसिक भोजन / मांस / मदिरा
संकष्टी = गणेश व्रत (पूर्ण सात्त्विक)
तिल भी अग्नि-तत्व है, तामस से टकराव होता है।
👉 ऋण-शांति की जगह विवाद बढ़ सकता है।
❌ 3️⃣ झूठ, कटु वचन, क्रोध
❌ 5️⃣ चाकू से “तिल का बकरा” काटना



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