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आरती त्रिदेव - जय शिव ओंकारा” ॐ” में एकत्व

 

त्रिदेव आरती — “ॐ” जय शिव ओंकारा

(ॐ की महिमा एवं त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की आरती)

ॐ ही सर्वव्यापी एक सत्य — ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव का प्रणव में एकत्व

व्याख्याकार

पण्डित विजेन्द्र कुमार तिवारी ‘ज्योतिष शिरोमणि’

Blogger • Astrologer • Palmist • Numerologist • Vāstu Consultant

कुण्डली निर्माण एवं कुण्डली मिलान विशेषज्ञ

ज्योतिष, हस्तरेखा, अंकशास्त्र एवं वास्तु के क्षेत्र में सन् 1972 से सतत अध्ययन एवं अनुभव

विशेष सहयोग:

डॉ. आर. दीक्षित एवं डॉ. एस. तिवारी

मोबाइल: 9424446706

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ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।

हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।

त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धर्ता।

 जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता

ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

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१. यह आरती किसने लिखी?

सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण स्वयं अंतिम पंक्ति है—

“कहत शिवानन्द स्वामी…”

अर्थात् रचना के भीतर “शिवानन्द स्वामी” नाम की भणिता है। शिवानंद स्वामी वामदेव पंड्या’  पाण्डुलिपि/प्रकाशित प्रथम संस्करण का प्रमाण नहीं है। 1601/1622 ई. के आसपास की तिथि लोक-परंपरा या बाद के स्रोतों में मिलती है, पर निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है

स्वामी विवेकानंद: - यह आरती काशी में सुनी और बाद में बेलूर मठ में प्रचलित कराई।

ॐ जय शिव ओंकारा — त्रिदेव आरती

“यह त्रिदेव आरती है। इसका उपास्य-केन्द्र शिव-ओंकार है, परन्तु आरती में ब्रह्मा, विष्णु और 

सदाशिव तीनों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। इसलिए इसे केवल शिव-आरती मानना इसके मूल भाव 

को सीमित करना होगा। 

आरती के विभिन्न पदों में तीनों देवताओं के विशिष्ट स्वरूप, वाहन, आयुध, 

वस्त्र और कार्य अलग-अलग बताए गए हैं तथा अन्त में स्वयं रचनाकार कहता है—

“ब्रह्मा विष्णु सदाशिव… प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका”। 

त्रिदेव के कार्य और स्वरूप भिन्न दिखाई देते हुए भी प्रणव ‘ॐ’ में उनकी एकता मानी गई है।

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. ॐ जय शिव ओंकारा” की त्रिदेव-आरती -—मूल पाठ → रचनाकार/काल की स्थिति → प्रत्येक शब्द → प्रत्येक देवता → वेद/उपनिषद्/पुराण/संहिता प्रमाण → आरती का वास्तविक दार्शनिक निष्कर्ष

॥ ॐ जय शिव ओंकारा — सम्पूर्ण प्रचलित आरती ॥

ब्रह्मा — सृष्टि के कर्ता

आरती में “चतुरानन= ब्रह्मा ;

-“हंसासन”, = ब्रह्मा ;

 “कमण्डलु” = ब्रह्मा ;

 तथा “जगकर्ताब्रह्मा के लिए संकेतक हैं। ;

चतुरानन अर्थात् चार मुख वाले ब्रह्मा, ;

हंसासन अर्थात् हंस को वाहन/आसन रूप में धारण करने वाले ;

ब्रह्मा और जगकर्ता अर्थात् जगत् की सृष्टि करने 

इसलिए आरती का सृष्टि-कार्य ब्रह्मा से सम्बद्ध है।

विष्णु — पालन एवं धारण करने वाले

आरती में- “चतुर्भुज”- विष्णु;, “गरुड़ासन”- विष्णु;, “पीताम्बर”- विष्णु;p, “चक्र- विष्णु”, “कंसारी”- विष्णु तथा विशेष रूप से “जगभर्ता”-  पद विष्णु से सम्बद्ध 

गरुड़ासन विष्णु का विशिष्ट वाहन-संकेत है, पीताम्बर उनका प्रसिद्ध स्वरूप-चिह्न है, चक्र उनका प्रमुख आयुध है और कंसारी कृष्णावतार से सम्बन्धित पद है। 

जगभर्ता का अर्थ है जगत् का भरण-पोषण एवं धारण करने वाला। 

अतः आरती में पालनकर्ता/जगभर्ता — विष्णु हैं।

सदाशिव — शिव एवं संहार-तत्त्व

“पंचानन”-, शिव; “वृषवाहन”- शिव, “बाघम्बर”- शिव, “त्रिशूल- शिव”, “त्रिपुरारी- शिव” तथा “जगसंहारकर्ता- शिव पद शिव/सदाशिव के विशिष्ट स्वरूप को प्रकट करते हैं। 

वृषवाहन अर्थात् वृषभवाहन शिव, 

अर्थात् व्याघ्रचर्मधारी शिव, त्रिशूल शिव का प्रमुख आयुध 

- त्रिपुरारी त्रिपुर का संहार करने वाले शिव का विशिष्ट नाम है। 

जगसंहारकर्ता पद यहाँ रुद्र-शिव के संहार-कार्य को व्यक्त करता है।

त्रिदेव की एकता — आरती का मुख्य सिद्धान्त

इस आरती की सबसे महत्त्वपूर्ण पंक्ति है—

“ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥”

यहाँ ब्रह्मा = सृष्टि, विष्णु = पालन, और सदाशिव = संहार/शिवतत्त्व के रूप में तीन कार्यात्मक स्वरूप सामने आते हैं; परन्तु आरती इन्हें तीन स्वतंत्र परम सत्ताएँ नहीं मानती।

 “प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका” द्वारा स्पष्ट किया गया है कि

 ॐ प्रणव में ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव की एकता मानी गई है।

इसी कारण “ॐ जय शिव ओंकारा” को त्रिदेव आरती कहना अधिक पूर्ण और शास्त्रीय भाव के अनुरूप है। 

इसमें ब्रह्मा को ब्रह्मा ही, विष्णु को विष्णु ही और सदाशिव को शिव ही माना गया है; उनके विशिष्ट नामों को मिटाकर सबको एक ही नाम देने का प्रयास नहीं किया गया है। भेद कार्य और स्वरूप में है, जबकि आरती का अंतिम सिद्धान्त एकत्व का है।

प्रणवाक्षर — ॐ में त्रिदेव का समावेश

“प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥”

प्रणवाक्षर = प्रणव का अक्षर, अर्थात् ॐ।

मध्ये = इसके मध्य/अन्तःस्थित।

ये तीनों = ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव।

एका = एक रूप में समाहित/एकत्व में स्थित।

अर्थात् ॐ प्रणवाक्षर के भीतर ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव—ये तीनों समाहित हैं। आरती यहाँ तीनों को अलग-अलग परम सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि ॐ के एक ही प्रणव-तत्त्व में स्थित त्रिदेव के रूप में प्रस्तुत करती है।

इसका क्रम और भी स्पष्ट है—

ॐ / प्रणवाक्षर → त्रिदेव का आधार

ब्रह्मा → सृष्टि

विष्णु → पालन

सदाशिव → संहार

तीनों → ॐ में समाहित और एक

इसलिए “मध्ये ये तीनों एका” का सीधा भाव है—“इस प्रणवाक्षर ‘ॐ’ के भीतर ये तीनों एक रूप से समाहित हैं।”

ॐ — शिव-रुद्र का प्रणव; उसमें त्रिदेव अन्तर्निहित

“ॐ जय शिव ओंकारा” में ओंकार का प्रत्यक्ष सम्बन्ध शिव-तत्त्व से है। यहाँ “ॐ” शिव-ओंकार है; अर्थात् आरती का केन्द्र शिव/रुद्र-तत्त्व है।

इसके बाद—

“ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥”

“अर्द्धांगी धारा” का अर्थ है अर्द्धांगिनी को धारण करने वाले।

यहाँ अर्द्धांगी = अर्द्ध + अंग → जिसका आधा अंग/अर्ध-भाग हो, अर्थात पत्नी या शक्ति, और धारा = धारण की / धारण करने वाले।

शिव के संदर्भ में इसका संकेत अर्धनारीश्वर रूप से है—शिव ने अपने शरीर के अर्धभाग में पार्वती/शक्ति को धारण किया है।

इसलिए पंक्ति “ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा” का भाव है कि ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव—इन दिव्य तत्त्वों में शक्ति का संबंध/अविभाज्य संयोग है, और शिव के लिए विशेष रूप से यह शिव-शक्ति की अभिन्नता को सूचित करता है।

और आगे निर्णायक पंक्ति आती है—

“ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥”

जानत अविवेका” का शाब्दिक अर्थ है:

आरती की पंक्ति में “ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका” का भाव सामान्यतः यह लिया जाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव के वास्तविक एकत्व का पूर्ण रहस्य सामान्य बुद्धि से जानना कठिन है।

इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि “तीन देवता एक ही हैं।” अधिक सूक्ष्म अर्थ यह है कि शिव-ओंकार के प्रणवाक्षर में ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव तीनों अन्तर्निहित हैं।

यहाँ दो स्तर अलग-अलग समझने चाहिए।

प्रथम — शिव-तत्त्व की प्रधानता:

ॐ = शिव-ओंकार = शिव/रुद्र का प्रणव-स्वरूप।

द्वितीय — त्रिदेव की अन्तर्निहित सत्ता:

उसी ॐ में ब्रह्मा का सृष्टि-तत्त्व, विष्णु का पालन-तत्त्व और रुद्र/सदाशिव का संहार एवं परम शिव-तत्त्व अन्तर्निहित हैं।

इसलिए ब्रह्मा और विष्णु का पृथक् देवस्वरूप भी नकारा नहीं है। 

वे अपने-अपने विशिष्ट अस्तित्व और कार्य रखते हैं—ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालक, रुद्र संहारकर्ता—किन्तु आरती का सिद्धान्त यह है कि इन तीनों की सत्ता शिव-ओंकार के प्रणव में अन्तर्निहित और एकीकृत है।

इसीलिए “एका” को “तीनों का पृथक् अस्तित्व ही नहीं है” कहना भी ठीक नहीं होगा। यहाँ पृथक् देवस्वरूप स्वीकार करके उनके मूल प्रणव-एकत्व को बताया गया है।

एकदम संक्षेप में:

ॐ = शिव/रुद्र का ओंकार-तत्त्व

ॐ में = ब्रह्मा + विष्णु + सदाशिव अन्तर्निहित

ब्रह्मा = सृष्टि-कार्य

विष्णु = पालन-कार्य

रुद्र/सदाशिव = संहार एवं शिव-तत्त्व

तीनों का अपना देवस्वरूप है, फिर भी तीनों की सत्ता प्रणव “ॐ” में एकीकृत है।

ॐ किसका है — शिव, रुद्र और परब्रह्म का प्रणव-स्वरूप

माण्डूक्य उपनिषद् १ सबसे व्यापक आधार देता है—

“ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं

तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव।

यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव॥”

अर्थात् जो भूत, वर्तमान और भविष्य है—वह सब ओंकार ही है; और जो त्रिकाल से परे है, वह भी ओंकार ही है। 

इससे ॐ को केवल किसी एक सीमित देवता का सामान्य नाम मानना उचित नहीं; यह समस्त चराचर और उसके परम आधार का प्रणव-अक्षर है। यह “त्रिदेव आरती” क्यों है?

इस आरती का सबसे निर्णायक पद है—

“ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥”

यहीं कवि स्वयं सिद्धान्त बता देता है:

ब्रह्मा + विष्णु + सदाशिव = ॐ/प्रणव के भीतर एक।

इसलिए यह केवल शिव की सामान्य आरती नहीं है; इसका मुख्य दार्शनिक विषय त्रिदेव की एकता है।

लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बात पकड़नी जरूरी है।

आरती शिव को केन्द्र में रखती है, क्योंकि आरम्भ है—

“जय शिव ओंकारा”

और अन्त में—

“त्रिगुण शिवजी की आरती…”

अर्थात् उपास्य शिव-ओंकार हैं, पर उनके भीतर ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव की त्रिविध सत्ता/कार्यरूप एकता दिखाई गई है। आधुनिक स्रोत भी इसी को आरती की केंद्रीय धारणा बताते हैं। 

________________________________________

३. “ॐ” — किसका?

ॐ = प्रणव = ओंकार।

आरती में “ओंकारा” शब्द सीधे ॐ के स्वरूप शिव के लिए प्रयुक्त है।

यह केवल कवि की कल्पना नहीं है कि ॐ कोई सामान्य ध्वनि है। उपनिषद् परम्परा में ॐ को ब्रह्मतत्त्व का अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीक माना गया है।

और शैव आगमिक परम्परा में ॐ के अक्षरों को देवताओं से जोड़ा गया है। शिवमहापुराण की कैलाससंहिता के एक अंश में—

“उकारं विष्णुसहितं…

मकारं रुद्रसहितं…”

अर्थात् उकार के साथ विष्णु और मकार के साथ रुद्र का न्यास बताया गया है। 

ध्यान दें—यहाँ से आरती का “प्रणवाक्षर में तीनों एका” सिद्धान्त बहुत गहराई से समझ आता है।

अथर्वशिखा उपनिषद् में ॐ को परब्रह्म कहा गया है और उसके अन्त में स्पष्टतः ॐकार को शिव से सम्बद्ध किया गया है।

- उपनिषद् में ॐ के भीतर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के देवता-सम्बन्ध भी दिए गए हैं। 

ॐ के भीतर ब्रह्मा–विष्णु–रुद्र

अथर्वशिखा उपनिषद् में प्रणव के विभाग के अनुसार—

अकार → ब्रह्मा

उकार → विष्णु

मकार → रुद्र

और चौथा अर्धमात्रा/परम तत्त्व → पुरुष/परब्रह्म। 

इसलिए आपके वाक्य को शास्त्रीय रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है:

ॐ शिव-रुद्र का प्रणवस्वरूप है; और उसी प्रणव के अकार, उकार तथा मकार में क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र अन्तर्निहित हैं। अतः सृष्टि, स्थिति और संहार—ये तीनों शक्तियाँ ॐ के अधीन एवं उसी प्रणव-तत्त्व में समाहित हैं।

यहाँ “अधीन” का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्मा और विष्णु का कोई पृथक् देवस्वरूप ही नहीं है। उनका पृथक् देवस्वरूप और कार्य है, परन्तु उनका मूल दैवी तत्त्व प्रणव में अन्तर्निहित है।

आरती की पंक्ति का वास्तविक अर्थ

“ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥”

यहाँ—

प्रणवाक्षर = ॐ

मध्ये = उसके भीतर

ये तीनों = ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव

एका = एकत्व में अन्तर्निहित/समाहित

इसलिए इसका अर्थ केवल “तीनों देवता एक ही हैं” नहीं है।

अधिक सटीक अर्थ है:

“प्रणवाक्षर ॐ के भीतर ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव तीनों अन्तर्निहित हैं; तीनों के पृथक् देवस्वरूप होते हुए भी उनकी मूल सत्ता प्रणव में एकीकृत है।”

और शिव-प्रधानता कहाँ से आती है?

अथर्वशिखा उपनिषद् में एक ओर ॐ को परब्रह्म कहा गया है, दूसरी ओर उसके देवता-विभाग में ब्रह्मा–विष्णु–रुद्र को रखा गया है, और आगे ॐ-ध्वनि को शिव से अभिन्न बताया गया है। 

इसलिए “ॐ जय शिव ओंकारा” में:

ॐ = ओंकार = शिव/रुद्र का परम प्रणव-स्वरूप

और उसी ॐ में—

ब्रह्मा = सृष्टि-शक्ति

विष्णु = पालन/स्थिति-शक्ति

रुद्र/सदाशिव = संहार तथा शिव-तत्त्व

तीनों अन्तर्निहित हैं।

शिवपुराण की रुद्रसंहिता, सृष्टिखण्ड 5.30 भी शैव दृष्टि से इससे अत्यन्त निकट कथन देती है—

“ब्रह्मा विष्णुर्महेशश्च त्रयो देवाः शिवांशजाः।

महेशस्तत्र पूर्णांशः स्वयमेव शिवः परः॥”

अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन देव शिवांश से प्रकट होते हैं और महेश पूर्णांश, स्वयं परशिव हैं। 

इसका सबसे स्पष्ट ग्रंथीय सूत्र

ॐ → परब्रह्म

ॐ → शिव/रुद्र का प्रणवस्वरूप

अकार → ब्रह्मा

उकार → विष्णु

मकार → रुद्र

अर्धमात्रा → परम पुरुष/परतत्त्व

समस्त चराचर → ॐ के अन्तर्गत

सृष्टि → ब्रह्मा

स्थिति → विष्णु

संहार → रुद्र

 “समस्त चराचर ॐ के अधीन नियंत्रण में है”         

“समस्त चराचर का परम आधार प्रणव ‘ॐ’ है; 

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की सृष्टि–स्थिति–संहार शक्तियाँ भी उसी प्रणव-तत्त्व में अन्तर्निहित हैं।” माण्डूक्य का “सर्वमोङ्कार एव” इसी व्यापकता का सबसे सीधा प्रमाण है

“प्रणवाक्षर ‘ॐ’ के भीतर ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव—तीनों अन्तर्निहित हैं; सृष्टि, स्थिति और संहार की त्रिविध शक्तियाँ उसी प्रणव-तत्त्व में समाहित हैं।”

सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष

ॐ = केवल ब्रह्मा नहीं।

ॐ = केवल विष्णु नहीं।

ॐ = केवल रुद्र भी सीमित अर्थ में नहीं।

उपनिषद्-स्तर पर ॐ = सम्पूर्ण ब्रह्म/समस्त अस्तित्व का प्रणव।

और “ॐ जय शिव ओंकारा” की शैव आरती में वही प्रणव शिव-रुद्र के साथ अभिन्न सम्बद्ध है।  प्रणव में ब्रह्मा–विष्णु–सदाशिव अन्तर्निहित माहैं।

- आरती का सूत्र:

ॐ → शिव-ओंकार → प्रणव

प्रणव में → ब्रह्मा + विष्णु + सदाशिव

ब्रह्मा → सृष्टि

विष्णु → पालन

रुद्र/सदाशिव → संहार

समस्त चराचर → ॐ के भीतर/ॐ से व्याप्त

यही “प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका” अर्थ है।

              त्रिदेव - “प्रणवाक्षर” ॐ में एक है



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28 सितंबर गणेश विसर्जन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए जिस प्रकार उसका प्रारंभ किया जाता है समापन भी किया जाना उद्देश्य होता है। गणेश जी की स्थापना पार्थिव पार्थिव (मिटटीएवं जल   तत्व निर्मित)     स्वरूप में करने के पश्चात दिनांक 23 को उस पार्थिव स्वरूप का विसर्जन किया जाना ज्योतिष के आधार पर सुयोग है। किसी कार्य करने के पश्चात उसके परिणाम शुभ , सुखद , हर्षद एवं सफलता प्रदायक हो यह एक सामान्य उद्देश्य होता है।किसी भी प्रकार की बाधा व्यवधान या अनिश्ट ना हो। ज्योतिष के आधार पर लग्न को श्रेष्ठता प्रदान की गई है | होरा मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना गया है।     गणेश जी का संबंध बुधवार दिन अथवा बुद्धि से ज्ञान से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों प्रतियोगियों एवं बुद्धि एवं ज्ञान में रूचि है , ऐसे लोगों के लिए बुध की होरा श्रेष्ठ होगी तथा उच्च पद , गरिमा , गुरुता , बड़प्पन , ज्ञान , निर्णय दक्षता में वृद्धि के लिए गुरु की हो रहा श्रेष्ठ होगी | इसके साथ ही जल में विसर्जन कार्य होता है अतः चंद्र की होरा सामा...

श्राद्ध रहस्य - श्राद्ध क्यों करे ? कब श्राद्ध नहीं करे ? पिंड रहित श्राद्ध ?

श्राद्ध रहस्य - क्यों करे , न करे ? पिंड रहित , महालय ? किसी भी कर्म का पूर्ण फल विधि सहित करने पर ही मिलता है | * श्राद्ध में गाय का ही दूध प्रयोग करे |( विष्णु पुराण ) | श्राद्ध भोजन में तिल अवश्य प्रयोग करे | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि - श्राद्ध अपरिहार्य - अश्वनी माह के कृष्ण पक्ष तक पितर अत्यंत अपेक्षा से कष्ट की   स्थिति में जल , तिल की अपनी संतान से , प्रतिदिन आशा रखते है | अन्यथा दुखी होकर श्राप देकर चले जाते हैं | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि इसको नहीं करने से पीढ़ी दर पीढ़ी संतान मंद बुद्धि , दिव्यांगता .मानसिक रोग होते है | हेमाद्रि ग्रन्थ - आषाढ़ माह पूर्णिमा से /कन्या के सूर्य के समय एक दिन भी श्राद्ध कोई करता है तो , पितर एक वर्ष तक संतुष्ट/तृप्त रहते हैं | ( भद्र कृष्ण दूज को भरणी नक्षत्र , तृतीया को कृत्तिका नक्षत्र   या षष्ठी को रोहणी नक्षत्र या व्यतिपात मंगलवार को हो ये पिता को प्रिय योग है इस दिन व्रत , सूर्य पूजा , गौ दान गौ -दान श्रेष्ठ | - श्राद्ध का गया तुल्य फल- पितृपक्ष में मघा सूर्य की अष्टमी य त्रयोदशी को मघा नक्षत्र पर चंद्र ...

गणेश भगवान - पूजा मंत्र, आरती एवं विधि

सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

विवाह बाधा और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा पूजा

विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । 10 oct - 18 oct विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन कर...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...