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Sheetala Ashtami — शीतला अष्टमी-1

 Sheetala Ashtami — शीतला अष्टमी

वर्ष में चार शीतला अष्टमी

⭐ अनेक क्षेत्रों एवं तांत्रिक-लोक परम्पराओं में वर्ष में 4 प्रमुख शीतला पूजन माने गये हैं।
⭐ विभिन्न प्रदेशों में तिथि-मान्यता अलग हो सकती है।

किन महीनों में मानी जाती हैं

⭐ चैत्र कृष्ण अष्टमी — मुख्य शीतला अष्टमी (होली बाद)
⭐ वैशाख कृष्ण अष्टमी — ग्रीष्म रोग शांति
⭐ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी — दाह-ज्वर, जलजनित रोग रक्षा
⭐ आषाढ़/श्रावण कृष्ण अष्टमी — वर्षा संक्रमण एवं महामारी शांति

इन महीनों का विशेष महत्व क्यों

⭐ चैत्र — ऋतु परिवर्तन, चेचक/त्वचा रोग काल
⭐ वैशाख — तीव्र गर्मी, पित्त-दाह वृद्धि
⭐ ज्येष्ठ — जल अशुद्धि, ज्वर, संक्रमण भय
⭐ आषाढ़/श्रावण — वर्षा जनित रोग, कीटाणु वृद्धि

आयुर्वेदिक कारण

⭐ चरकसंहिता में ऋतु-संधि को रोगोत्पत्ति काल कहा गया।
⭐ ग्रीष्म एवं वर्षा पूर्व “पित्त”, “रक्तदोष”, “कृमि”, “त्वचा विकार” वृद्धि मानी गयी।
⭐ नीम, शीतल आहार, उपवास, स्वच्छता — रोग प्रतिरोध बढ़ाने हेतु लोकव्यवस्था बनी।

पौराणिक एवं तांत्रिक आधार

⭐ स्कन्दपुराण — शीतला माहात्म्य
⭐ भविष्यपुराण — रोगशांति एवं ग्रामरक्षा संकेत
⭐ देवीभागवत — मातृका शक्तियों का वर्णन
⭐ तंत्रसार एवं लोक तांत्रिक परम्पराएँ — महामारी शांति अनुष्ठान
⭐ “शीतला कल्प” (लोकग्रंथ/क्षेत्रीय पांडुलिपियाँ) में मासिक पूजन वर्णित मिलता है।

ग्रंथ प्रमाण

⭐ “शीतले शीतले चेति यो ब्रूयात् पीडितो नरः।
विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति॥”
— स्कन्दपुराण, शीतला माहात्म्य

⭐ “नमामि शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।”
— शीतला स्तोत्र

⭐ अथर्ववेद में ज्वर-शांति एवं रोगनाश सूक्तों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें बाद की शीतला उपासना से जोड़ा गया।

Sheetala Ashtami 2026–2028

वर्ष की 4 प्रमुख शीतला सप्तमी–अष्टमी

⭐ द्रिक पंचांग, चंद्र तिथि एवं कृष्ण पक्ष अष्टमी/सप्तमी आधार पर

2026

⭐ चैत्र शीतला सप्तमी — 10 मार्च 2026, मंगलवार
⭐ चैत्र शीतला अष्टमी — 11 मार्च 2026, बुधवार

⭐ वैशाख कृष्ण सप्तमी — 23 अप्रैल 2026, गुरुवार
⭐ वैशाख कृष्ण अष्टमी — 24 अप्रैल 2026, शुक्रवार

⭐ ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी — 22 मई 2026, शुक्रवार
⭐ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी — 23 मई 2026, शनिवार

⭐ आषाढ़ कृष्ण सप्तमी — 20 जून 2026, शनिवार
⭐ आषाढ़ कृष्ण अष्टमी — 21 जून 2026, रविवार

2027

⭐ चैत्र शीतला सप्तमी — 29 मार्च 2027, सोमवार
⭐ चैत्र शीतला अष्टमी — 30 मार्च 2027, मंगलवार

⭐ वैशाख कृष्ण सप्तमी — 22 अप्रैल 2027, गुरुवार
⭐ वैशाख कृष्ण अष्टमी — 23 अप्रैल 2027, शुक्रवार

⭐ ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी — 21 मई 2027, शुक्रवार
⭐ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी — 22 मई 2027, शनिवार

⭐ आषाढ़ कृष्ण सप्तमी — 19 जून 2027, शनिवार
⭐ आषाढ़ कृष्ण अष्टमी — 20 जून 2027, रविवार

2028

⭐ चैत्र शीतला सप्तमी — 16 मार्च 2028, गुरुवार
⭐ चैत्र शीतला अष्टमी — 17 मार्च 2028, शुक्रवार

⭐ वैशाख कृष्ण सप्तमी — 14 अप्रैल 2028, शुक्रवार
⭐ वैशाख कृष्ण अष्टमी — 15 अप्रैल 2028, शनिवार

⭐ ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी — 14 मई 2028, रविवार
⭐ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी — 15 मई 2028, सोमवार

⭐ आषाढ़ कृष्ण सप्तमी — 12 जून 2028, सोमवार
⭐ आषाढ़ कृष्ण अष्टमी — 13 जून 2028, मंगलवार

ग्रंथ एवं परम्परा प्रमाण

⭐ स्कन्दपुराण — शीतला माहात्म्य
⭐ भविष्यपुराण — रोगशांति एवं ग्रामरक्षा संकेत
⭐ लोक-तांत्रिक “शीतला कल्प” परम्परा
⭐ उत्तरभारत “बसौड़ा माता” परंपरा
⭐ गुजरात “शीतला सातम” परम्परा

क्यों 4 बार विशेष मानी गयी

⭐ चैत्र — चेचक, त्वचा रोग शांति
⭐ वैशाख — पित्त, दाह, जलन नियंत्रण
⭐ ज्येष्ठ — जलजनित रोग, ज्वर सुरक्षा
⭐ आषाढ़ — वर्षा संक्रमण, महामारी रक्षा

विशेष मान्यता

⭐ सप्तमी — भोजन तैयारी, अग्नि विश्राम, गृहशुद्धि
⭐ अष्टमी — मुख्य माता पूजन, रोग शांति, बसौड़ा भोग

शास्त्रीय श्लोक

⭐ “शीतले शीतले चेति यो ब्रूयात् पीडितो नरः।
विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति॥”
— स्कन्दपुराण, शीतला माहात्म्य

⭐ “नमामि शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।”
— शीतला स्तोत्र

क्या सभी की कथा अलग है?

⭐ मूल देवी एवं रोग-शांति तत्व समान रहते हैं।
⭐ पर क्षेत्र अनुसार कथाएँ अलग मिलती हैं —

⭐ चैत्र — चेचक एवं होली बाद रोग शांति कथा
⭐ वैशाख — अग्निदाह एवं पित्त शांति कथा
⭐ ज्येष्ठ — जल-संकट एवं ज्वर रक्षा कथा
⭐ आषाढ़/श्रावण — महामारी एवं ग्रामरक्षा कथा

क्षेत्रीय लोककथाएँ

⭐ राजस्थान — बसौड़ा माता कथा
⭐ गुजरात — शीतला माताजी रोग रक्षा कथा
⭐ बंगाल — ओलईचंडी/शीतला रूप
⭐ उत्तरभारत — चेचक माता कथा

ज्योतिषीय दृष्टि

⭐ राहु–केतु, चंद्र, षष्ठ भाव पीड़ा में पूजन शुभ माना गया।

⭐ ग्रीष्म–वर्षा संक्रमण काल में ग्रहजन्य रोगभय शांति हेतु लोकविश्वास बना।⭐ रोग शांति • ज्वर निवारण • संक्रमण सुरक्षा • मानसिक शीतलता • ग्रहदोष शमन

तिथि एवं स्वरूप

⭐ शीतला अष्टमी सामान्यतः होली के बाद कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाई जाती है।
⭐ देवी शीतला को रोगनाशिनी, ज्वरहरिणी, चेचक-निवारिणी एवं शरीर-मन को शीतल करने वाली शक्ति माना गया है।
⭐ हाथ में झाड़ू, कलश, नीम-पत्र, सूप एवं गधा वाहन — यह प्रतीकात्मक रूप से रोग-सफाई, विषहरण, शुद्धि और जनस्वास्थ्य का संकेत माने गये।

पुराण कथाएँ

⭐ स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण एवं लोक परम्पराओं में वर्णन मिलता है कि जब नगर में महामारी, दाह-ज्वर, फोड़े-फुंसी, चेचक आदि फैले तब देवी शीतला की आराधना से रोग शांत हुए।

⭐ एक प्रसिद्ध कथा —
एक राज्य में रानी ने शीतला अष्टमी पर गरम भोजन बनाया जबकि एक निर्धन स्त्री ने एक दिन पूर्व निर्मित शीतल भोजन अर्पित किया। राज्य में अग्निदाह, फोड़े, रोग फैले किन्तु निर्धन स्त्री का परिवार सुरक्षित रहा। तब राजा ने देवी से क्षमा मांगी और शीतला पूजन प्रारम्भ कराया।

शास्त्रीय प्रमाण

⭐ “शीतले शीतले चेति यो ब्रूयात् पीडितो नरः।
विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति॥”
— स्कन्दपुराण, शीतला माहात्म्य

अर्थ — जो व्यक्ति “शीतले-शीतले” का स्मरण करता है, उसके भयंकर फोड़े-फुंसी एवं रोग भय शीघ्र नष्ट होते हैं।

⭐ “नमामि शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्॥”
— शीतला स्तोत्र

अर्थ — गधा वाहन पर विराजमान, झाड़ू और कलश धारण करने वाली देवी शीतला को नमस्कार।

बीज मंत्र एवं मुख्य मंत्र

⭐ बीज मंत्र —
“ॐ श्रीं शीतलायै नमः॥”

⭐ रोग शांति मंत्र —
“ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै रोगनाशिन्यै नमः॥”

⭐ ज्वर शमन मंत्र —
“ॐ शीतले शीतले मातः सर्वरोगं विनाशय॥”

तांत्रिक एवं ज्योतिषीय संदर्भ

⭐ तंत्रग्रंथों में शीतला साधना को “उग्र रोग शांति” एवं “ग्राम रक्षा” साधना कहा गया।
⭐ राहु, केतु, चंद्र एवं षष्ठ भाव पीड़ा होने पर शीतला पूजन को लाभकारी माना गया।
⭐ चेचक, त्वचा रोग, संक्रमण, भय, दुःस्वप्न, मानसिक अशांति में नीम एवं शीतल उपासना का उल्लेख मिलता है।
⭐ मुहूर्त चिन्तामणि एवं लोक-ज्योतिष परम्पराओं में ग्रीष्म पूर्व रोग-निवारक अनुष्ठान के रूप में इसका वर्णन मिलता है।

क्या खायें

⭐ एक दिन पूर्व बना शीतल सात्त्विक भोजन
⭐ दही
⭐ मीठी पूड़ी
⭐ चने
⭐ खीर
⭐ जौ
⭐ नीम-पत्र अल्प मात्रा
⭐ ठंडा दूध
⭐ बेल, मिश्री, सत्तू

क्या न खायें

⭐ गरम ताजा तला भोजन
⭐ अत्यधिक मिर्च-मसाला
⭐ मद्य-मांस
⭐ क्रोध में भोजन
⭐ बासी दूषित या सड़ा भोजन
⭐ अत्यधिक तेलीय पदार्थ

वैज्ञानिक एवं स्वास्थ्य पक्ष

⭐ नीम — एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल गुण
⭐ उपवास एवं हल्का भोजन — पाचन तंत्र को विश्राम
⭐ ग्रीष्म ऋतु पूर्व स्वच्छता अभियान का सांस्कृतिक रूप
⭐ ठंडे-सात्त्विक भोजन से शरीर की ऊष्णता संतुलन
⭐ सामूहिक पूजा से सामाजिक स्वास्थ्य अनुशासन
⭐ धुआँ, नीम, गोबर-लीपन आदि पुराने समय में कीट नियंत्रण के उपाय माने गये

किन रोगों से रक्षा की मान्यता

⭐ चेचक
⭐ फोड़े-फुंसी
⭐ त्वचा संक्रमण
⭐ ज्वर
⭐ नेत्र-दाह
⭐ महामारी भय
⭐ मानसिक चिड़चिड़ापन
⭐ अत्यधिक शरीर ऊष्णता

दान का महत्व

⭐ दही दान
⭐ जल पात्र दान
⭐ नीम वृक्ष रोपण
⭐ वस्त्र दान
⭐ रोगियों को औषधि सहायता
⭐ शीतल पेय वितरण

पूजा विधि संक्षेप

⭐ प्रातः स्नान
⭐ घर स्वच्छता
⭐ नीम पत्र स्थापित करें
⭐ शीतला माता चित्र/प्रतिमा पूजन
⭐ ठंडे भोजन का भोग
⭐ दीपक में घी प्रयोग
⭐ शीतला स्तोत्र पाठ
⭐ रोगियों हेतु प्रार्थना

प्रश्न–उत्तर

⭐ प्रश्न — शीतला माता का वाहन गधा क्यों?
⭐ उत्तर — तंत्र एवं लोकपरंपरा में गधा रोग, भार एवं अशुद्धि वहन का प्रतीक माना गया। देवी रोगभार हरती हैं।

⭐ प्रश्न — नीम क्यों प्रयोग होता है?
⭐ उत्तर — आयुर्वेद में नीम को कृमिनाशक, रक्तशोधक एवं संक्रमणरोधी माना गया।

⭐ प्रश्न — बासी भोजन क्यों?
⭐ उत्तर — मूल भावना “अग्नि विश्राम” एवं शीतलता थी; पर आधुनिक समय में दूषित भोजन नहीं खाना चाहिए। स्वच्छ एवं सुरक्षित भोजन ही लें।

⭐ प्रश्न — क्या यह केवल अंधविश्वास है?
⭐ उत्तर — इसमें धार्मिक आस्था के साथ स्वच्छता, रोग-निवारण, सामुदायिक अनुशासन, ऋतु-परिवर्तन स्वास्थ्य सिद्धांत भी जुड़े हैं।

वेद एवं आयुर्वेदिक संकेत

⭐ अथर्ववेद में ज्वर, संक्रमण एवं शांति सूक्तों का वर्णन मिलता है।
⭐ चरकसंहिता एवं सुश्रुतसंहिता में ऋतुचर्या, स्वच्छता एवं दाह-शमन उपाय वर्णित हैं।
⭐ “शीत” सिद्धांत पित्त एवं दाह शमन से जुड़ा माना गया।

Sheetala Ashtami एवं शीतला सप्तमी

⭐ आयुर्वेदिक महत्व • रोग रक्षा • ऋतु परिवर्तन सुरक्षा • शरीर-मन शीतलता

आयुर्वेदिक महत्व एवं रोग रक्षा

⭐ आयुर्वेद अनुसार फाल्गुन–चैत्र काल में “पित्त”, त्वचा विकार, फोड़े-फुंसी, ज्वर, संक्रमण, नेत्र-दाह, जलन, एलर्जी बढ़ने की संभावना मानी गयी।

⭐ शीतला पूजन में प्रयुक्त —
नीम, दही, जौ, सत्तू, शीतल जल, हल्का भोजन — शरीर को शांति एवं पाचन संतुलन देने वाले माने गये।

⭐ चरकसंहिता में ऋतु परिवर्तन पर “लघु, शीतल, सुपाच्य” आहार का महत्व बताया गया।

⭐ नीम के गुण —
कृमिघ्न • रक्तशोधक • त्वचा सुरक्षा • संक्रमण नियंत्रण

⭐ उपवास एवं सीमित भोजन —
अग्नि संतुलन • पाचन विश्राम • शरीर उष्णता नियंत्रण

⭐ ग्रामीण भारत में यह पर्व जनस्वास्थ्य एवं स्वच्छता अभियान जैसा कार्य करता था।

शीतला सप्तमी एवं अष्टमी में अंतर

⭐ कई प्रदेशों में सप्तमी को “बसौड़ा/बसेउड़ा” बनता है और अष्टमी को माता पूजन होता है।
⭐ कहीं-कहीं सप्तमी मुख्य मानी जाती है, कहीं अष्टमी।
⭐ राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में दोनों तिथियाँ प्रचलित।

पौराणिक अंतर

⭐ सप्तमी —
भोजन तैयारी, गृहशुद्धि, अग्नि विश्राम, रोग निवारण तैयारी।

⭐ अष्टमी —
मुख्य देवी पूजन, रोगशांति प्रार्थना, शीतल भोग, स्तोत्र पाठ।

वर्ष में कितनी बार?

⭐ मुख्य शीतला अष्टमी — वर्ष में 1 बार (होली के बाद कृष्ण पक्ष अष्टमी)।

⭐ किन्तु लोक परम्पराओं में —
चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ अथवा श्रावण में भी स्थानीय “शीतला माता मेला/पूजन” होते हैं।

⭐ तांत्रिक परम्पराओं में मासिक कृष्ण अष्टमी पर भी कुछ लोग शीतला जप करते हैं।

शास्त्रीय संदर्भ

⭐ “शीतले दहमे पापं पुत्रपौत्रसुखप्रदे।”
— लोकप्रचलित शीतला स्तुति

⭐ “मार्जनी कलशोपेता शूर्पालंकृतमस्तका।”
— शीतला स्तोत्र

⭐ स्कन्दपुराण में देवी को विस्फोटक (फोड़े/चेचक) भय नाशिनी कहा गया।

ज्योतिषीय मान्यता

⭐ राहु–केतु पीड़ा
⭐ चंद्र दोष
⭐ षष्ठ भाव रोग कष्ट
⭐ त्वचा रोग योग
⭐ बालरोग भय
इन स्थितियों में शीतला पूजन शुभ माना गया।

क्या करें

⭐ नीम पूजन
⭐ रोगियों को फल-दही दान
⭐ जलसेवा
⭐ घर स्वच्छता
⭐ क्रोध त्याग
⭐ हल्का सात्त्विक भोजन

क्या न करें

⭐ दूषित बासी भोजन
⭐ अत्यधिक तीखा भोजन
⭐ रोगी की उपेक्षा
⭐ गंदगी
⭐ जल अशुद्धि
⭐ अत्यधिक धूप-उष्णता exposure

Sheetala Ashtami की विस्तृत पौराणिक कथा

⭐ स्कन्दपुराण • लोकपुराण • ग्रामदेवी परंपरा • रोगशांति रहस्य

देवी शीतला का प्राकट्य

⭐ प्राचीन काल में पृथ्वी पर भयंकर महामारी फैली।
⭐ लोगों के शरीर पर फोड़े-फुंसी, चेचक, जलन, तेज ज्वर और नेत्रदाह होने लगे।
⭐ नगर सूने होने लगे, बच्चे रोगग्रस्त हो गये, पशु भी मरने लगे।

⭐ तब ऋषि-मुनियों एवं देवताओं ने आदिशक्ति की आराधना की।
⭐ उनकी प्रार्थना सुनकर देवी ने एक अद्भुत रूप धारण किया —
⭐ शरीर से शीतल प्रकाश निकल रहा था।
⭐ हाथ में झाड़ू, कलश, सूप और नीम-पत्र थे।
⭐ वे गधे पर सवार थीं।

⭐ देवताओं ने पूछा —
“माता! यह रूप कैसा?”

⭐ देवी बोलीं —
“जब मनुष्य अशुद्धि, गंदगी, दूषित जल, क्रोध, अत्यधिक उष्ण भोजन और रोगियों की उपेक्षा करेगा तब रोग उत्पन्न होंगे। मैं शुद्धता, शीतलता और रोगशांति का संदेश देने आयी हूँ।”

ज्वरासुर की कथा

⭐ स्कन्दपुराण की लोकव्याख्याओं में वर्णन मिलता है कि “ज्वरासुर” नामक एक उग्र दैत्य था।
⭐ वह मनुष्यों में ज्वर, जलन, फोड़े और महामारी फैलाता था।

⭐ उसके प्रभाव से —
⭐ बच्चों को तेज बुखार
⭐ त्वचा पर फफोले
⭐ आँखों में जलन
⭐ शरीर में पीड़ा
फैलने लगी।

⭐ देवताओं ने देवी शीतला से रक्षा की प्रार्थना की।

⭐ देवी ने नीम-पत्र और अमृतकलश से रोगग्रस्त लोगों पर शीतल जल छिड़का।
⭐ ज्वरासुर की उग्र अग्नि शांत होने लगी।
⭐ जहाँ नीम, स्वच्छता और शीतलता रही वहाँ रोग कम होने लगे।

⭐ तब देवी ने कहा —
“जो मनुष्य स्वच्छता रखेगा, रोगियों की सेवा करेगा, संयमित भोजन करेगा और करुणा रखेगा, उसे मैं रोगभय से रक्षा दूँगी।”

राजा, रानी और निर्धन वृद्धा की कथा

⭐ एक नगर में राजा का विशाल राज्य था।
⭐ होली के कुछ दिन बाद नगर में चेचक फैल गयी।
⭐ राजमहल में भी रोग पहुँच गया।

⭐ राजा ने बड़े यज्ञ कराये, पर रोग शांत नहीं हुआ।

⭐ उसी नगर में एक निर्धन वृद्धा रहती थी।
⭐ वह शीतला माता की उपासक थी।
⭐ सप्तमी को उसने भोजन बनाकर अष्टमी के लिए रख दिया।
⭐ उसने घर में नीम रखा, जल स्वच्छ रखा और रोगियों की सेवा की।

⭐ अष्टमी को उसने शीतल भोजन का भोग लगाया और यह मंत्र जपा —

⭐ “ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै रोगनाशिन्यै नमः॥”

⭐ आश्चर्य — उसके परिवार को रोग का प्रभाव नहीं हुआ।

⭐ रानी ने उसका उपहास किया और कहा —
“बासी भोजन और नीम से क्या होगा?”

⭐ रानी ने अष्टमी पर अत्यधिक गरम, तीखा और तला भोजन बनवाया।
⭐ राजमहल में गंदगी और अव्यवस्था भी थी।

⭐ उसी रात्रि राजपरिवार में तेज ज्वर और फोड़े फैल गये।

⭐ भयभीत राजा वृद्धा के पास गया।
⭐ वृद्धा बोली —
“माता शीतला केवल पूजा नहीं, शुद्धता और संयम का संदेश हैं।”

⭐ तब राजा ने पूरे राज्य में —
⭐ स्वच्छ जल
⭐ रोगी पृथक्करण
⭐ घर सफाई
⭐ नीम प्रयोग
⭐ रोगियों की सेवा
⭐ शीतला पूजन
का आदेश दिया।

⭐ धीरे-धीरे महामारी शांत होने लगी।
⭐ तभी से शीतला सप्तमी-अष्टमी एवं “बसौड़ा” परंपरा प्रारम्भ हुई।

सात बहनों की लोककथा

⭐ राजस्थान, गुजरात एवं उत्तरभारत में शीतला माता को सात बहनों में एक माना गया।
⭐ कहा जाता है कि वे गाँव-गाँव जाकर रोग और स्वास्थ्य का निरीक्षण करती थीं।

⭐ जहाँ —
⭐ स्वच्छता
⭐ करुणा
⭐ शीतल भोजन
⭐ रोगी सेवा
⭐ जल शुद्धि
होती थी वहाँ माता कृपा करती थीं।

⭐ जहाँ गंदगी, क्रोध, असंयम और रोगियों का अपमान होता था वहाँ रोग फैलते थे।

स्कन्दपुराण प्रमाण

⭐ “शीतले शीतले चेति यो ब्रूयात् पीडितो नरः।
विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति॥”

अर्थ —
जो “शीतले-शीतले” स्मरण करता है उसका फोड़े-फुंसी एवं महामारी भय दूर होता है।

शीतला स्तोत्र

⭐ “नमामि शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्॥”

अर्थ —
गधा वाहन पर विराजमान, झाड़ू और कलश धारण करने वाली देवी को प्रणाम।

कथा का गूढ़ रहस्य

⭐ झाड़ू — सफाई
⭐ नीम — औषधि
⭐ कलश — शुद्ध जल
⭐ शीतल भोजन — पित्त शांति
⭐ रोगी सेवा — करुणा
⭐ अग्नि विश्राम — शरीर संतुलन

आयुर्वेदिक संकेत

⭐ ग्रीष्म प्रारम्भ में चेचक, त्वचा रोग, जलन और ज्वर अधिक फैलते थे।
⭐ इसलिए यह पर्व होली के बाद रखा गया।

⭐ नीम, दही, जौ, सत्तू, शीतल जल — शरीर को संतुलित रखने वाले माने गये।

तांत्रिक रहस्य

⭐ तंत्रग्रंथों में शीतला को “उग्र रोग शमन मातृका” कहा गया।
⭐ ग्रामदेवी रूप में गाँव के बाहर स्थापना महामारी रोकने का प्रतीक थी।

ज्योतिषीय संकेत

⭐ राहु — संक्रमण, विष
⭐ केतु — त्वचा रोग
⭐ चंद्र — द्रव एवं मानसिक स्थिति
⭐ षष्ठ भाव — रोग

⭐ इसलिए राहु-केतु दोष एवं रोगभय में शीतला जप शुभ माना गया।

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दुर्गा जी   के अभिषेक पदार्थ विपत्तियों   के विनाशक एक रहस्य | दुर्गा जी को अपनी समस्या समाधान केलिए क्या अर्पण करना चाहिए ? अभिषेक किस पदार्थ से करने पर हम किस मनोकामना को पूर्ण कर सकते हैं एवं आपत्ति विपत्ति से सुरक्षा कवच निर्माण कर सकते हैं | दुर्गा जी को अर्पित सामग्री का विशेष महत्व होता है | दुर्गा जी का अभिषेक या दुर्गा की मूर्ति पर किस पदार्थ को अर्पण करने के क्या लाभ होते हैं | दुर्गा जी शक्ति की देवी हैं शीघ्र पूजा या पूजा सामग्री अर्पण करने के शुभ अशुभ फल प्रदान करती हैं | 1- दुर्गा जी को सुगंधित द्रव्य अर्थात ऐसे पदार्थ ऐसे पुष्प जिनमें सुगंध हो उनको अर्पित करने से पारिवारिक सुख शांति एवं मनोबल में वृद्धि होती है | 2- दूध से दुर्गा जी का अभिषेक करने पर कार्यों में सफलता एवं मन में प्रसन्नता बढ़ती है | 3- दही से दुर्गा जी की पूजा करने पर विघ्नों का नाश होता है | परेशानियों में कमी होती है | संभावित आपत्तियों का अवरोध होता है | संकट से व्यक्ति बाहर निकल पाता है | 4- घी के द्वारा अभिषेक करने पर सर्वसामान्य सुख एवं दांपत्य सुख में वृद्धि होती...

श्राद्ध:जानने योग्य महत्वपूर्ण बातें |

श्राद्ध क्या है ? “ श्रद्धया यत कृतं तात श्राद्धं | “ अर्थात श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म श्राद्ध है | अपने माता पिता एवं पूर्वजो की प्रसन्नता के लिए एवं उनके ऋण से मुक्ति की विधि है | श्राद्ध क्यों करना चाहिए   ? पितृ ऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध किया जाना अति आवश्यक है | श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम ? यदि मानव योनी में समर्थ होते हुए भी हम अपने जन्मदाता के लिए कुछ नहीं करते हैं या जिन पूर्वज के हम अंश ( रक्त , जींस ) है , यदि उनका स्मरण या उनके निमित्त दान आदि नहीं करते हैं , तो उनकी आत्मा   को कष्ट होता है , वे रुष्ट होकर , अपने अंश्जो वंशजों को श्राप देते हैं | जो पीढ़ी दर पीढ़ी संतान में मंद बुद्धि से लेकर सभी प्रकार की प्रगति अवरुद्ध कर देते हैं | ज्योतिष में इस प्रकार के अनेक शाप योग हैं |   कब , क्यों श्राद्ध किया जाना आवश्यक होता है   ? यदि हम   96  अवसर पर   श्राद्ध   नहीं कर सकते हैं तो कम से कम मित्रों के लिए पिता माता की वार्षिक तिथि पर यह अश्वनी मास जिसे क्वांर का माह    भी कहा ज...

श्राद्ध रहस्य प्रश्न शंका समाधान ,श्राद्ध : जानने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य -कब,क्यों श्राद्ध करे?

संतान को विकलांगता, अल्पायु से बचाइए श्राद्ध - पितरों से वरदान लीजिये पंडित विजेंद्र कुमार तिवारी jyotish9999@gmail.com , 9424446706   श्राद्ध : जानने  योग्य   महत्वपूर्ण तथ्य -कब,क्यों श्राद्ध करे?  श्राद्ध से जुड़े हर सवाल का जवाब | पितृ दोष शांति? राहू, सर्प दोष शांति? श्रद्धा से श्राद्ध करिए  श्राद्ध कब करे? किसको भोजन हेतु बुलाएँ? पितृ दोष, राहू, सर्प दोष शांति? तर्पण? श्राद्ध क्या है? श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम क्या संभावित है? श्राद्ध नहीं करने के कुपरिणाम क्या संभावित है? श्राद्ध की प्रक्रिया जटिल एवं सबके सामर्थ्य की नहीं है, कोई उपाय ? श्राद्ध कब से प्रारंभ होता है ? प्रथम श्राद्ध किसका होता है ? श्राद्ध, कृष्ण पक्ष में ही क्यों किया जाता है श्राद्ध किन२ शहरों में  किया जा सकता है ? क्या गया श्राद्ध सर्वोपरि है ? तिथि अमावस्या क्या है ?श्राद्द कार्य ,में इसका महत्व क्यों? कितने प्रकार के   श्राद्ध होते   हैं वर्ष में   कितने अवसर श्राद्ध के होते हैं? कब  श्राद्ध किया जाना...

गणेश विसृजन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि

28 सितंबर गणेश विसर्जन मुहूर्त आवश्यक मन्त्र एवं विधि किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए जिस प्रकार उसका प्रारंभ किया जाता है समापन भी किया जाना उद्देश्य होता है। गणेश जी की स्थापना पार्थिव पार्थिव (मिटटीएवं जल   तत्व निर्मित)     स्वरूप में करने के पश्चात दिनांक 23 को उस पार्थिव स्वरूप का विसर्जन किया जाना ज्योतिष के आधार पर सुयोग है। किसी कार्य करने के पश्चात उसके परिणाम शुभ , सुखद , हर्षद एवं सफलता प्रदायक हो यह एक सामान्य उद्देश्य होता है।किसी भी प्रकार की बाधा व्यवधान या अनिश्ट ना हो। ज्योतिष के आधार पर लग्न को श्रेष्ठता प्रदान की गई है | होरा मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना गया है।     गणेश जी का संबंध बुधवार दिन अथवा बुद्धि से ज्ञान से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों प्रतियोगियों एवं बुद्धि एवं ज्ञान में रूचि है , ऐसे लोगों के लिए बुध की होरा श्रेष्ठ होगी तथा उच्च पद , गरिमा , गुरुता , बड़प्पन , ज्ञान , निर्णय दक्षता में वृद्धि के लिए गुरु की हो रहा श्रेष्ठ होगी | इसके साथ ही जल में विसर्जन कार्य होता है अतः चंद्र की होरा सामा...

श्राद्ध रहस्य - श्राद्ध क्यों करे ? कब श्राद्ध नहीं करे ? पिंड रहित श्राद्ध ?

श्राद्ध रहस्य - क्यों करे , न करे ? पिंड रहित , महालय ? किसी भी कर्म का पूर्ण फल विधि सहित करने पर ही मिलता है | * श्राद्ध में गाय का ही दूध प्रयोग करे |( विष्णु पुराण ) | श्राद्ध भोजन में तिल अवश्य प्रयोग करे | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि - श्राद्ध अपरिहार्य - अश्वनी माह के कृष्ण पक्ष तक पितर अत्यंत अपेक्षा से कष्ट की   स्थिति में जल , तिल की अपनी संतान से , प्रतिदिन आशा रखते है | अन्यथा दुखी होकर श्राप देकर चले जाते हैं | श्राद्ध अपरिहार्य है क्योकि इसको नहीं करने से पीढ़ी दर पीढ़ी संतान मंद बुद्धि , दिव्यांगता .मानसिक रोग होते है | हेमाद्रि ग्रन्थ - आषाढ़ माह पूर्णिमा से /कन्या के सूर्य के समय एक दिन भी श्राद्ध कोई करता है तो , पितर एक वर्ष तक संतुष्ट/तृप्त रहते हैं | ( भद्र कृष्ण दूज को भरणी नक्षत्र , तृतीया को कृत्तिका नक्षत्र   या षष्ठी को रोहणी नक्षत्र या व्यतिपात मंगलवार को हो ये पिता को प्रिय योग है इस दिन व्रत , सूर्य पूजा , गौ दान गौ -दान श्रेष्ठ | - श्राद्ध का गया तुल्य फल- पितृपक्ष में मघा सूर्य की अष्टमी य त्रयोदशी को मघा नक्षत्र पर चंद्र ...

गणेश भगवान - पूजा मंत्र, आरती एवं विधि

सिद्धिविनायक विघ्नेश्वर गणेश भगवान की आरती। आरती  जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जा की पार्वती ,पिता महादेवा । एकदंत दयावंत चार भुजा धारी।   मस्तक सिंदूर सोहे मूसे की सवारी | जय गणेश जय गणेश देवा।  अंधन को आँख  देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया । जय गणेश जय गणेश देवा।   हार चढ़े फूल चढ़े ओर चढ़े मेवा । लड्डूअन का  भोग लगे संत करें सेवा।   जय गणेश जय गणेश देवा।   दीनन की लाज रखो ,शम्भू पत्र वारो।   मनोरथ को पूरा करो।  जाए बलिहारी।   जय गणेश जय गणेश देवा। आहुति मंत्र -  ॐ अंगारकाय नमः श्री 108 आहूतियां देना विशेष शुभ होता है इसमें शुद्ध घी ही दुर्वा एवं काले तिल का विशेष महत्व है। अग्नि पुराण के अनुसार गायत्री-      मंत्र ओम महोत काय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात्। गणेश पूजन की सामग्री एक चौकिया पाटे  का प्रयोग करें । लाल वस्त्र या नारंगी वस्त्र उसपर बिछाएं। चावलों से 8पत्ती वाला कमल पुष्प स्वरूप बनाएं। गणेश पूजा में नार...

विवाह बाधा और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा पूजा

विवाह में विलंब विवाह के लिए कात्यायनी पूजन । 10 oct - 18 oct विवाह में विलंब - षष्ठी - कात्यायनी पूजन । वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए - दुर्गतिहारणी मां कात्यायनी की शरण लीजिये | प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना के समय , संकल्प में अपना नाम गोत्र स्थान बोलने के पश्चात् अपने विवाह की याचना , प्रार्थना कीजिये | वैवाहिक सुखद जीवन अथवा विवाह बिलम्ब   या बाधा को समाप्त करने के लिए प्रति दिन प्रातः सूर्योदय से प्रथम घंटे में या दोपहर ११ . ४० से १२ . ४० बजे के मध्य , कात्ययानी देवी का मन्त्र जाप करिये | १०८बार | उत्तर दिशा में मुँह हो , लाल वस्त्र हो जाप के समय | दीपक मौली या कलावे की वर्तिका हो | वर्तिका उत्तर दिशा की और हो | गाय का शुद्ध घी श्रेष्ठ अथवा तिल ( बाधा नाशक + महुआ ( सौभाग्य ) तैल मिला कर प्रयोग करे मां भागवती की कृपा से पूर्वजन्म जनितआपके दुर्योग एवं   व्यवधान समाप्त हो एवं   आपकी मनोकामना पूरी हो ऐसी शुभ कामना सहित || षष्ठी के दिन विशेष रूप से कात्यायनी के मन्त्र का २८ आहुति / १०८ आहुति हवन कर...

कलश पर नारियल रखने की शास्त्रोक्त विधि क्या है जानिए

हमे श्रद्धा विश्वास समर्पित प्रयास करने के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं , क्योकि हिन्दू धर्म श्रेष्ठ कोटी का विज्ञान सम्मत है ।इसकी प्रक्रिया , विधि या तकनीक का पालन अनुसरण परमावश्यक है । नारियल का अधिकाधिक प्रयोग पुजा अर्चना मे होता है।नारियल रखने की विधि सुविधा की दृष्टि से प्रचलित होगई॥ मेरे ज्ञान  मे कलश मे उल्टा सीधा नारियल फसाकर रखने की विधि का प्रमाण अब तक नहीं आया | यदि कोई सुविज्ञ जानकारी रखते हो तो स्वागत है । नारियल को मोटा भाग पूजा करने वाले की ओर होना चाहिए। कलश पर नारियल रखने की प्रमाणिक विधि क्या है ? अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए , उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै प्राची मुखं वित्त्नाश्नाय , तस्माच्छुभम सम्मुख नारिकेलम अधोमुखम शत्रु विवर्धनाए कलश पर - नारियल का बड़ा हिस्सा नीचे मुख कर रखा जाए ( पतला हिस्सा पूछ वाला कलश के उपरी भाग पर रखा जाए ) तो उसे शत्रुओं की वृद्धि होती है * ( कार्य सफलता में बाधाएं आती है संघर्ष , अपयश , चिंता , हानि , सहज हैशत्रु या विरोधी तन , मन धन सर्व दृष्टि से घातक होते है ) उर्ध्वस्य वक्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै कलश ...