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शिव - बिल्वपत्र और शमीपत्र अर्पण — कथा, मन्त्र और विधि
पूर्वाभिमुखदीपस्तु यशोवृद्धिकरः स्मृतः।
उत्तराभिमुखो दीपः धन सिद्धि प्रदायकः॥
दक्षिणस्थो हानिकरः पश्चिमः सुखदः स्मृतः॥
· उत्तरमुख वर्तिका → धन व सफलता
· पूर्वमुख
वर्तिका
→ यश
व प्रतिष्ठा
ऊर्ध्व वर्ति र्दीप शिखा त्यागिनां मोक्ष साधिका।
गृहस्थानां न कर्तव्या स्थैर्यलाभो न जायते॥
ऊपर सीधी उठी हुई वर्तिका वाला दीप त्यागी और संन्यासी साधकों के लिए मोक्ष साधना में सहायक माना गया है। गृहस्थों को ऐसी वर्तिका नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इससे स्थिर फल और सांसारिक संतुलन की प्राप्ति नहीं होती। A
lamp with a straight upward wick is regarded as supportive for ascetics and
renunciates seeking liberation. It is not recommended for householders, as it
is believed not to promote stability or worldly balance.
११ बिल्व अर्पण मन्त्र
(प्रस्तुति एवं सरलीकरण: पंडित वी. के. तिवारी “ज्योतिष शिरोमणि”)
एकादश रुद्र रूपों का प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए ११ अर्पण करने से
सम्पूर्ण रुद्रतत्त्व की पूजा मानी जाती है।
११ बिल्व अर्पण मन्त्र
१
मन्त्र (संस्कृत)
त्रिदलं
त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्।
त्रिजन्म
पापसंहारं
बिल्वपत्रं
शिवार्पणम्॥
-तीन दल वाला, तीन गुणों का स्वरूप, तीन नेत्र तथा तीन आयुध धारण करने वाले प्रभु को तीन जन्मों के पाप नाश हेतु यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This
bilva leaf, symbolising three qualities, three eyes, and three weapons, is offered to Lord Shiva to destroy the sins of three births.
२
अक्षमाला धरं रुद्रं पार्वती प्रियवल्लभम्।
चन्द्र शेखरमीशानं बिल्व पत्रं शिवार्पणम्॥
अक्षमाला धारण करने वाले रुद्र, पार्वती प्रिय, चन्द्रधारी ईशान को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This bilva leaf is offered to Rudra, beloved of
Parvati, bearer of the rosary and moon-crested Lord Ishana.
३
त्रिलोचनं दशभुजं दुर्गादेहार्धधारिणम्।
विभूतिभूषितं देवं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
तीन नेत्र, दस भुजाओं वाले, दुर्गा अर्धांगधारी तथा विभूति से विभूषित देव को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This bilva leaf is offered to the three-eyed Lord, ten-armed, who bears Durga
as half His form and is adorned with sacred ash.
४
गङ्गाधरमम्बिकानाथं फणिकुण्डलमण्डितम्।
कालकालं गिरीशं च बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
गंगा धारण करने वाले, अम्बिका नाथ, सर्पकुण्डलधारी, काल के भी काल गिरीश को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This bilva leaf is offered to the bearer of Ganga, Lord of Ambika, adorned with
serpent earrings, the destroyer of Time, Lord of mountains.
५
सच्चिदानन्दरूपं च परमानन्दमयं शिवम्।
वागीश्वरं चिदाकाशं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
सच्चिदानन्द स्वरूप, परम आनन्दमय, वाणी के स्वामी तथा चेतन आकाश रूप शिव को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This
bilva leaf is offered to Shiva, embodiment of truth-consciousness-bliss,
supreme joy, Lord of speech, and the infinite conscious space.
६
नीलकण्ठं जगद्वन्द्यं दीननाथं महेश्वरम्।
महापापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
नीलकण्ठ, जगत वंदनीय, दीनों के नाथ महेश्वर को महापाप नाश हेतु यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This bilva leaf is offered to blue-throated Maheshvara, revered by the world,
protector of the humble, destroyer of great sins.
७
दारिद्र्यदुःखहरणं रविचन्द्रानलेक्षणम्।
मृगपाणिं चन्द्रमौलिं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
दरिद्रता और दुःख हरने वाले, सूर्य-चन्द्र-अग्नि नेत्रधारी, हाथ में मृग तथा मस्तक पर चन्द्र धारण करने वाले शिव को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This bilva leaf is offered to Shiva who removes poverty and sorrow, whose eyes
are sun, moon, and fire, who holds a deer and bears the moon.
८
सम्पूर्णकामदं सौख्यं भक्तेष्टफलकारणम्।
सौभाग्यदं हितकरं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
सभी कामनाएँ पूर्ण करने वाले, सुखदायक, भक्तों को इच्छित फल देने वाले, सौभाग्यदायक शिव को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This
bilva leaf is offered to Shiva who grants all desires, gives happiness,
fulfills devotees’ wishes, and bestows fortune.
९
जटाधरं पावकाक्षं वृक्षेशं भुवनायकम्।
कामदं सर्वदागम्यं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
जटाधारी, अग्नि समान नेत्र वाले, वृक्षों के स्वामी, जगत नायक, कामना पूर्ण करने वाले शिव को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This bilva leaf is offered to the matted-haired Lord, fire-eyed, master of
trees, ruler of worlds, fulfiller of wishes.
१०
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणम्।
गम्भीरं वषट्कारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
शरणागत, दीन और पीड़ितों का उद्धार करने वाले, गम्भीर तथा यज्ञध्वनि स्वरूप शिव को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This
bilva leaf is offered to the profound Lord devoted to rescuing the surrendered,
the helpless, and the afflicted, embodiment of sacred chant.
११
निधनेशं धनाधीशमपमृत्यु विनाशनम्।
लिङ्गमूर्तिं लिङ्गात्मं बिल्व पत्रं शिवार्पणम्॥
निधियों के ईश, धन के अधिपति, अकाल मृत्यु नाशक, लिंगस्वरूप शिव को यह बिल्वपत्र अर्पित है।
This bilva leaf is offered to the Lord of treasures, master of wealth,
destroyer of untimely death, the Linga-formed Shiva.
कथा शमी पत्र
सतयुग में मालवा प्रदेश में औरव नाम के एक महान शिवभक्त एवं अत्यंत विद्वान ब्राह्मण रहते थे।
शिव कृपा से उनका तेज वेदज्ञान के समान प्रकाशमान और सूर्य के समान प्रखर था। देवतुल्य शक्तियाँ उन्हें शिव अनुग्रह से प्राप्त थीं।
एक दिन सायंकाल उनकी पत्नी ने एक अत्यंत सुंदर कन्या को जन्म दिया। शिवकृपा से प्राप्त उस कन्या का नाम शमी रखा गया।
जब शमी सात
वर्ष की हुई, तब
उसका विवाह धौम्य ऋषि के पुत्र मंदार
से कर दिया गया।
विवाह के समय मंदार
शौनक ऋषि के आश्रम में
शिक्षा प्राप्त कर रहा था,
इसलिए विवाह के बाद वह
शमी को उसके माता-पिता के घर छोड़कर
पुनः अध्ययन हेतु लौट गया।
जब दोनों यौवन अवस्था में पहुँचे, तब मंदार अपनी पत्नी को विदा कराने ससुराल गया। लौटते समय मार्ग में महान तपस्वी भृशुण्डी ऋषि का आश्रम पड़ा। वे भगवान गणेश के परम भक्त थे और उनके वरदान से उनका मुख गणेश के समान दिखाई देता था।
जब शमी और मंदार ने ऋषि को देखा तो अनजाने में उन्हें हँसी आ गई।
इसे अपमान समझकर भृशुण्डी ऋषि अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने श्राप दिया —
“तुम दोनों वृक्ष बन जाओ; ऐसे वृक्ष कि जिनके पास पशु-पक्षी भी न आएँ।”
श्राप के प्रभाव से
- मंदार ऐसा वृक्ष बना जिसकी पत्तियाँ पशु नहीं खाते
- शमी ऐसा वृक्ष बनी जिस पर काँटे अधिक होने से पक्षी आश्रय नहीं लेते
तपस्या और वरदान
जब दोनों शौनक आश्रम नहीं पहुँचे, तब उनके पिता औरव ऋषि खोजते हुए भृशुण्डी ऋषि के आश्रम पहुँचे और पूरी घटना जानी। उन्होंने ऋषि से श्रापमोचन का अनुरोध किया, पर उन्होंने असमर्थता व्यक्त की।
तब औरव ऋषि ने भगवान गणेश की कठोर तपस्या आरंभ की। तपस्या से प्रसन्न होकर गणपति प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। ऋषि ने शमी और मंदार को पुनः मानव रूप देने का वर माँगा।
गणेशजी अपने भक्त भृशुण्डी के श्राप का अपमान नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने श्राप समाप्त नहीं किया, परंतु यह वरदान दिया:
शमी और मंदार दोनों वृक्ष तीनों लोकों में पूजनीय होंगे।
शिव तथा गणेश पूजा इनकी उपस्थिति बिना पूर्ण नहीं मानी जाएगी।
उन्होंने कहा —
- शमी गंगा और तुलसी के समान पवित्र होगी
- शमी पत्र व मंदार पुष्प अर्पण करने वाला भक्त मनोकामना फल पाएगा
·
एक शमी
पत्र
अर्पित करने से 84 लाख
योनियों
के
कष्ट
कट जाते हैं
·
भाग्य
वृद्धि:
सौभाग्य,
सुख-समृद्धि और धन की
वृद्धि करता है।
·
ग्रह दोष
मुक्ति:
यह शनि, राहु और केतु के
दोषों को दूर करने
में सहायक है।
·
नियम: स्कंद
पुराण
- अमावस्या, रविवार और सोमवार को
शमी के पत्ते नहीं
तोड़ने
चाहिए।
·
शुभ
समय: प्रदोष काल या सोमवार के
दिन शिवलिंग पर शमी पत्र
चढ़ाना विशेष रूप से फलदायी है।
शमी (Shami) के पत्ते भगवान शिव और शनिदेव को अर्पित मंत्र -
अमंगलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।
दु:स्वप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येहं शमीं शुभाम्।।
अर्पण करने का मंत्र:
ॐ परमत्मने नमः, शमी पत्रम समर्पयामि।
गणेश जी के लिए मंत्र:
त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै। शमी दलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक।।
महत्व और विधि:
·
शिवजी को: शनिवार को शिवलिंग पर शमी के पत्ते चढ़ाने से शनि दोष (साढ़े साती/ढैया) दूर होता है और सुख-समृद्धि आती है।
·
गणेश जी को: बुधवार को शमी के पत्ते गणेश जी को अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
·
विधि: ताजे और साफ पत्ते, 5 या 3 की संख्या में, सकारात्मक मन से अर्पित करें।
·
·
मैं उस शुभ शमी देवी की शरण लेता हूँ जो अमंगल का नाश करने वाली, पापों को शांत करने वाली और अशुभ स्वप्नों को दूर करने वाली है।
·
I take refuge in the auspicious Shami, who removes
misfortune, pacifies sins, and destroys bad dreams.
·
·
२. शिव अर्पण मन्त्र
ॐ परमात्मने नमः। शमीपत्रं समर्पयामि॥
·
हे परमात्मस्वरूप शिव, मैं शमी पत्र अर्पित करता हूँ।
·
O Supreme Lord, I offer these Shami leaves to You.
·
·
३. गणेश अर्पण मन्त्र
·
त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै।
शमी दलानि
हेरम्ब
गृहाण
गण नायक॥
·
हे गणनायक, हे हेरम्ब, ये कोमल और शुभ शमीदल आपको प्रिय हैं — इन्हें स्वीकार करें।
·
O Ganapati, beloved Lord Heramba, please
accept these tender and auspicious Shami leaves dear to You.
- शमी पत्र → शिव और गणेश दोनों को प्रिय
- मंदार पुष्प → विशेष पूजन फलदायक
- दोनों का संयुक्त अर्पण → मनोकामना सिद्धि का प्रतीक
✦ प्रथम प्रहर — 15 फरवरी 2026
🕕 शाम 6:11 — रात 9:00
मंत्र: ह्रीं ईशानाय नमः
✦ द्वितीय प्रहर — 15–16 फरवरी
🕘 रात 9:23 —
12:25
मंत्र: ह्रीं अघोराय नमः
✦ तृतीय प्रहर — 16 फरवरी
🕛 रात 12:35 — सुबह 3:37
मंत्र: ह्रीं वामदेवाय नमः
✦ चतुर्थ प्रहर — 16 फरवरी
🕓 सुबह 3:47 —
6:49
मंत्र: ह्रीं सद्योजाताय नमः
✦ निशीता काल (सबसे शक्तिशाली समय)
12:09 AM — 1:01 AM (लगभग 51 मिनट



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